24 News Update उदयपुर। नगर निकाय चुनाव के लिए अध्यक्ष और मेयर पदों की आरक्षण लॉटरी ने उदयपुर संभाग की स्थानीय राजनीति को एक साथ कई दिशाओं में मोड़ दिया है। सबसे ज्यादा नजर उदयपुर नगर निगम पर है, जहां मेयर पद अनारक्षित ओपन रखा गया है। इसके साथ ही संभाग के 28 नगरीय निकायों के 905 वार्डों में आरक्षण का जो व्यापक ढांचा तैयार हुआ है, वह अगले चुनाव में पार्टियों के टिकट वितरण से लेकर वार्डवार उम्मीदवारों के चयन और बोर्ड गठन तक की राजनीति को प्रभावित करने वाला है।
उदयपुर में मेयर पद की लॉटरी खुलने के बाद सामान्य वर्ग के नेताओं की मंसूबों को आज पंख लग गए। महिला और पुरुष दोनों खेमों में लामबंदी शुरू हो गई। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक वर्गों से आने वाले पात्र उम्मीदवार भी ओपन सीट पर मैदान में उतरने का दावा अब कर सकते हैं ऐसे में मुकाबला बहुत दिलचस्प हो गया है। इसलिए जहां दावेदारी आरक्षण से तय होती थी, अब राजनीतिक ताकत, पार्टी का टिकट और चुनाव के बाद बनने वाला बहुमत निर्णायक होने वाला है।

उदयपुर में बदला सबसे बड़ा समीकरण
उदयपुर में नगर निगम की पिछला मेयर ओबीसी पुरुष वर्ग से था। इस बार सीट अनारक्षित होने से राजनीतिक दावेदारी का दायरा बढ़ गया है। कुछ खांटी नेताओं से लेकर कुछ धन बल रखने वालों की भी इच्छाएं कुलांचे मारने लगी हैं। इसका सबसे सीधा असर पार्टियों के भीतर दिखाई देगा। ऐसे नेता जो पिछली बार आरक्षण की वजह से मेयर पद की दौड़ में नहीं आ सकते थे, अब अपने लिए राजनीतिक जमीन पर ताला ठेक लेंगे। लेकिन इसके साथ ही पार्टी नेतृत्व के सामने मुश्किलें भी बढ़ेगी। ओपन सीट जितने ज्यादा नेताओं को मौका देती है, उतनी ही ज्यादा टिकट की प्रतिस्पर्धा भी पैदा करती है। एक पद के लिए कई दावेदार सामने आ सकते हैं। इनमें से किसी एक को चुनने के बाद बाकी को साथ रखना पार्टियों के लिए बड़ी परीक्षा होगी। खास कर भाजपा के लिए एक अनार सौ बीमार जैसी स्थिति हो सकती है। उदयपुर की राजनीति में भाजपा का लगातार बोर्ड बनने का इतिहास इस मुकाबले को और महत्वपूर्ण बनाता है। 1994 से अब तक अलग-अलग चुनावों में भाजपा के बोर्ड रहे हैं। अब पार्टी के सामने सिर्फ सत्ता बचाने का सवाल नहीं, बल्कि मेयर के लिए ऐसा चेहरा चुनने की चुनौती होगी जो संगठन, पार्षदों और शहर के अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच संतुलन बना सके। पिछले मेयर जीएस टांक की जो छवि है वो किसी से छिपी हुई नहीं है। ऐसे में भाजपा के​ लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इधर, कांग्रेस में भी घमासान कम नहीं है वहां भी एक अनार सौ बीमार जैसी हालत होने वाली है। महत्वाकांक्षी वहां ज्यादा है मगर जमीनी स्तर पर काम करने वाले कम।

