24 न्यूज अपडेट, उदयपुर। जनता की भावनाओं और शहर के सम्मान से खिलवाड़ करने वाला पासपोर्ट सेवा केंद्र शिफ्टिंग महाघोटाला अब और अधिक चर्चा का हॉट टॉपिक बन गया है। उदयपुर से लेकर विदेश मंत्रालय तक के अफसरों में खलबनी मच गई है। विदेश मंत्रालय की शान में बट्टा लगाने वाले इस काम को लेकर रिटायर्ड हो चुके अफसरों में भी काफी गुस्सा है।
नगर निगम उदयपुर की सामुदायिक भावना से मिले भवन को टीसीएस (टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) जैसी बड़ी कंपनी ने किराया चुकाए बिना तीन साल तक कब्जाए रखा और जब किराया मांगा गया तो बहानेबाजी कर नया कार्यालय मॉल में गुपचुप तरीके से खोल दिया। अब किराए मांगने पर कॉरपोरेट स्टाइल की बहानेबाजी करना लोगों को बहुत खल रहा है। इससे भी बड़ी हैरानी इस बात की है कि इस प्रकरण में कोटा से लेकर दिल्ली तक बैठे अफसरों ने “हमें कोई लेना-देना नहीं” कहकर पल्ला झाड़ लिया। जनता इसे सरासर विश्वासघात, मौका परस्ती और किसी बड़े आर्थिक लाभ का गणित मान रही है।

📌 जनता के त्याग का अपमानः 1 रुपए में दी गई बिल्डिंग, बदले में धोखा

पासपोर्ट सेवा केंद्र 2017 में उदयपुर नगर निगम ने जनता की सुविधा के लिए 1 रुपए की लीज पर सरकार को दिया था। इस भवन का उद्देश्य क्षेत्र के हजारों लोगों को पासपोर्ट सेवा नजदीक उपलब्ध कराना था। इस भवन को देने के लिए स्थानीय लोगों ने अपने सामुदायिक भवन के उपयोग का त्याग किया। पर अफसरों और टीसीएस के प्रोफेशनल रवैये ने जनता के त्याग का अपमान किया, उसका दिल तोड़ दिया। कर भला तो हो बुरा को एक बार फिर साबित कर दिया।

📌 तीन साल से किराया बकाया, नोटिस का भी मजाक

टीसीएस के अधिकारी कह रहे हैं कि “किराया मांगा ही नहीं गया, तो हम क्यों दें?” सवाल उठता है कि अगर किराया नहीं मांगा गया था तो तीन साल तक मुफ्त में सरकारी संपत्ति का उपयोग क्यों किया? नगर निगम आयुक्त अभिषेक खन्ना की ओर से मीडिया को बताया गया कि मार्च 2023 में हमने कंपनी को 1.52 लाख प्रति माह किराया तय कर नोटिस दिया था। कंपनी 60 हजार देने को तैयार हुई। सहमति नहीं दी। 15 जुलाई को कंपनी ने भवन खाली करने का पत्र भेजा। अब 2022 से बकाया 76.80 लाख की रिकवरी का नोटिस भेजा है। निगम को वसूलना आता है।

📌 सांप और नाला बहानेः जनता को मूर्ख बनाने की कोशिश
टीसीएस का कहना है कि पुराने भवन में “सांप आने और नाले की बदबू” जैसी दिक्कतों के कारण नया कार्यालय खोलना पड़ा। सवाल यह है कि अगर हालात इतने खराब थे, तो वर्षों तक वहीं काम क्यों किया गया? और नया कार्यालय खोलने से पहले निगम को लाखों रुपए का किराया चुकाना क्यों जरूरी नहीं समझा गया? यह बहाना जनता को मूर्ख बनाने की कोशिश जैसा है। अब किराया देने की बात सार्वजनिक होते ही सांप नजर आने लग गए हैं।

