24 News update उदयपुर। नगर निगम के शहरी सेवा शिविरों में पट्टे की उम्मीद लेकर पहुंच रहे शहरवासियों के सामने यहां के महारथी और घुटे हुए धुरंधर कर्मचारी व अफसर ऐसा पेच खड़ा कर रहे हैं कि जिसने निगम की पूरी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गजब की फकीरी, गजब की मनमानी चल रही है। या ​तो वे इतने ज्यादा भोले बन रहे हैं कि नियमों के बारे में पता ही नहीं है या फिर कुछ खास वजहों से पत्ता तक नहीं हिलाना चाहते हैं। इन महारथियों की कार गुजारियों का आज हम खबर में कच्चा चिट्ठा खोलने वाले हैं। आपको बता दें कि मामला 69ए के तहत पट्टा जारी करने से जुड़े उन प्रकरणों का है, जिनमें आवेदकों से दस्तावेज लिए गए, प्रक्रिया आगे बढ़ी और नगर निगम ने सरकारी खर्च पर समाचार पत्रों में आम सूचना तक प्रकाशित कर दी। लेकिन ऐन मौके पर आवेदकों को यह कहकर टरका दिया है कि वे स्टेट ग्रांट एक्ट के तहत आवेदन करें। अब ये क्या मजाक चल रहा है। क्या अफसर और कर्मचारी आंख मूंद कर नींद में या किसी खुमारी में काम कर रहे हैं या फिर उनकी आंखों पर भी किसी खास तरह के पट्टी बंधी है।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि आवेदकों के पास संपत्ति से संबंधित पंजीकृत दस्तावेज और नगर निगम से स्वीकृत नक्शे मौजूद हैं। इसके बावजूद अब उनसे तत्कालीन राजघरानों या राजाओं-महाराजाओं की ओर से जारी पुराने पट्टे और उनका हिंदी अनुवाद मांगा जा रहा है। याने रजवाड़ों के दस्तावेजों की चक्की में पिसते रहो, ये आमू सूचना का आम चूस कर फेंकते रहेंगे। गजब की सीनाजोरी का आलम है।
आम आदमी के सामने सबसे बड़ा संकट यही है कि जिस दस्तावेज को वह दशकों से तलाश भी नहीं पा रहा है उसे आखिर उपलब्ध कहां से कराएगा? राजे महाराजाओं के दस्तावेज उसके पास होते तो नगर निगम की जरूरत ही कहां रहती। यह काम तो निगम को करना चाहिए। अफसर जनता के पैसों से तनख्वाह ले रहे हैं। उनकी ओर से पहल की जानी चाहिए कि रजवाड़ों के दस्तावेजों को उपलब्ध करवाएं या फिर हर आवेदक तक उनकी पहुंच सुलभ करवाएं। मगर यहां तो ढीठ अफसर खुद बाधा बने हुए हैं। सौ—सौ पैंतरे चल रहे हैं कि कैसे भी हो ये काम तो हर हाल में ना हो!!

पहले दस्तावेज लिए, फिर आम सूचना छापी… अब कह रहे हम आपके हैं कौन???
लगता है ये पिक्चर चल रही है जिसमें निगम खुद विलेन का रोल अदा कर रहा है। पूरे प्रकरण की सबसे चौंकाने वाली कड़ी निगम की अपनी प्रक्रिया है। जब 69ए के तहत आवेदन स्वीकार किए गए तो संबंधित दस्तावेजों के आधार पर आम सूचना प्रकाशित की गई। इसका सीधा अर्थ यही था कि संपत्ति पर किसी व्यक्ति या संस्था को आपत्ति हो तो वह निर्धारित अवधि में सामने आए।
बताया जा रहा है कि इन मामलों में आम सूचना प्रकाशित होने के बाद कोई आपत्ति भी सामने नहीं आई। इसके बावजूद अब आवेदकों को पट्टा देने के बजाय दूसरी श्रेणी में आवेदन करने की सलाह दी जा रही है। यानी जिस सरकारी प्रक्रिया ने आवेदक को यह भरोसा दिलाया कि उसका मामला नियमानुसार आगे बढ़ रहा है, वही प्रक्रिया अब उसके सामने नई बाधा बनकर खड़ी हो गई है। इससे सवाल सिर्फ पट्टा मिलने का नहीं, बल्कि निगम की साख पर बट्टे, विश्वसनीयता और जवाबदेही का है।