80 वार्ड तय करेंगे मेयर की कुर्सी
मेयर पद पर आरक्षण खुल गया, लेकिन मेयर की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता अभी भी 80 वार्डों से होकर जाएगा। उदयपुर नगर निगम में 406 मतदान केंद्रों पर होने वाला चुनाव पूरे जिले की निकाय राजनीति का सबसे बड़ा मुकाबला होगा। चार लाख से ज्यादा मतदाता वाले निगम में पार्टी का मेयर चेहरा कितना भी मजबूत क्यों न हो, यदि वार्डों में पर्याप्त संख्या नहीं आती तो उसकी राजनीतिक ताकत सीमित हो जाएगी। इसलिए इस बार पार्टियों के लिए मेयर उम्मीदवार से ज्यादा अहम वार्डवार उम्मीदवार चयन हो सकता है।
किस वार्ड में पुराना पार्षद मजबूत है, कहां नया चेहरा बेहतर है, कहां बागी उम्मीदवार नुकसान पहुंचा सकता है और कहां जातीय समीकरण पार्टी के पक्ष में हैं—इन सवालों के जवाब ही अंततः बोर्ड का आकार तय करेंगे।

जिले के बाकी निकायों में भी बदली तस्वीर
उदयपुर जिले में उदयपुर के अलावा भींडर, कानोड़, फतहनगर-सनवाड़, मावली और वल्लभनगर निकाय चुनाव के मैदान में हैं। अध्यक्ष पदों की आरक्षण व्यवस्था ने इन सभी जगहों पर अलग-अलग राजनीतिक तस्वीर बनाई है। भींडर में अध्यक्ष पद अनारक्षित ओपन रहने से किसी वर्ग के महिला या पुरुष नेता के लिए रास्ता खुला है। पिछली बार सामान्य महिला आरक्षण के कारण पुरुष दावेदारों के लिए जो सीमा थी, वह अब नहीं है। सलूंबर में भी अध्यक्ष पद अनारक्षित ओपन है और यहां यह स्थिति पिछली श्रेणी के अनुरूप ही बनी है। ऐसे में यहां चुनाव मुख्य रूप से स्थानीय राजनीतिक ताकत और संगठन के प्रभाव की परीक्षा बनेगा। कानोड़ में ओबीसी ओपन होने से मुकाबला ओबीसी वर्ग तक सीमित रहेगा, लेकिन महिला और पुरुष दोनों दावेदारी कर सकेंगे। यहां राजनीतिक दलों को ओबीसी समाज के भीतर ऐसा चेहरा तलाशना होगा जिसकी स्वीकार्यता केवल अपने वार्ड तक सीमित न हो।
फतहनगर-सनवाड़ में अनारक्षित महिला सीट होने से मुकाबले का चेहरा पूरी तरह बदल गया है। यहां किसी भी वर्ग की पात्र महिला अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी कर सकती है। पुरुष दावेदार इस बार अध्यक्ष पद की दौड़ से बाहर रहेंगे। मावली में एसटी ओपन और वल्लभनगर में एसटी महिला आरक्षण ने दोनों नई नगर पालिकाओं की शुरुआती राजनीतिक दिशा तय कर दी है। मावली में एसटी वर्ग के महिला-पुरुष दोनों दावेदार सामने आ सकते हैं, जबकि वल्लभनगर में एसटी महिला नेतृत्व को अवसर मिलेगा।

28 निकायों का बड़ा राजनीतिक कैनवास
उदयपुर संभाग की तस्वीर केवल इन छह निकायों तक सीमित नहीं है। कुल 28 नगरीय निकायों में 905 वार्ड हैं। इनमें आरक्षण का व्यापक विभाजन स्थानीय चुनाव की सामाजिक संरचना को साफ दिखाता है। पूरे संभाग में 112 वार्ड अनुसूचित जाति, 82 वार्ड अनुसूचित जनजाति, 178 वार्ड ओबीसी और 533 वार्ड सामान्य श्रेणी में आते हैं। यानी कुल वार्डों में सबसे बड़ा हिस्सा सामान्य श्रेणी का है, जबकि एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण मिलकर भी बड़ी संख्या में वार्डों की राजनीतिक दिशा तय करते हैं। यह आंकड़ा महज प्रशासनिक वर्गीकरण नहीं है। राजनीतिक दलों के लिए यह अगले चरण की टिकट रणनीति का नक्शा है। जिस निकाय में जिस वर्ग के आरक्षित वार्ड ज्यादा हैं, वहां पार्टी को उम्मीदवारों की सामाजिक संरचना उसी हिसाब से तैयार करनी होगी।

