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भाई साहब…….आ गया है आयड़ नदी को ‘खमतखामणा’ कहने का वक्त

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सुशील जैन का विचारोत्तेजक लेख-

24 न्यूज़ अपडेट उदयपुर. कल जब से मानसूनी पानी से करोड़ों की विकासलीला की बेड़ियों में जकड़ी आयड़ नदी को मुक्त करवाया है, पूरे शहर में एक ही चर्चा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? आयड़ नदी के साथ विकास के नाम पर विनाश का यह खेल आखिर किसने, क्यों खेला। कौन जिम्मेदार। वो जिन्होंने नदी के बहाव क्षेत्र में टाइलें लगाईं और सब्ज बाग लगा कर करोड़ों डकार लिए या फिर वो जो चुपचाप यह सब होता देखते रहे। या वो जिम्मेदार हैं जिनका काम विरोध करना था मगर चुप्पी वाला रेनकोट ओढ़कर दुम दबाकर दूर कहीं किसी कोने में छिप गए। शहर की लाइफलाइन से हुआ यह खिलवाड़ लोगों को पसंद नहीं आ रहा है। जब अनचाहे विकास का जाल बिछाया जा रहा था तब से आम जन मानस में यह विचार कौंध रहा था कि पानी आएगा तो क्या होगा? आखिर इतना खर्च, इतनी आपाधापी, इतनी होचपोच क्यों? मानसून से पहले की व्यग्रता साफ बता रही थी कि पूरी दाल ही काली थी, दाल में काला नहीं,,,,उपर से आए बजट को जल समाधि देने का विचार था या फिर आंखों का पानी ही सूख गया था। सोचा था कि जनता इतनी मूर्ख है कि उसके अपने किसी मौलिक विचार का वजूद ही नहीं बचा है इस शहर में। उसे जिस चश्मे से दिखाया जाएगा वहीं देख लिया जाएगा। नदी के साथ ऐसे प्रयोग दुनिया में कहीं नहीं हुए। दुनिया में हीं ऐसी मिसाल नहीं मिलती कि नदी में कृत्रिम पत्थर लगा कर उनको बहने से रोकने के लिए जाली से बांधे जाने का उपक्रम होता हो। दीवारों को लोहे ही जालीनुमा जंजीरों में जकड़ लिया गया हो। जबकि नदी तो मां होती है। किसी भी शहर की जान होती है। उसका अपना इको सिस्टम होता है जिसके दामन में पशु-पक्षी भी पलते हैं तो जीव-जंतु भी पनाह पाते हैं। जो इनसान और जानवरों में फर्क नहीं करती। जो बरसों से अपना स्वरूप आप ही तय करती आई है। कालांतर में जिस-जिस ने नदी के रास्ते में बेईमानी और भ्रष्टाचार की लकीरें खीचने की कोशिश की, उसका खुद का ही अस्तित्व मिता चला गया है। उदयपुर शहर को ही देख लीजिए, यहां की सभ्यताएं सात बार आयड़ नदी पर बसी और उजड़ गईं। उदयपुर में इंसानी वजूद की ऐतिहासिकता और उसके अस्तित्व को आयड़ नदी ने तय किया। जब नदी को लगा कि प्रकृति से दुराचार का पानी सिर के उपर से गुजर रहा है तो उसने अपने दामन का रौद्र विस्तार करते हुए सबको सबक सिखाते हुए खुद में समाहित कर लिया। क्या हम अपने पुरखों के सीखे इस सबक की अनदेखी तो नहींं कर रहे हैं?

नाला बन गई नदी के सूख नहीं रहे आंसू
आयड़ नदी की मौजूदा हालत ऐसी कर दी गई है कि यह नदी से निकल कर नाले की श्रेणी में आ गई है। शहर के कुछ पावरफुल लोगों ने तय कर लिया कि नदी केवल उनकी बनाई एक लकीर में ही बहेगी, आस-पास हम अपना सब्जबाग बनाएंगे। जनता की गाढी कमाई का करोड़ों रूपया फूंक दिया गया। बिना यह सोच समझे कि नदी आएगी और सबको अपने साथ लेकर जाएगी। अहंकारी लोगों ने बार-बार आयड़ नदी का दौरा कर अपनी सोच को उस प्रशासनिक मशीनरी पर थोपा जो पहले से चरणवंदना में बिछी जा रही थी। एक कहानी बहुत मशहूर है-सब राजा की तारीफ करते हैं….कहते हैं वाह! क्या कपडे पहने हैं। लेकिन अंत में एक बालक राजा को आईना दिखाते हुए कहता है-राजाजी आप ने वस्त्र विहीन हैं। तब जाकर राजा को उसकी असलियत का पता चलता है। क्योंकि दरबारी हर बार पूछने पर वंदनगान गाते रहे कि वाह क्या वस्त्र पहन रखे हैं।


