24 News Update चित्तौड़गढ़। मेवाड़ विश्वविद्यालय में 3-4 अप्रैल को आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी “ग्रामीण विकास और सतत आजीविका के लिए पारंपरिक ज्ञान, हरित अर्थव्यवस्था और उद्यमिता” में शिक्षा के मूल्यों और भविष्य की दिशा पर गहन मंथन हुआ। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि एवं तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए इतिहासकार और ग्लोबल हिस्ट्री फोरम के संस्थापक महासचिव प्रो. अजात शत्रु शिवरती ने कहा कि नई शिक्षा नीति केवल ज्ञान नहीं, बल्कि संस्कार देने का माध्यम बनेगी।
उन्होंने कहा कि आज के भौतिकवादी और तकनीकी युग में मूल्य-आधारित शिक्षा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों में विनम्रता, ईमानदारी, सहानुभूति और अनुशासन जैसे गुणों का विकास करना भी उतना ही जरूरी है। ऐसी शिक्षा ही बच्चों को सही-गलत में अंतर करना सिखाती है और समाज में बढ़ते अपराध व स्वार्थ को कम करने में मददगार साबित हो सकती है।
प्रो. शिवरती ने कहा कि संस्कारयुक्त शिक्षा ही भारत को 2047 तक ‘विश्वगुरु’ बनाने की दिशा में सबसे मजबूत आधार तैयार कर सकती है। यह न सिर्फ अच्छे प्रोफेशनल, बल्कि अच्छे नागरिक तैयार करती है, जो मानसिक रूप से संतुलित और जिम्मेदार हों।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सिद्धार्थ राजहंस (यूएन पॉलिसी एडवाइजर, भारत सरकार) ने भी ग्रामीण विकास और हरित अर्थव्यवस्था के महत्व पर विचार रखे। संगोष्ठी की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के चेयरपर्सन गोविंदलाल गदिया ने की, जबकि कुलपति प्रो. आलोक मिश्रा ने स्वागत उद्बोधन दिया।
इस अवसर पर प्रेम कुमार, प्रो. हनुमान प्रसाद, प्रो. जीवन सिंह खरकवाल, प्रो. जी. एल. मेनारिया, डॉ. हेमेंद्र सारंगदेवत, प्रो. एम. एल. मांडोत, डॉ. राम सिंह राठौड़ और डॉ. सुरेन्द्र चौहान सहित अनेक शिक्षाविद और विशेषज्ञ मौजूद रहे।
संगोष्ठी में पारंपरिक ज्ञान, उद्यमिता और हरित अर्थव्यवस्था के माध्यम से ग्रामीण विकास के नए आयामों पर भी विस्तृत चर्चा की गई।
संस्कारयुक्त शिक्षा ही 2047 के भारत की असली ताकत: प्रो. अजात शत्रु शिवरती

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