बांसवाड़ा से डूंगरपुर और प्रतापगढ़ तक अलग-अलग राजनीतिक गणित
संभाग के बड़े निकायों में बांसवाड़ा नगर परिषद के 60 वार्ड, चित्तौड़गढ़ के 60, डूंगरपुर के 40, राजसमंद के 45, निंबाहेड़ा के 45 और नाथद्वारा के 40 वार्ड हैं। इन बड़े निकायों में आरक्षण का प्रभाव केवल एक-दो वार्ड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे बोर्ड की सामाजिक संरचना पर पड़ेगा।
बांसवाड़ा जैसे निकाय में आदिवासी राजनीति का प्रभाव स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण रहेगा, जबकि चित्तौड़गढ़, निंबाहेड़ा और राजसमंद जैसे क्षेत्रों में सामान्य, ओबीसी, एससी और एसटी वार्डों का मिश्रण पार्टियों को अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच संतुलन बनाने के लिए मजबूर करेगा। डूंगरपुर और आसपास के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में एसटी आरक्षण की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां पार्टी के उम्मीदवार चयन में स्थानीय सामाजिक नेतृत्व और समुदाय आधारित राजनीतिक प्रभाव को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

छोटे निकायों में भी मुकाबला कम महत्वपूर्ण नहीं
संभाग में 20 और 25 वार्ड वाली कई नगर पालिकाएं हैं—कुशलगढ़, अरनोद, आमेट, देवगढ़, भीम, धरियावद, प्रतापगढ़ क्षेत्र की पालिकाएं, आकोला, कपासन, बेगू और छोटी सादड़ी जैसे निकायों में चुनाव छोटे पैमाने का जरूर होगा, लेकिन राजनीतिक असर स्थानीय स्तर पर बड़ा हो सकता है।
छोटे निकायों में एक-दो वार्ड का परिणाम बोर्ड की पूरी तस्वीर बदल सकता है। यहां पार्टी के बड़े नाम की तुलना में स्थानीय उम्मीदवार का व्यक्तिगत नेटवर्क ज्यादा प्रभावी हो सकता है। इसलिए इन निकायों में बागी और निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका भी निर्णायक बनने की संभावना रहती है।

महिला आरक्षण ने भी बदला चुनाव का चेहरा
अध्यक्ष पदों के अलावा वार्डों के आरक्षण में भी महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान लागू है। इसका असर सीधे राजनीतिक नेतृत्व की नई पीढ़ी पर पड़ेगा। कई वार्डों में राजनीतिक दलों को ऐसे परिवारों से उम्मीदवार उतारने पड़ सकते हैं जिनका राजनीतिक प्रभाव पहले से है, लेकिन उम्मीदवार महिला होगी। कुछ जगहों पर यह वास्तविक महिला नेतृत्व का रास्ता खोल सकता है, जबकि कुछ जगहों पर पार्टियां पारंपरिक राजनीतिक परिवारों के महिला चेहरों पर निर्भर रह सकती हैं।
यानी इस चुनाव का एक बड़ा परिणाम यह भी होगा कि कितनी नई महिला राजनीतिक पहचान स्थानीय निकायों से निकलकर सामने आती है।

