24 News Update जयपुर। राजस्थान के सरकारी स्कूलों में मीडिया की आवाजाही को लेकर शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की सफाई के बावजूद सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा है—स्कूलों की कमियां सामने लाने वाली स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था कितनी खुली रहेगी? ऐसे में लोग तो अब यह तक कहने लगे हैं कि सबसे पहले स्कूलों में नेताओं का प्रवेश बंद होना चाहिए क्योंकि वे ही पूरे सिस्टम का बंटाढार करवा रहे हैं। नेताओं ने स्कूलों को राजनीतिक का अड्डा बना रखा है। वे नहीं आएंगे तो सिस्टम आधा तो अपने आप ही सुधर जाएगा। बाकी काम लोग खुद कर लेंगे।मंत्री ने अब दबाव में आकर यू टर्न लिया है व कहा है कि स्कूलों में मीडिया के प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। सरकार का मकसद बच्चों की निजता और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। उनका कहना है कि नाबालिग बच्चों की फोटो, वीडियो या बाइट लेने से पहले अभिभावक की अनुमति जरूरी होगी और अभिभावक मौजूद नहीं होने पर शिक्षक से अनुमति ली जा सकती है।सरकार की दलील अपनी जगह है, लेकिन विवाद की जड़ ‘मीडिया प्रवेश’ से ज्यादा ‘अनुमति’ की व्यवस्था है। सरकारी स्कूल किसी निजी परिसर की तरह नहीं हैं। सार्वजनिक धन से व्यवस्थाएं संचालित होती हैं और व्यवस्थाओं की स्थिति जानना अभिभावकों और समाज के लिए महत्वपूर्ण है यह किसी की बपौती नहीं है। सवाल यह है कि यदि किसी स्कूल की छत जर्जर है, कमरों की हालत खराब है, शौचालय उपयोग लायक नहीं हैं या बच्चों के लिए मूलभूत सुविधाओं की कमी है तो उसकी तस्वीर लेने के लिए भी अनुमति की जरूरत होगी या नहीं? दिलावर का तर्क- बच्चों को कैमरे से बचाना जरूरीमंत्री का कहना है कि कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से स्कूल में पहुंचकर बच्चों से बातचीत या उनकी रिकॉर्डिंग नहीं कर सकता। संस्था प्रधानों को बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों को ध्यान में रखते हुए निर्देश दिए गए हैं। यहां एक बात पर सरकार से असहमति की गुंजाइश कम है कि नाबालिग बच्चों की पहचान, फोटो और निजी जानकारी की सुरक्षा होनी चाहिए। लेकिन इस सुरक्षा व्यवस्था को स्कूल की पूरी गतिविधि को कैमरे और मीडिया से दूर रखने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। दोनों विषयों के बीच स्पष्ट सीमा जरूरी है। CJP ने चुनौती देकर विवाद को दूसरा मोड़ दियाइसी बीच CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि सरकार पहले राजस्थान के जर्जर स्कूलों को ठीक करे या उनके खिलाफ एडवांस में एफआईआर दर्ज करवा दे। रांका का कहना है कि सरकार चाहे तो उन्हें पहले ही गिरफ्तार कर सकती है, लेकिन वे स्कूलों का निरीक्षण बंद नहीं करेंगे। उनका दावा है कि जब तक प्रदेश के स्कूलों की स्थिति में सुधार नहीं होता, वे व्यवस्थाओं को लेकर आवाज उठाते रहेंगे।उनका बयान दरअसल बड़े सवाल को सामने लाता है जिसे सरकारी सफाई पूरी तरह खत्म नहीं कर पाई है। अगर स्कूलों की व्यवस्थाओं की निगरानी विभाग खुद करता है तो बाहरी निगरानी से परेशानी क्यों होनी चाहिए? ‘स्कूलों के हालात छिपे नहीं’ तो रिपोर्टिंग से आपत्ति क्यों?दिलावर का कहना है कि स्कूलों की व्यवस्थाओं पर नियमित निगरानी होती है। अभिभावक-शिक्षक बैठकों में भी स्कूलों और बच्चों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाती है। इसलिए स्कूलों के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। लेकिन यही तर्क एक दूसरा सवाल भी पैदा करता है—यदि हालात वास्तव में छिपे नहीं हैं तो स्वतंत्र मीडिया कवरेज को लेकर इतनी संवेदनशीलता क्यों? सरकारी निरीक्षण और स्वतंत्र पत्रकारिता की भूमिका अलग-अलग है। विभाग अपनी व्यवस्था की कमियां देखता है, जबकि मीडिया उन कमियों को जनता के सामने रखता है। दोनों भूमिकाएं एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकतीं। असली परीक्षा आदेश की नहीं, उसके इस्तेमाल की होगीअब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि स्कूलों में जारी निर्देशों को जमीनी स्तर पर संस्था प्रधान और अधिकारी किस तरह लागू करते हैं। यदि पत्रकार को स्कूल की इमारत, सुविधाओं और व्यवस्थाओं की रिपोर्टिंग करनी है तो क्या उसे हर बार अनुमति के लिए इंतजार करना होगा? अनुमति देने या रोकने का कोई लिखित और पारदर्शी आधार होगा? और अगर किसी स्कूल में गंभीर कमी सामने आती है तो उसे सार्वजनिक करने में कोई प्रशासनिक बाधा तो नहीं आएगी? सरकार को इन सवालों पर स्पष्टता देनी होगी।बच्चों की निजता की रक्षा जरूरी है, लेकिन उसी बहाने स्कूलों की जवाबदेही पर पर्दा नहीं पड़ना चाहिए। राजस्थान के सरकारी स्कूल लाखों बच्चों का भविष्य तैयार करते हैं। इसलिए वहां सुरक्षा भी जरूरी है और पारदर्शिता भी।फिलहाल दिलावर की सफाई ने इतना जरूर स्पष्ट किया है कि सरकार इसे मीडिया बैन का मामला नहीं मानती। लेकिन अब असली सवाल यही है कि स्कूल के गेट पर ‘मीडिया प्रतिबंधित नहीं’ लिखा होगा या ‘अनुमति के बाद प्रवेश’—और इन दोनों के बीच पत्रकारिता की स्वतंत्रता कितनी जगह पाएगी? Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading… Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation उत्तर पश्चिम रेलवे ने 14 घंटे के मेगा टिकट-चेकिंग अभियान में 1,361 यात्री पकड़े, वसूला 9 लाख 17 हजार का जुर्माना नाबालिग बेटी से दुष्कर्म का झूठा मामला दर्ज कराने वाली मां पर ₹5000 का जुर्माना: अजमेर पॉक्सो कोर्ट की सख्त कार्रवाई