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प्रशासनिक स्मार्टनसे की भैंस गई पानी में : झमाझम बारिश, फतहसागर, उदयसागर के गेट खोले, बाढ़ नियंत्रण कक्ष पहले ही हो गया बंद, फोन नंबर पर आ रहा बिल जमा नहीं होने का संदेश

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24 न्यूज़ अपडेट उदयपुर। लेकसिटी में कल हुई बारिश ने सबको धो कर रख दिया। नदी में विकास के नाम पर महाविनाश करने वाले नेताओं व अफसरों को फेंसिंग का भूमिपूजन आयड़ नदी ने अपना रौद्र रूप दिखाते हुए नदी पेटे में नहीं करने दिया। सबको किनारे लगा दिया तो एक ही दिन में फतहसागर के चार गेट, स्वरूपसागर ओवरफ्लो, उदयसागर के दोनों गेट खेालने पड़ गए। इन सबके बीच हमारे जिला प्रशासन की स्मार्टनेस की भेंस पानी में बह गई। हुआ यूं कि आनन फानन में मानसून की वापसी की घोषणा होते ही बाढ नियंत्रण कक्ष को बंद कर दिया गया। आज जब लोगों ने मौसम का हाल जानने फोन लगाया तो जवाब आया कि इस फोन का बिल जमा नहीं होने से सुविधा नहीं दी जा सकती। जब अफसरों से पता किया तो पता चला कि बाढ़ नदी में आ तो रही है मगर नियंत्रण कक्ष को कबका समाप्त किया जा चुका है। ऐसे फैसल आखिर कौन करता है यह जांच का विषय है। क्या आपतकाल में इसे फिर से शुरू करने में जयपुर से परमिशन चाहिए? स्थानीय अफसरों में इतना भी साहस नहीं है। उदयसागर तक सभी बांध फुल भरे हुए हैं। आयड़ पूरे वेग पर है यदि कोई इमरजेंसी होती है या आम आदमी कोई सूचना तत्काल चाहता है तो वो आखिर कहां से लेगा????
बहरहाल, प्रशासनिक मशीनरी से उम्मीद करना ही लगता है अब बेमारीन हो गया है। उसका काम बस नेताओं की खुशामद करना और उनके आने जाने के दौरान रास्ते रोक कर जनता को घंटों परेशान करने से ज्यादा नहीं दिखाई दे रहा है।
इधर,,,,आयड़ में महाविनाशलीला दिखने के बाद जो लानत भेजी जा रही थी उससे नेताओं के होंश उड़े हुए थे व ढीठ हो चुके बरसों से जमे अफसरों के माथे पर शिकन आ गए थे। उन्होंने आनन फानन में सैंकड़ों मशीनें, मजदूर लगा कर आयड़ नदी में जहां-जहां गडïढे हो गए थे उनको भराव से भरा। कारीगरों की फौज लगा कर बिखर गए पत्थरों की जगह नए लगवा दिए। यह सब किया अपन प्रतिष्ठा, झूठीशान और अपने गुरूर को बचाने के लिए, अपने गलत फैसले को बेशर्मी की हद तक जाकर सही साबित करने के लिए लेकिन नदी के एक बहाव ने सबको उनकी हदें बता दीं। बारिश में सब कुछ धुल गया। अब सवाल पीछे रह गया कि ये जो खर्चा पिछले एक महीने में हुआ था वो किसने किया,किस मद से किया, किसके कहने पर किया। क्या पता नहीं था कि फिर से बह जाएगा। अगर जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा है तो उसका हिसाब कौन देगा, किससे भरपाई होगी। अब तो उच्चतम न्यायालय को संज्ञान लेकर इस बारे में सवाल जरूर पूछने चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। मिलीभगत के ख्ेाल में दोनों प्रमुख दलों के नेता, प्रशासनिक अधिकारी शामिल है और उन पर उपरी हाथ भी है इसलिए कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। जो आंखों से दिख रहा है वो झुठलाने का प्रयास हो रहा है। जनता साफ कह रही है कि नदी को प्रयोगशाला मत बनाओ, लेकिन ये लोग मानने को तैयार नहीं हैं। चमड़ी इतनी मोटी हो गई है कि शर्म का पानी इन पर नहीं टिक रहा है। एक बार फिर बहती नदी अपनी मौत का मरसिया पढ़ते हुए आने वाले पीढिय़ों के लिए चुनौतीपूर्ण पर्यावरणीय परिस्थितियां होने का संकेत दे रही है।

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