📌 अफसरों की गुपचुप फीता-शाही, जनता का गुस्सा
नया पासपोर्ट केंद्र मॉल में बिना जनता को बताए खोला गया। बार बार उद्घाटन टाल कर विदेश मंत्रालय का मजाक बनाया गया। कल हुए गुपचुप कार्यक्रम में न सांसद आए, न विधायक, न कोई जनप्रतिनिधि। उद्घाटन सप्ताहांत के अवकाश पर चोरी-छिपे किया गया। पासपोर्ट अधिकारी कोटा यशवंत माथे और संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी खुद ही सर्वेसर्वा बनकर फीता काटकर चुपचाप निकल गए। दरवाजे बंद थे, मीडिया को भी अंदर नहीं आने दिया गया। बाद में वकीलों और पूर्व पार्षदों ने उन्हें घेरकर सवाल उठाए तो बवाल मच गया। जनता का सवाल है कि “अगर मामला विवादित था, निगम का बकाया था, जनता खुश नहीं थी, तो उद्घाटन टाल क्यों नहीं दिया गया? दरवाजे बंद करके चोरी-छिपे फीता काटने की अफसरों की ऐसी क्या मजबूरी थी?” किसका दबाव था उसका नाम सर्वजनिक होना चाहिए।

📌 सांसद और प्रतिनिधियों की चुप्पी, मीडिया मैनेजमेंट के आरोप

इस पूरे विवाद पर उदयपुर सांसद ने एक शब्द नहीं कहा। बताया जा रहा है कि चार बार निमंत्रण देने के बावजूद सांसद कार्यक्रम में नहीं आए। क्यांंकि उनको पता है यहां पूरी दाल ही काली है। पांचवीं बार तो हद हुई कि उन्हें बुलाया ही नहीं गया। अब सांसद की यह चुप्पी जनता के विरोध को और भड़का रही है। सांसद ही वो सेतु है तो विदेश मंत्रालय तक लोगों की बात रखेंगे। वे ही होंठ सिल कर बैठ जाएंगे तो फिर कौन उदयपुर के हितों की पैरवी करेगा। वैसे तो सांसद बहुत ही मुखर रहते हैं मगर इस मामले में उनकी चुप्पी का आखिर राज क्या है? कौनसा प्रेशर है??
इधर, खबरों के मुताबिक, कोटा और दिल्ली स्तर पर मीडिया को भी इस विवाद को ज्यादा तूल न देने के लिए “मैनेज” करने के प्रयास हुए। कुछ खास मीडियाकर्मियों को इसकी जिम्मेदारी भी मिली बताई जा रही है।

📌 निगम बनाम टीसीएसः अब खुली जंग
टीसीएस का कहना है कि निगम “कुंठित होकर मनमाना किराया मांग रहा है”। वहीं निगम का कहना है कि “हम जनता के भवन को मुफ्त में कॉरपोरेट कंपनी को नहीं देंगे, चाहे कंपनी कितनी भी बड़ी क्यों न हो।” निगम आयुक्त अभिषेक खन्ना को अब तत्काल नए भवन को सीज करने जैसी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि बकाया किराया राशि या उदयपुर की जनता का बकाया धन वसूला जा सके। लोग कह रहे हैं कि “उदयपुर की जनता के त्याग का अपमान नहीं सहेंगे। कंपनी को हर हाल में किराया देना होगा।”

📌 जनता का गुस्सा और सवाल
शहरवासी पूछ रहे हैं कि “जनता ने सामुदायिक भवन का त्याग कर पासपोर्ट सेवा केंद्र के लिए जगह दी थी, क्या यही उसका प्रतिफल है?” “अफसर और कंपनी की मिलीभगत से जनता को बेवकूफ बनाया जा रहा है, यह शर्मनाक है।” “उद्घाटन चोरी-छिपे क्यों किया गया? अगर सब सही था तो जनता को बुलाने का साहस क्यों नहीं हुआ?” “क्या विदेश मंत्रालय इतनी बड़ी कंपनी के सामने झुक गया है?”

उदयपुर अब यह देख रहा है कि क्या नगर निगम वाकई इस रकम की वसूली करेगा या यह मामला भी “मैनेज” होकर दबा दिया जाएगा।


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