24 News update उदयपुर। झीलों की नगरी उदयपुर में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर को पिछोला झील में पेट्रोल और डीजल से संचालित दो नावों को सीज कर दिया गया। नगर निगम ने इसे हाईकोर्ट के आदेशों की पालना बताते हुए सख्त कार्रवाई कहा, लेकिन इस कार्रवाई ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है—जब झील में लंबे समय से नियमों के विरुद्ध नावें चल रही थीं, तो कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई?
नगर निगम आयुक्त अभिषेक खन्ना के निर्देश पर अधिशाषी अभियंता यांत्रिक लखनलाल बैरवा के नेतृत्व में टीम ने पिछोला झील में पेट्रोल-डीजल से चल रही दो नावों को अग्रिम आदेश तक सीज किया। निगम का कहना है कि यह कदम राजस्थान हाईकोर्ट के 30 मार्च 2022 के आदेशों की पालना में उठाया गया है, जिसमें झीलों में पेट्रोल-डीजल नावों को हटाकर बैटरी या सोलर ऊर्जा आधारित नावें चलाने के निर्देश दिए गए थे। 10 मई 2025 को जिला झील संरक्षण एवं विकास समिति की बैठक में भी यह तय किया गया था कि 15 अगस्त 2025 तक पेट्रोल-डीजल नावों को सोलर या बैटरी आधारित नावों में परिवर्तित किया जाए। संबंधित होटल संचालकों को नोटिस भी दिए गए थे, लेकिन इसके बावजूद नावों का संचालन जारी रहा।
कार्रवाई पर सवाल: इतने दिन तक कौन था मौन?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अदालत के आदेश 2022 में आ चुके थे और 2025 में भी प्रशासनिक निर्णय हो चुका था, तो फिर अवैध नावें 2026 तक कैसे चलती रहीं? नोटिस नोटिस का खेल क्यों खेल रहे थे। प्रशासन और परिवहन विभाग को इन नावों का संचालन दिखाई नहीं दे रहा था, या फिर सब कुछ जानते हुए भी अनदेखा किया जा रहा था? सूत्रों का कहना है कि पिछोला झील में कुछ होटलों की ओर से न केवल नियमों के विरुद्ध नावें चलाई जा रही हैं, बल्कि पर्यटकों को बोटिंग भी करवाई जा रही है। यह पूरी तरह नियमों के विपरीत है, क्योंकि बोटिंग का अधिकार केवल सरकार द्वारा टेंडर के माध्यम से अधिकृत संचालकों को ही दिया जाता है।
टेंडर एक तरफ, समानांतर ‘इललीगल सिस्टम’ दूसरी तरफ?
दरअसल, जिला प्रशासन झीलों में बोटिंग के लिए करोड़ों रुपये के टेंडर जारी करता है और अधिकृत नावें ही पर्यटकों को घुमाने की अनुमति रखती हैं। लेकिन आरोप यह भी है कि इसके समानांतर एक अवैध तंत्र खड़ा हो चुका है, जहां कुछ होटल संचालक बिना टेंडर के नावें चलाकर सैलानियों को घुमा रहे हैं। इससे सरकार को राजस्व का नुकसान तो हो ही रहा है, साथ ही पर्यावरणीय नियमों की भी खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि मौके पर निरीक्षण के दौरान अफसरों को पेट्रोल-डीजल नावें तो दिखाई देती हैं, लेकिन होटल संचालकों द्वारा नियमों के विपरीत करवाई जा रही बोटिंग पर अक्सर खामोशी छाई रहती है।
नियम क्या कहते हैं?
नियमों के अनुसार झीलों में बोटिंग केवल टेंडर या लीज पर दी गई अधिकृत नावों से ही करवाई जा सकती है। होटल संचालकों के पास ऐसा कोई टेंडर नहीं होता, वे सिर्फ फिटनेस और लाइसेंस शुल्क जमा करते हैं। इसके बावजूद पर्यटकों को झील में घुमाने का काम जारी है। इसके अलावा नाव संचालन के लिए परिवहन विभाग से लाइसेंस लेने से पहले नगर निगम और सिंचाई विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लेना जरूरी होता है। लेकिन इसे लेकर भी संशय है। जानकारों का कहना है कि उदयपुर एक बड़ा पर्यटन केंद्र होने के कारण कई बार उपर के सिस्टम पर लोगों को उपकृत करने का दबाव रहता है। वीआईपी मेहमानों या प्रभावशाली लोगों को झील में सैर फ्री फंड में करवाने की व्यवस्था भी इसी तंत्र के जरिए की जाती है। ऐसे में अवैध नाव संचालन करने वाले लोग सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाते हैं।

