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राष्ट्रीय ज्ञान प्रवृत्तियों और मूल्य संवर्धन को बढ़ाने के लिए सांस्कृतिक और पारिस्थितिक सद्भाव आवश्यक : स्वामी योगेश वैदिक 

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24 न्यूज़ अपडेट उदयपुर 11अगस्त :  सांस्कृतिक और पारिस्थितिक सद्भाव को बढ़ावा देने की भावना से, स्वामी दयानंद सरस्वती की 200वीं जयंती के उपलक्ष्य में हाल ही में भूपाल नोबल्स के कुम्भा सभागार में एक स्मरणोत्सव समारोह आयोजित किया गया। 19वीं शताब्दी में आर्य समाज दार्शनिक स्कूल के मुख्य संस्थापक संरक्षक के रूप में, उन्होंने विदेशी शासन और सामाजिक वर्जनाओं का सामना कर रहे पराधीन भारतीयों के बीच जागृति पैदा की। विज्ञान फैकल्टी की डीन डॉ. रेणु राठौड़ और अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. जयश्री सिंह ने महाविद्यालय में सार्वभौमिक सतत सह-अस्तित्व लक्ष्यों पर केंद्रित एक अभिविन्यास कार्यक्रम का आयोजन किया। गांधीनगर आर्य समाज आश्रम के स्वामी योगेश वैदिक आचार्य ने “सनातन धर्म” के पांच-बिंदु पैमाने पर प्रकाश डाला, जिसमें सत्य, अहिंसा, आत्म-नियंत्रण, आत्मरक्षा और अपमानजनक आचरण के खिलाफ सुरक्षा पर जोर दिया गया ताकि वैमनस्य और अपमान को बढ़ावा देने वाले कारकों का मुकाबला किया जा सके। राष्ट्रीय ज्ञान प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने और मूल्य संवर्धन को बढ़ाने के लिए सांस्कृतिक और पारिस्थितिक सद्भाव को बढ़ावा देने को प्राथमिकता देना महत्वपूर्ण है। इस प्रतिष्ठित संस्थान में शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में नवीनतम विकास पर अपडेट रहें : ज्ञानप्रवृत्ति, शिक्षा व मूल्यवर्धन। इस अवसर पर विभिन्न संकायों के विद्यार्थि और शिक्षक कार्यक्रम में शामिल हुए। आर्य समाज फाउंडेशन के डॉ. भूपेंद्र शर्मा ने कार्यक्रम का संचालन किया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि राजसमंद से राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित डॉ. रचना तेलंग, डॉ. वैदिक आर्य, डॉ. कुसुमलता दर्जी, डॉ. नारायण सिंह राव, श्री राजकुमार मेनारिया- मार्शल आर्ट अकादमी के निदेशक, श्री संजय व्यास, श्री नरेंद्र माथुर- इलेक्ट्रिक इंजीनियर उदयपुर, श्रीमती चंद्रकांता वैदिक, डॉ. कमल सिंह राठौड़, पीआरओ, बीएन यूनिवर्सिटी उदयपुर थे। डॉ. जयश्री सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, अंग्रेजी विभागाध्यक्ष ने अतिथियों-वक्ताओं द्वारा विचारपूर्ण प्रवचनों में संबोधित की गई अंतर्दृष्टिपूर्ण प्रेरणा के लिए धन्यवाद और आभार व्यक्त किया।स्वामी दयानन्द सरस्वती ने उदयपुर के गुलाब बाग़ में स्थित नवलखा महल में तत्कालीन महाराणा सज्जन सिंहजी के अनुरोध पर ई.स.1875 में आतिथ्य ग्रहण कर विश्वख्यात पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश लिखा था।

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