उदयपुर। पंजाब के राज्यपाल महामहिम गुलाबचंदजी कटारिया साहब आज दीपावली की सजावट देखने पूरे राजनीतिक लाव-लश्कर और सुरक्षा तामझाम के साथ बाजार पधारे तो स्वागत का समां बंध गया। भाई साहब के आभामंडल में पॉलिटिकल ज्योतिपुंज बनने का ख्वाब संजोए दीपक टिमटिमाते हुए दिखाई दिए तो कुछ तारामंडल, कुछ, सितारे, कुछ निहारिकाएं कुछ कंदीलें, कुछ जमीन चक्कर, कुछ आर्टिफिशियल लडिय़ां-झूमर तो कुछ रॉकेट वाले पटाखे भी यहां-वहां दिखलाई पड़े। महामहिम का आना हर बार अपणायत वाला और दिल में बसे किसी ‘मेंटोर’ ‘मोटीवेटर’ के आने जैसा होता है। लेकिन इस बार जाम से परेशान शहर में उनका सहज आगमन शहरवासियों की पेशानी पर बल डाल रहा है। आज अति व्यस्त बाजार में कटारियाजी के आगमन के बाद यातायात पुलिस ने आमजन और उनके बीच जो वीआईपी वाली लक्ष्मण रेखा खींच दी वह जागरूक लोगों को बहुत खल रही है। आगे-आगे लवाजमा चल रहा है, पीछे-पीछे व्यस्त बाजार में यातायात को धकेलते हुए पुलिस का अमला। इस बारे में शेयर किए गए एक वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि व्यस्त बाजार में आड़ी मोटर साइकिल लगा कर पूरा ट्रैफिक रोक दिया गया है। उसके बाद महामहिम का वाहन चल रहा है व उससे सुरक्षित दूरी पर भाई साहब का लवाजमा चल रहा है। यह दृश्य इससे पहले उदयपुर में नहीं देखा गया। यह तो सब जानते हैं कि दीपावली का त्योहार मनाने कई लोग हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके अपने घर आए हैं। कई लोग बड़ी ही उम्मीदों के साथ रोशनी देखने घर से निकले हैं तो कई लोग सालभर में बड़ी मुश्किल से मिलने वाली चंद गिनती की छुट्टियों के अनमोल पलों को यादगार बनाने बाजार आए हैं। मगर यहां वीआईपी कल्चर के कारण बेवजह रोकना ना सिर्फ गलत है बल्कि उनकी उम्मीदों पर तुषारापात भी है। अव्वल तो जो वीआईपी हैं वे खुद सोचें कि कहीं मेरे जाने से मेरे अपने शहरवासियों के आवागमन में कोई बाधा तो नहीं आ रही है। कहीं मुझे वोट देकर बरसों तक अपने दिलों पर राज करने देने वालों को तकलीफ तो नहीं हो रही है। लेकिन यहां ऐसा होता दिख नहीं रहा है। जाम तब भी लगा था जब भाई साहब आयड़ में फेंसिंग का उदï्घाटन करने आए थे। आनंद प्लाजा से एकतरफा मार्ग ही खुला था, उसे भी बंद कर दिया गया। तब भी लोगों को यह सब बहुत खटका था मगर जनता का दर्द अनसुना ही रह गया। आज वीआईपी कल्चर का दृश्य देख कर फिर पुराना सवाल धरातल पर लौट आया। दूसरा सवाल यहां के प्रशासन पर उठता है जो सिलेक्टिव आचरण करता है। वीआईपी के लिए अलग, आमजन के लिए अलग। जब एग्जाम होता है तो पूरा शहर जाम हो जाता है। बाहर से आने वाले बच्चे, अभिभावक रेंग-रेंग कर सफर तय करते हैं, बुरी व कड़वी यादें लेकर जाते हैं। लेकिन जब वीआईपी की बात आती है तो हूटर बजाते वाहन चलते हैं, सडक़ें खाली कर दी जाती हैं। लोगों के जीवन का पूरा चक्का थम जाता है फिर चाहे कोई भी चाहे किसी भी इंपोर्टेंट काम से निकला हो। ज्यादा बड़ा वीआईपी हो तो गलियों में आधे पौन घंटे तक यातायात ठूंस दिया जाता है। याने प्राथमिकता में प्रथम वीआईपी आते हैं, उसके बाद अधिकारी व कुछ अन्य विशेषाधिकार प्राप्त लोग और तीसरे नंबर पर जनता आती है। जबकि होना इसका उल्टा चाहिए। वीआईपी अगर बाजार दर्शन के अभिलाषी हैं तो उनके लिए अलग से टाइम स्लॉट तय करके ढिंढोरा पिटवाना चाहिए कि संबंधित पधार रहे हैं। आप अलग रूट से आगे बढ़ें। सूचना गूगल को भी दे दें ताकि युवा पीढ़ी गूगल मैप पर वीआईपी पदचाप को महसूस कर मार्ग परिवर्तन कर अपना व दश का समय बचा सकें। यदि रामा श्यामा का दस्तूर ही निभाना है तो फिर वीआईपी के लिए पहाड़ों में किसी बड़ी एप्रोच से बने रिसोर्ट में स्नेह मिलन जैसे आयोजन होने चाहिए। जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा वाले व्यस्त शहर में वीआईपी का वीआईपी के लिए और वीआईपी के द्वारा वाला कल्चर अब नहीं चलने वाला है। यदि चलेगा तो आमजन भी मन की बात जरूर बोलेगा जो सुननी भी पड़ेगी और अमल में भी लानी पड़ेगी।
मन की बात : भाई साहब और ट्रैफिक जाम की लक्ष्मण रेखा!!!

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