बनने लगे चुटकुले, लोग ले रहे मौज
सोशल मीडिया पर आयड़ नदी के विकास के कामों पर कल से लोग जॉक बना रहे हैं। कोई कह रहा है कि उदयसागर चलो, करोड़ो ंका विकास बहकर वहां चला गया है। कोई कह रहा है कि मुझे जरूरत थी, घर पर टॉयलेट में ही टाइलें लगा देता, खामख्वाह पानी में बहा दी। कोई कह रहा है कि एक होटल वाला उदयसागर में गोताखोर लगा कर टाइलें इकट्ठी करवा रहा है। कोई अपनी प्रेमिका से कह रहा है कि मेरा प्यार आयड़ की टाइलों जैसा मजबूत है और घास जैसा नर्म-मुलायम…..। कुल मिलाकर साफ हो गया है कि भद बहुत बुरी पिटी है लेकिन क्या जिम्मेदार लोग उससे सीख लेंगे। क्या थोडी सी भी शर्म दिखाते हुए शहर से माफी मांगेंगे। क्या वे कहेंगे हां, हमसे चूक हो गई थी। या फिर अकड़ बरकरार रहेगी। वैसे जिनके पगफेरे आयड़ में हुए उनकी राजनीतिक ताकत भी आयड़ की इस विनाशलीला से आहत हुई है। आने वाले समय में जनता जवाब मांग सकती है।


अब तो कर लो खमतखामणा
एक और बात आ रही है कि अभी तो पानी उतरने पर पता चलेगा कि विकास रहा या बह गया। जिम्मेदार अपनी गलती मानने को अब तक तैयार नहीं हो रहे हैं। रस्स जल-गई है मगर उसमें से बल नहीं गए हैं। तो उनके लिए साफ कह दें कि ’खमतखामणा’ का मौका आ गया है। नदी से हाथ जोड़कर माफी मांगने का यही सही समय है। मन-वचन और काया से माफी मांगने का समय। नदी में पनपने वाले करोड़ों जीव जंतुओं से क्षमा मांगने का समय। आज खमतखामणा नहीं किया तो कल नदी मौका नहीं देने वाली है क्योंकि उसे सभ्यताओं को बसाने और उजाड़ने का न्याय करना आता है।


आयड़ का प्रयोग सही तो सीसारमा भी ऐसी ही बना दो
सोशल मीडिया पर बहस के दौरान यह प्वाइंट एक वरिष्ठ पत्रकार ने उठाया कि यदि आयड़ में किया गया प्रयोग सही है तो फिर सीसारमा नदी को भी इसी प्रकार का रिवर फ्रंट दे दिया जाए। अगला लक्ष्य सीसारमा नदी विकास कार्य होने चाहिए व उस पर कम से कम 100 करोड़ का खर्चा होना चाहिए ताकि जब सीसारमा चले, तभी से हमें हर साल टाइलें उखडने, घास बहने आदि के मनोरम नजारे देखने को मिल जाएं आयड़ में पानी आने तक का इंतजार नहीं करना पड़े। लोगों का कहना है कि रिवरफ्रंट का विकास मतलब उसके किनारों को सुंदर बनाते हुए जहां भी जगह हो, उसका सौंदर्यीकरण करना है। नदी के इको सिस्टम से छेड़छाड़ उसके साथ किया गया भीषण मजाक है। आयड़ नदी में की गई कारीगरी ने यहां के इंजीनियरों की भी खूब भद पिट रही है। लोग नाम पूछ रहे हैं कि आखिर किसका आइडिया था, किसने अप्रूव किया, किसने इस काम के लिए पैसा दिया व किसकी देखरेख में यह काम होता रहा। अब भी समय है, नदी को उसके हाल पर छोड़ कर उन इलाकों का विकास किया जाए तो आज भी मूलभूत सुविधाओ ं को तरस रहे हैं नही ंतो इसी तरह से विकास की विनाशीलाल की जनता के पैसों की गंगा बहती रहेगी और जनता की सहनशीलता के खतरे के निशान तक पानी आ जाएगा। तब शायद बड़े बडे तर्क भी छोटे पड़ जाएंगे।

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