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24 न्यूज अपडेट, उदयपुर। मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में कुलगुरू के पद पर नियुक्त प्रोफेसर सुनीता मिश्रा जो अवकाशधारी हैं, उन पर भारी वित्तीय अनियमितताओं के आरोप प्रकाश में आए हैं। इन आरोपों में इतना दम है कि प्रथम दृष्टया वीसी को निलंबित किया जा सकता है। अभी वीसी के खिलाफ जांच चल रही है जिसकी वजह से उन्हें अवकाश लेने का सुअवसर दिया गया है। मजाक यह हो रहा है कि इस अवधि का पूरा वेतन दिया जा रहा है। कार्यवाहक वीसी भी काम कर रहे हैं। इसके अलावा जांच कमेटी भी अब तक वीसी के खिलाफ हुई जांच पर रिपोर्ट ही नहीं दे रही है। बहरहाल, 24 न्यूज अपडेट को मिली खास जानकारी के अनुसार, वीसी ने नियमानुसार मासिक वेतन और भत्तों से अधिक राशि प्राप्त की है तथा चिकित्सा पुनर्भरण सुविधा का नियम-विरुद्ध उपयोग भी किया गया है।
प्रमुख तथ्य
- नियुक्ति के अनुरूप मासिक वेतन 2,10,000 रूपए एवं मा. विशेष भत्ता 5,000 रूपए होना था। मगर आरोप है कि उन्होंने मासिक भत्ता सहित 2,18,000 रु प्राप्त किए।
विशेष वेतन में नियमानुसार 11,250 रु प्रति माह होना था, परंतु कथित तौर पर 1,20,010 रु प्रति माह भुगतान हुआ। - अतिरिक्त “भत्ता” के नाम पर 9,000 रु प्रति माह भी दिए जाने का आरोप है।
वित्त नियंत्रक की सील लगा कर खुद कर दिए साइन
अप्रैल 2023 से विश्वविद्यालय ने कर्मचारियों एवं पेंशनर्स के लिए चिकित्सा पुनर्भरण सुविधा बंद कर दी थी व आरजीएचएस योजना लागू कर दी गई। मगर इसके बावजूद न्यायाधीश वित्त नियंत्रक की सील और प्रो वीसी के हस्ताक्षर से अपना मेडिकल बिल भरवाकर भुगतान ले रही थीं -जिसे “कोष में गबन” की श्रेणी में आने वाला कार्रवाई की श्रेणी में डाला जा सकता है। विश्वविद्यालय अधिनियम और राज्य सरकार के वित्तीय दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर दबाव बनाया गया है, यह दावा भी किया जा रहा है।
यदि इन मामलों की जांच होती है तो संभावित परिणाम
वित्तीय अनियमितताओं के पाए जाने पर राज्य सरकार द्वारा अन्वेषण एवं ऑडिट कमेटी गठित की जा सकती है। जांच में प्रमाणित होने पर प्रोफेसर सुनीता मिश्रा के खिलाफ विवेचना प्रक्रिया आरंभ हो सकती है- जिसमें वेतन भुगतान रिवर्सल, भत्तों की वसूली एवं पद से बर्खास्तगी तक हो सकती है। विश्वविद्यालय में चिकित्सा पुनर्भरण की गलत सुविधा देने वाले अधिकारियों के खिलाफ शासन और वित्त विभाग द्वारा कार्रवाई हो सकती है- जिसमें पदोन्नति रोके जाना, सेवाविश्राम या स्थगन शामिल हो सकता है। इससे विश्वविद्यालय की शैक्षणिक साख एवं वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठ सकते हैं, तथा भविष्य में नियोजन-अनुगमन तंत्र मजबूत करने की आवश्यकता सामने आएगी। यह मामला केवल विश्वविद्यालय के भीतर ही नहीं, बल्कि राज्य-स्तरीय उच्चशिक्षा प्रबंधन की जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत हैं। अगले चरण में सरकारी विभागों द्वारा विस्तृत ऑडिट रिपोर्ट जारी होने और सामाजिक हित में उजागर होने की संभावना बनी हुई है।

