24 News update कोटा। देशभर में जहाँ दशहरे पर रावण के पुतले को जलाकर उसका वध करने की परंपरा है, वहीं कोटा के नांता क्षेत्र में रावण का वध अग्नि से नहीं, बल्कि कुश्ती लड़कर पैरों से कुचलकर किया जाता है। यह अनोखी परंपरा करीब डेढ़ सौ साल से अधिक पुरानी है और आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। गुरुवार सुबह 10 बजे लिम्बजा मातेश्वरी मंदिर स्थित बड़ा अखाड़ा में पहलवानों ने प्रतीकात्मक कुश्ती लड़कर रावण और मंदोदरी की प्रतिमाओं को पैरों तले रौंद दिया। इस दौरान जयकारों की गूंज, ढोल-नगाड़ों की थाप और माता लिम्बा के जयघोष से अखाड़ा रणक्षेत्र की तरह गूंज उठा। मिट्टी से रावण, ज्वारों की हरियाली से जीवन बड़ा अखाड़ा नांता के अध्यक्ष सोहन जेठी ने बताया कि जेठी समाज के लोग अखाड़े की पवित्र मिट्टी से हर साल रावण और मंदोदरी की प्रतिमाएँ तैयार करते हैं। इसमें दूध, घी, दही, शहद और गेहूं मिलाकर मिट्टी को उपजाऊ बनाया जाता है, ताकि उस पर हरे-भरे ज्वार उग सकें। नवरात्र के नौ दिनों तक इस रावण पर उगे ज्वार उसकी शक्ति और जीवन का प्रतीक रहते हैं।दशहरे की सुबह जब पहलवान प्रतिमा से कुश्ती लड़कर उसे कुचलते हैं, तो सबसे पहले इन ज्वारों को निकालकर समाज में बांटा जाता है। इसे समृद्धि और एकता का प्रतीक माना जाता है। नवरात्र का तप और गरबा की भक्ति नवरात्र के नौ दिनों तक लिम्बजा मातेश्वरी मंदिर के पट बंद रहते हैं। केवल पुजारी और व्यवस्थापक ही मंदिर में प्रवेश करते हैं। इस दौरान अखाड़े में रोजाना भक्ति भजन, देवी महिमा के गीत और देर रात तक गरबा का आयोजन होता है। दशहरे की सुबह जैसे ही पट खुलते हैं, अखाड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक एकता का विराट मंच बन जाता है। राजपरिवार और इतिहास से गहरा रिश्ता नांता का यह अखाड़ा केवल पूजा स्थल नहीं बल्कि इतिहास का साक्षी भी है। लगभग 300 साल पहले गुजरात के कच्छ क्षेत्र से आए जेठी समाज के पहलवानों ने यहाँ अपनी परंपरा बसाई थी। उनकी कुश्ती कला से प्रभावित होकर कोटा के महाराजा उम्मेद सिंह ने उन्हें यहाँ बसने का आग्रह किया और किशोरपुरा व नांता में अखाड़े बनवाए।रियासत काल में दशहरे पर बृजनाथजी की सवारी निकलती थी, जिसकी सुरक्षा का दायित्व इन्हीं पहलवानों को सौंपा जाता था। तब उनके परिवारों का खर्च दरबार उठाता था। आज भी कोटा शहर में जेठी समाज के लगभग 300 परिवार इस गौरवशाली विरासत को सहेजे हुए हैं। अहंकार पर जीत का प्रतीक रावण वध के दौरान उसकी अहंकारी हंसी और आवाज माइक से बजाई गई, जिसे सुनकर वातावरण और भी जीवंत हो गया। अंत में पहलवानों ने प्रतिमाओं को कुचलकर सत्य की असत्य पर विजय का संदेश दिया। इसके बाद ज्वारों का वितरण कर बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया गया और पूरे समाज की खुशहाली की कामना की गई। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation पूर्व विधायक बंशीलाल खटीक सड़क हादसे में गंभीर घायल, उदयपुर रेफर एएसआई पद पर प्रमोशन होते ही हाथों में मची खुजली, लव मैरिज करने वाले से मांगी रिश्वत, रंगे हाथों धरा गया