आरक्षण से ज्यादा कठिन होगा टिकट का गणित
आरक्षण की घोषणा के बाद पहली नजर में ऐसा लगता है कि उम्मीदवारों की तस्वीर साफ हो गई। वास्तव में राजनीतिक दलों के लिए असली मुश्किल अब शुरू हुई है। एक वार्ड आरक्षित होने का अर्थ यह है कि पार्टी को उस श्रेणी का उम्मीदवार तलाशना होगा, लेकिन उसके बाद भी कई सवाल बाकी रहते हैं—क्या वह उम्मीदवार जीतने की स्थिति में है? क्या उसका स्थानीय नेटवर्क है? क्या वह पार्टी के साथ लंबे समय तक काम करता रहा है? क्या वह बागी होकर नुकसान पहुंचाने वाले संभावित प्रतिद्वंद्वी को रोक सकता है? इसलिए आरक्षण केवल पात्रता तय करेगा। जीतने की क्षमता टिकट तय करने का सबसे बड़ा आधार बनने वाली है। भाजपा के सामने विरासत बचाने की चुनौती, कांग्रेस के सामने सेंध की
उदयपुर नगर निगम में भाजपा के लगातार छह बोर्ड का इतिहास कांग्रेस के सामने स्पष्ट चुनौती रखता है। कांग्रेस यदि इस बार सत्ता में वापसी चाहती है तो उसे केवल भाजपा विरोधी वोट के भरोसे नहीं रहना होगा।
उसे वार्ड स्तर पर मजबूत चेहरे खड़े करने होंगे और ऐसे उम्मीदवार चुनने होंगे जो स्थानीय स्तर पर भाजपा की संगठनात्मक मजबूती को चुनौती दे सकें।
भाजपा के लिए चुनौती दूसरी है। लगातार सत्ता के बाद टिकट वितरण में असंतोष, पुराने पार्षदों के प्रति नाराजगी, नए चेहरों की मांग और संभावित बागियों को संभालना पार्टी के लिए निर्णायक होगा। दोनों पार्टियों की पहली लड़ाई एक-दूसरे से पहले अपने भीतर होगी। 4 लाख 72 हजार से ज्यादा मतदाता, लेकिन चुनाव वार्ड में जीता जाएगा उदयपुर जिले के छह निकायों में कुल 4 लाख 72 हजार 609 मतदाता हैं। इनमें उदयपुर नगर निगम का हिस्सा सबसे बड़ा है। जिले के इन निकायों में कुल 190 वार्ड और 516 मतदान केंद्र हैं। लेकिन चुनाव का वास्तविक गणित कुल मतदाताओं से नहीं, बल्कि वार्डों में वोट के छोटे अंतर से तय होगा। स्थानीय निकाय चुनाव में कुछ सौ वोट का अंतर भी पूरे बोर्ड की तस्वीर बदल सकता है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों की रणनीति अब बड़े नारों से ज्यादा बूथ और वार्ड स्तर पर केंद्रित होगी।

संभाग में कुल 905 वार्ड—आरक्षण ने बना दिया राजनीतिक नक्शा
अगर पूरे संभाग को एक साथ देखें तो तस्वीर साफ है। 28 निकाय, 905 वार्ड और चार प्रमुख आरक्षण समूह—एससी, एसटी, ओबीसी और सामान्य।
लेकिन इसके भीतर राजनीतिक कहानी बहुत ज्यादा जटिल है। कहीं आदिवासी आरक्षण निर्णायक है, कहीं ओबीसी दावेदारी का विस्तार कर रहा है, कहीं महिला आरक्षण ने पुरुष दावेदारों को बाहर किया है और कहीं अनारक्षित सीट ने सभी वर्गों के लिए रास्ता खोल दिया है।
यानी इस बार उदयपुर संभाग का निकाय चुनाव एक जैसी रणनीति से नहीं लड़ा जा सकता। हर निकाय के लिए अलग सामाजिक और राजनीतिक फार्मूला तैयार करना होगा।

अब सबसे बड़ा इंतजार टिकटों का
आरक्षण की लॉटरी ने चुनाव का पहला बड़ा रहस्य खोल दिया है। अब निगाहें राजनीतिक दलों पर हैं। उदयपुर में मेयर के संभावित चेहरे कौन होंगे?
भींडर में कौन अपना दावा पेश करेगा? सलूंबर में कौन मजबूत होगा? कानोड़ में ओबीसी चेहरों में किस पर दांव लगेगा? फतहनगर-सनवाड़ में कौन महिला नेता आगे आएगी? मावली और वल्लभनगर में नई नगर पालिकाओं का पहला नेतृत्व कौन संभालेगा? इन सवालों के जवाब टिकटों के साथ सामने आएंगे।
फिलहाल इतना तय है कि आरक्षण ने चुनाव की सीमा तय कर दी है, लेकिन चुनाव का परिणाम उम्मीदवार तय करेंगे। उदयपुर में मेयर पद खुलने से मुकाबला जरूर खुला है, मगर असली लड़ाई अब 80 वार्डों के भीतर शुरू होगी। और संभाग के 28 निकायों के 905 वार्डों में यही वार्डवार मुकाबला तय करेगा कि चुनाव के बाद सत्ता की चाबी किस राजनीतिक दल के हाथ में जाती है। लॉटरी ने सीटें बांट दीं, अब राजनीति चेहरे बांटेगी—और जनता तय करेगी कि उन चेहरों में से सत्ता किसे मिलती है।


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