— राष्ट्रीय संगोष्ठी में शिक्षा, संस्कृति और एआई के समन्वय पर हुआ मंथन
देशभर के 100 से अधिक शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने लिया भाग

24 News Update उदयपुर, 11 मई। भारतीय वैदिक शिक्षा पद्धति केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन मूल्यों, व्यवहारिक शिक्षा और “लाइफ लॉन्ग लर्निंग” की अवधारणा पर आधारित थी। गुरुकुल परंपरा में अनुशासन, समान शिक्षा, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों के साथ जीवनोपयोगी ज्ञान को महत्व दिया जाता था। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दौर में भी भारतीय ज्ञान परंपरा उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक तकनीक के साथ मानवीय मूल्यों और संस्कारों का संतुलन आवश्यक है।
ये विचार जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ के कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय उद्बोधन के दौरान व्यक्त किए। संगोष्ठी का आयोजन जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ और निर्मला कॉलेज ऑफ एजुकेशन, उज्जैन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा संवाद, संस्कृति और अनुभव आधारित शिक्षा की समृद्ध धरोहर है। वेद, योग, भाषा, संस्कृति, गणित और भूगोल जैसे विषय गुरुकुलों में व्यवहारिक पद्धति से पढ़ाए जाते थे। उन्होंने कहा कि न्याय दर्शन, पाणिनि का व्याकरण और भारतीय तर्क प्रणाली आधुनिक एल्गोरिदम तथा मशीन लर्निंग के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं।
उन्होंने कहा कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो वैज्ञानिक सोच के साथ मानवीय संवेदनाओं और भारतीय आत्मा से जुड़ी हो। “जड़ों से जुड़कर आगे बढ़ना ही विकसित भारत और सशक्त राष्ट्र निर्माण का वास्तविक आधार है,” उन्होंने कहा।

“क्या केवल गति ही प्रगति है?” — प्रो. सारंगदेवोत
प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि भारत ने विश्व को विश्वविद्यालयों और समृद्ध ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर दी है। शंकराचार्य, रामायण और महाभारत जैसे भारतीय चिंतन ने जीवन, आध्यात्मिकता और मोक्ष का मार्ग दिखाया। उन्होंने सवाल उठाया कि आज सूचना और एआई के युग में “क्या केवल गति ही प्रगति है?” और कहा कि इसका उत्तर भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित है। उन्होंने नई शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा और मूल्य आधारित शिक्षा को वर्तमान पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया।

एआई के दौर में भी संस्कारों की आवश्यकता
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में विद्यापीठ के कुलप्रमुख एवं कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर ने मुख्य अतिथि के रूप में कहा कि भारतीय शिक्षा गुरुकुल परंपरा से आगे बढ़ते हुए अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग तक पहुंच चुकी है। एआई ने कार्यप्रणाली को सरल और तेज बनाया है, लेकिन नैतिक मूल्यों और संस्कारों का महत्व आज भी सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि वही शिक्षा सार्थक है, जो राष्ट्र निर्माण और चरित्र निर्माण में सहायक हो।
विशिष्ट अतिथि एवं निर्मला कॉलेज तथा निर्मला कॉलेज ऑफ एजुकेशन, उज्जैन के निदेशक डॉ. फादर एंथनी जोसेफ ने कहा कि गुरुकुल परंपरा व्यक्तित्व निर्माण और अनुशासन पर आधारित थी, जबकि आधुनिक तकनीक ने ज्ञान की पहुंच को आसान बनाया है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वित दृष्टिकोण को नई पीढ़ी तक पहुंचाएं।

नई शिक्षा नीति और भारतीय संस्कृति पर जोर
संगोष्ठी निदेशक एवं महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. सरोज गर्ग ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि ज्ञान मानव जीवन, विश्व कल्याण और समग्र विकास का आधार है। उन्होंने कहा कि आज एआई ने सूचना प्रक्रिया को अत्यंत तीव्र बना दिया है, लेकिन सांस्कृतिक जड़ों और भारतीय परंपरा से जुड़े रहना भी उतना ही जरूरी है।
संगोष्ठी समन्वयक प्रो. अमी राठौड़ ने बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर सार्थक विमर्श करना था। तकनीकी सत्रों में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात सहित विभिन्न राज्यों के शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भाग लिया। करीब 100 प्रतिभागियों ने सहभागिता की, जिनमें लगभग 50 प्रतिभागी ऑनलाइन जुड़े। संगोष्ठी में 80 से अधिक शोध पत्रों का ऑनलाइन एवं ऑफलाइन प्रस्तुतीकरण किया गया।

पुस्तक का विमोचन भी हुआ
कार्यक्रम के दौरान प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. अमी राठौर और डॉ. अमित दवे द्वारा संपादित पुस्तक “Evolving Role of Communication in Modern Society” का अतिथियों द्वारा विमोचन किया गया। संगोष्ठी में प्रो. बलिदान जैन, प्रो. रचना राठौर, प्रो. भूरालाल श्रीमाली, प्रो. सुनीता मोरिया, डॉ. कैलाश चंद्र चौधरी, डॉ. सरिता मेनारिया, डॉ. पुनीत पंड्या, डॉ. हरीश मेनारिया, डॉ. पल्लव पांडे, डॉ. अमित दवे, डॉ. रेनू हिंगड़, डॉ. हिम्मत सिंह चुंडावत, डॉ. अमित बाहेती, डॉ. महेंद्र वर्मा और डॉ. तिलकेश आमेटा सहित कई शिक्षाविदों एवं शोधार्थियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. हरीश चौबीसा एवं डॉ. इंदु आचार्य ने किया, जबकि आभार प्रो. रचना राठौर ने व्यक्त किया।


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