24 News Update उदयपुर। शिक्षा, अर्थव्यवस्था और तकनीक—तीनों के संगम से आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को नई दिशा देने के उद्देश्य से राजस्थान विद्यापीठ की मेजबानी में दो दिवसीय वेस्ट जोन वाइस चांसलर्स सम्मेलन का मंगलवार को भव्य शुभारंभ हुआ। Association of Indian Universities के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन का केंद्रीय विषय रहा—“स्वदेशी, आर्थिक राष्ट्रवाद और तकनीकी राष्ट्रवाद के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत”।
राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और तेलंगाना सहित पश्चिमी भारत के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों के कुलपति, शिक्षाविद और नीति विशेषज्ञ इस मंथन में जुटे हैं। उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में हरिभाऊ किसनराव बागड़े ने शिक्षा के बदलते स्वरूप और उसके राष्ट्रनिर्माण में योगदान पर गहन विचार रखे।
“पुरातन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संगम ही भविष्य”
राज्यपाल बागड़े ने अपने संबोधन में स्पष्ट कहा कि यदि भारत को फिर से “विश्व गुरु” बनना है तो शिक्षा को केवल डिग्री तक सीमित नहीं रखना होगा, बल्कि उसे जीवनोपयोगी और राष्ट्रोन्मुख बनाना होगा। उन्होंने औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली को शिक्षित बेरोजगारी का एक बड़ा कारण बताते हुए कहा कि गरीबी उन्मूलन का सबसे प्रभावी हथियार शिक्षा ही है।
उन्होंने शिक्षकों का आह्वान करते हुए एक रोचक रूपक दिया—“शिक्षक हनुमान हैं और मैं जामवंत”—अर्थात शिक्षकों में अपार क्षमता है, बस उन्हें अपनी शक्ति का स्मरण कर उसे राष्ट्रहित में उपयोग करना होगा।
विद्यार्थी केंद्रित शिक्षा पर जोर
राज्यपाल ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था का केंद्र विद्यार्थी होना चाहिए। जब तक शिक्षा का हर पक्ष छात्र के सर्वांगीण विकास—बौद्धिक, कौशल और शारीरिक—पर केंद्रित नहीं होगा, तब तक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है।
स्वदेशी विचारों से आत्मनिर्भर भारत
कार्यक्रम में महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री मंजू बाघमार ने कहा कि भारत की असली ताकत अनुसंधान, नवाचार और जागरूक निर्णय क्षमता में निहित है। उन्होंने स्वदेशी और तकनीकी राष्ट्रवाद को भारत की वैश्विक पहचान मजबूत करने का आधार बताया।
सहकारिता और सामाजिक जुड़ाव की शिक्षा
विद्यापीठ के कुलपति प्रो. एस. एस. सारंगदेवोत ने स्वागत भाषण में कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने के केंद्र न बनें, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के वाहक बनें। सहकारिता आधारित मॉडल को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए उन्होंने शिक्षा में नैतिकता, कौशल और स्वावलंबन के समावेश पर बल दिया। कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर ने संस्थान की विकास यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि 1937 में मात्र 3 रुपये से शुरू हुई यह संस्था आज 87 करोड़ के वार्षिक बजट और 11 हजार से अधिक विद्यार्थियों तक पहुंच चुकी है।
भारतीय ज्ञान प्रणाली की वापसी की जरूरत
प्रो. विनय पाठक ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपराओं की उपेक्षा के कारण आज स्वदेशी शिक्षा प्रणाली को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। उन्होंने स्थानीय प्रतिभाओं और नवाचार आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
आर्थिक राष्ट्रवाद और आत्मनिर्भरता का सूत्र
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य प्रो. गौरव वल्लभ ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में आत्मनिर्भरता अनिवार्य हो चुकी है। स्वदेशी उत्पादन, निर्यात संवर्धन और अनुसंधान आधारित शिक्षा ही इसका मूल आधार हैं।
AIU की वैश्विक दृष्टि
डॉ. पंकज मित्तल ने विश्वविद्यालयों के अंतरराष्ट्रीयकरण और भारतीय विद्यार्थियों की वैश्विक भागीदारी पर प्रकाश डालते हुए स्वदेशी शिक्षा के विस्तार की संभावनाओं को रेखांकित किया। इस अवसर पर “University News” के विशेष अंक का विमोचन भी किया गया।
तकनीकी सत्रों में गहन मंथन
सम्मेलन के दौरान आयोजित तकनीकी सत्रों में स्वदेशी शिक्षा प्रणाली, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार पर विस्तृत चर्चा हुई—
पहला सत्र: “स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा व्यवस्था का पुनर्रचना”
अध्यक्षता: प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा
चर्चा के केंद्र में भारतीय ज्ञान परंपरा, स्थानीय उद्योगों से जुड़ी शिक्षा और कौशल आधारित पाठ्यक्रम रहे।
दूसरा सत्र: “स्वदेशी तकनीकों में अनुसंधान और विकास”
अध्यक्षता: प्रो. अतनु भट्टाचार्य
इसमें डॉ. प्रमोद येवले सहित विशेषज्ञों ने स्टार्टअप इकोसिस्टम, उद्योग-विश्वविद्यालय साझेदारी और अनुसंधान सहयोग पर विचार साझा किए। शताब्दी व्याख्यान में भगवती प्रसाद शर्मा और डॉ. अतुल कोठारी ने स्वदेशी शिक्षा दर्शन और आर्थिक राष्ट्रवाद के आयामों पर अपने विचार रखे।
भव्य आयोजन, राष्ट्रीय विमर्श
सम्मेलन में 150 से अधिक कुलपति ऑफलाइन और 160 से अधिक प्रतिभागी ऑनलाइन जुड़े हैं। आयोजन सचिव प्रो. युवराज सिंह राठौड़ ने बताया कि यह सम्मेलन विद्यापीठ में पहली बार आयोजित हो रहा है, जिसका समापन बुधवार को होगा। राज्यपाल के आगमन पर NCC कैडेट्स द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन से हुआ।

