24 न्यूज अपडेट. नई दिल्ली। त्वरित न्याय मिले तो ऐसा मिले जो सद्गुरू के फाउंडेशन को मिला है। मामला हाईकोर्ट से सीधा सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया और कुछ ही दिनों में फैसला भी हो गया। केस सुप्रीम कोर्ट ने बंद करते हुए कहा कि फाउंडेशन सही है। लड़कियां अपनी मर्जी से आश्रम में रह रही हैं। डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने शुक्रवार को कहा कि मद्रास हाईकोर्ट का ऐसी याचिका पर जांच के आदेश देना सही नहीं था। आश्रम में पुलिस का छापा गलत था। लिहाजा ने दो लड़कियों को बंधक बनाने के मामले में सद्गुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन के खिलाफ केस बंद कर दिया गया। सवाल उठता है कि क्या इस तरह का न्याय सबको मिलता है। यदि हां तो अब तक सुप्रीम कोर्ट में लाखों केस पेंडिंग नहीं होते। यदि ऐसा होने लगा है तो सलाम है सुप्रीम कोर्ट को और अगर नहीं हो रहा है तो सोचने की बात है कि सब मामलों में क्या ऐसे ही तेजी दिखाई जाएगी। बहरहाल, कोर्ट ने कहा कि लड़कियों के पिता की याचिका गलत है, क्योंकि दोनों लड़कियां बालिग हैं, जब वे आश्रम में गई तो उनकी उम्र 27 और 24 साल थी। वो अपनी मर्जी से आश्रम में रह रही हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस फैसले का असर सिर्फ इसी केस तक सीमित रहेगा। ईशा फाउंडेशन के खिलाफ रिटायर्ड प्रोफेसर एस कामराज ने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। उनका आरोप था कि आश्रम में उनकी बेटियों लता और गीता को बंधक बनाकर रखा गया है। 30 सितंबर को हाईकोर्ट ने मामले के खिलाफ जांच करने और ईशा फाउंडेशन से जुड़े सभी क्रिमिनल केसों की डिटेल पेश करने का आदेश दिया था। अगले दिन 1 अक्टूबर को करीब 150 पुलिसकर्मी फाउंडेशन के हेडक्वार्टर पहुंचे थे। सद्गुरु ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 3 अक्टूबर को मद्रास हाईकोर्ट के फाउंडेशन के खिलाफ पुलिस जांच के आदेश पर रोक लगा दी और आज 18 अक्टूबर को फैसला आ गया। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस से पुलिस जांच की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा था। आज तमिलनाडु पुलिस ने रिपोर्ट पेश की। सुप्रीम कोर्ट में ईशा फाउंडेशन की तरफ से मुकुल रोहतगी ने दलीलें पेश की। वहीं, तमिलनाडु सरकार का पक्ष सीनियर वकील सिद्धार्थ लूथरा ने रखीं। केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें दीं। मुकुल रोहतगीः तमिलनाडु पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट में लिखा है कि दोनों महिलाओं ने खुद की इच्छा से वहां रहने का फैसला किया है। दोनों महिलाओं ने भी कोर्ट को यही बताया है। ऐसे में केस को बंद कर देना चाहिए। सिद्धार्थ लूथरा ने कहा किकेस बंद करने के फैसले से पुलिस के जांच करने के अधिकार पर कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। मुकुल रोहतगी इस पर बोले कि जैसा सिद्धार्थ लथूरा कह रहे हैं, अगर कोर्ट ने वैसा कमेंट किया तो ईषा फाउंडेशन जैसी संस्था को निशाना बनाने वाले लोग इस कमेंट का दुरुपयोग करेंगे। तुषार मेहता ने कहा कि रोहतगी की दलील का समर्थन करता हूं। जो दर्शाया गया है, वह वास्तविकता से अलग है। सिद्धार्थ लथूरा जैसा कह रहे हैं, अगर कोर्ट वैसी कोई टिप्पणी करेगा, तो क्लिकबेट चलाने वाले मीडिया हाउस में गलत हेडलाइन छपेगी। सिद्धार्थ लूथरा भी बोले कि पुलिस छापे में पता चला है कि फाउंडेशन में कई नियमों का पालन नहीं किया गया। इंटरनल कमप्लेंट कमेटी का भी गठन नहीं किया गया है। एक्स-रे मशीन का लाइसेंस भी खत्म हो चुका है। सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि यह स्पष्ट हो कि इस केस के बंद होने से फाउंडेशन के किसी अन्य मामले पर कोई असर नहीं हो। कामराज ने कहा कि हमने याचिका तब लगाई थी, जब बेटियों ने कहा था कि वो आमरण अनशन करने जा रही हैं। इस पर सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि माता-पिता को ऐसी याचिकाएं फाइल करने की बजाय अपने एडल्ट बच्चों का दिल जीतना चाहिए। गुस्सा कितना ही ज्यादा क्यों न हो, बेटियां एडल्ट हैं। हम उन पर अपने फैसले नहीं थोप सकते। आपको बता दें कि तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर एस कामराज ने कहा था कि आश्रम ने उनकी बेटियों को बंधक बना लिया है। उन्हें तुरंत मुक्त कराया जाए। कामराज ने अपनी याचिका में कहा था कि ईशा फाउंडेशन ने बेटियों का ब्रेनवॉश किया, जिसके कारण वे संन्यासी बन गईं। बेटियों को कुछ खाना और दवा दी जा रही है। इससे उनकी सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो गई है। जब से बेटियों ने हमें छोड़ा है, हमारा जीवन नर्क बन गया है। कामराज की बड़ी बेटी गीता ने इंग्लैंड की एक यूनिवर्सिटी से एम टेक किया है। उसे 2004 में उसी यूनिवर्सिटी में करीब 1 लाख रुपए के वेतन पर नौकरी मिली थी। उसने 2008 में अपने तलाक के बाद ईशा फाउंडेशन में योग क्लासेज में भाग लेना शुरू किया था। इसके बाद गीता की छोटी बहन लता भी उसके साथ ईशा फाउंडेशन में रहने लगी। दोनों बहनों ने अपना नाम बदल लिया और अब माता-पिता से मिलने से भी इनकार कर रही हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने 30 अक्टूबर को सद्गुरु से पूछा था, “जब आपने अपनी बेटी की शादी कर दी है, तो दूसरों की बेटियों को सिर मुंडवाने और सांसारिक जीवन त्यागकर संन्यासियों की तरह रहने के लिए क्यों प्रोत्साहित कर रहे हैं। मामले की सुनवाई जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम और जस्टिस वी शिवगणनम की बेंच ने की थी। जस्टिस सुब्रमण्यम ने ईशा फाउंडेशन से कहा था कि आप नहीं समझेंगे क्योंकि आप एक खास पार्टी के लिए पेश हो रहे हैं। यह अदालत न तो किसी के पक्ष में है और न ही किसी के खिलाफ है। हम केवल याचिकाकर्ता के साथ न्याय करना चाहते हैं।


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By desk 24newsupdate

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