पिछली सरकार में जो कागज वेलिड थे, वे हो गए इन वेलिड?
इस मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि आवेदकों के अनुसार पिछली सरकार के दौरान इसी प्रकार के दस्तावेजों के आधार पर 69ए के अंतर्गत पट्टे जारी किए गए थे। यदि यह तथ्य रिकॉर्ड से पुष्ट होता है तो वर्तमान प्रक्रिया पर सवाल और गहरा जाता है। एक ही नगर निगम क्षेत्र में, समान प्रकृति के दस्तावेजों के आधार पर पहले पट्टा जारी हो और बाद में उसी प्रकार के दस्तावेज को अपर्याप्त मान लिया जाए तो आवेदक स्वाभाविक रूप से प्रक्रिया की समानता पर सवाल उठाएंगे। नियमों की व्याख्या बदली है तो उसका स्पष्ट आधार सामने आना चाहिए। अगर कोई नया दस्तावेज अनिवार्य किया गया है तो उसकी जानकारी आवेदन के समय दी जानी चाहिए थी। लेकिन प्रक्रिया पूरी होने के बाद शर्तों का स्वरूप बदलता दिखाई दे तो इससे आवेदक की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।

राजा-महाराजा का पट्टा मांगना कितना व्यावहारिक?
निगम द्वारा पुराने राजकीय पट्टे और उनका हिंदी अनुवाद मांगे जाने की बात ने आवेदकों की मुश्किल और बढ़ा दी है। जिन परिवारों के पास वर्तमान में पंजीकृत दस्तावेज मौजूद हैं, उनसे सदियों पुराने राजकीय दस्तावेज मांगना व्यवहारिक रूप से कितनी बड़ी बाधा है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यही वजह है कि आवेदकों का कहना है कि यदि ऐसे पुराने दस्तावेज अनिवार्य थे तो नगर निगम को शुरुआत में ही इसकी स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए थी। लोगों ने दस्तावेज जुटाए, आवेदन किए, प्रक्रिया में समय लगाया और फिर सरकारी खर्च से प्रकाशित आम सूचना के बाद यह उम्मीद बनी कि अब प्रकरण मंजिल तक पहुंचेगा। लेकिन अब उसी प्रक्रिया को दूसरी दिशा में मोड़ दिया गया।

आम सूचना दो बार निकली, इसका खर्चा अफसरों की तनख्वाह से काटो

मामले को और पेचीदा बनाती है आम सूचना के दो बार प्रकाशित होने की बात। एक बार नहीं, बल्कि दो बार सार्वजनिक सूचना प्रकाशित होने के बावजूद यदि अंततः आवेदकों को यह कहा जाए कि 69ए में पट्टा नहीं मिलेगा और वे स्टेट ग्रांट एक्ट में आवेदन करें, तो नगर निगम की प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकारी धन खर्च हुआ है उसकी भरपाई जनता क्यों करें?? अफसरों की तनख्वाह में से इसका पैसा कटना चाहिए।


Discover more from 24 News Update

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

desk 24newsupdate's avatar

By desk 24newsupdate

Watch 24 News Update and stay tuned for all the breaking news in Hindi ! 24 News Update is Rajasthan's leading Hindi News Channel. 24 News Update channel covers latest news in Politics, Entertainment, Bollywood, business and sports. 24 न्यूज अपडेट राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ हिंदी न्‍यूज चैनल है । 24 न्यूज अपडेट चैनल राजनीति, मनोरंजन, बॉलीवुड, व्यापार और खेल में नवीनतम समाचारों को शामिल करता है। 24 न्यूज अपडेट राजस्थान की लाइव खबरें एवं ब्रेकिंग न्यूज के लिए बने रहें ।

Leave a Reply

error: Content is protected !!

Discover more from 24 News Update

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Discover more from 24 News Update

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading