24 न्यूज अपडेट.उदयपुरdesk24newsupdate@gmail.comउदयपुर। भाजपा की ओर से चार दिन पहले ही घोषित किए गए लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों में से चूरू और उदयपुर लोकसभा सीटों के प्रत्याशियों के चयन को कांग्रेस ने नियमों के विरूद्ध बताते हुए चुनाव आयोग को शिकायत दी है। दोनों सीटों पर भाजपा ने दो सेवारत अधिकारियों को टिकट देने की घोषणा की थी। चूरू के देवेंद्र झाझड़िया वन विभाग में तो उदयपुर से डॉ मन्नालाल रावत परिवहन विभाग में अधिकारी के पद पर हैं। दोनों जयपुर में कार्यरत हैं तथा उनकी ओर से बताया जा रहा है कि वीआरएस का आवेदन कर दिया गया है। कांग्रेस को इस बात पर आपत्ति है कि जब प्रत्याशी के रूप में उनकी घोषणा हुई तब वे राजस्थान सरकार के कर्मचारी थे और कर्मचारी बिना वीआरएस लिए चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। हालांकि इस बारे में विशेषज्ञों की राय ये है कि चुनाव में नामांकन के समय उनका सरकारी कर्मचारी होना या नहीं होना मायने रखता है, अभी तो केवल घोषणा की गई है। मगर एक बात और कही जा रही है कि दोनों ने घोषणा होने के बाद पार्टी मंच पर बयान दिए और मीडिया को इंटरव्यू दिए। ऐसे में अब यह चुनाव आयोग को तय करना होगा कि ऐसा करना आचार संहित के दायरे में आत भी है या नहीं। वैसे आम तौर पर यह होता है कि जब भी कोई प्रत्याशी जो सरकारी नौकरी कर रहा है वह चुनाव में उतरने को तैयार होता है, वीआरएस या नौकरी से त्याग पत्र के लिए आवेदन करता है। सरकारी स्तर पर उसकी स्वीकृति मिल जाती है व नामांकन कर चुनाव लड़ता है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इन दोनों प्रत्याशियों के मामले में कहीं पर भी नियमों की अनदेखी की गई है या नहीं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य और राजस्थान के लोकसभा इलेक्शन वॉर रूम के प्रदेशाध्यक्ष जसवंत सिंह गुर्जर ने चुनाव आयोग को इस बारे में एक ज्ञापन भेजकर भाजपा के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। गुर्जर ने इस बारे में एक्स पर एक पोस्ट भी डाली है जिसमें बताया गया है कि रावत व झाझड़िया का नाम जब 2 मार्च को भाजपा ने अपने उम्मीदवारों के रूप में घोषित किया तब तक दोनों के पास वीआरएस की स्वीकृति नहीं थी। यह स्पष्ट रूप से राजस्थान सरकार के सेवा नियमों का उल्लंघन है। इसके तहत कोई भी सरकारी अधिकारी-कर्मचारी न केवल चुनाव नहीं लड़ सकता है, बल्कि वो किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं ले सकता है। टिकट की घोषणा के बाद दोनों की ओर से भाजपा नेतृत्व का आभार जताना और मीडिया में इंटरव्यू देना सरकारी नियमों का उल्लंघन है। चुनाव आयोग को भाजपा और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई करनी ही चाहिए।इस बारे में मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार देवेंद्र झाझड़िया जो वन विभाग में सहायक वन संरक्षक (एसीएफ) के पद पर हैं, उनका कहना है कि उन्होंने वीआरएस लेने के लिए आवेदन कर दिया है। मगर बताया जा रहा है कि यह आवेदन अब तक प्रोसेस नहीं हुआ है। उधर, उदयपुर से मन्नालाल रावत अतिरिक्त परिवहन आयुक्त जयपुर के पद पर हैं। रावत ने कहा कि घोषणा से एक दिन पूर्व 1 मार्च को वीआरएस के लिए आवेदन कर दिया था। मंजूर हुआ या नहीं इसकी उनको जानकारी नहीं है। आपको बता दें कि सरकारी नियमों के अनुसार कुछ स्वायत्तशासी संस्थाओं के कर्मचारियों व विश्वविद्यालय के कर्मचारियों व शिक्षकों आदि को राजनीत करने, चुनाव लड़ने की छूट होती है। इसी नियम के तहत सीपी जोशी, गिरिजा व्यास सहित कई नेताओं ने अपनी राजनीति भी चमकाई और बरसों बाद प्रमोशन पाकर रिटायर भी हो गए। याने यहां पर दोनों हाथों में लड्डू रखने की वैधानिक मुहर लग जाती है। लेकिन बाकी सब में सरकारी पद पर रहते हुए किसी भी राजनीतिक गतिविधि में ना तो हिस्सा लिया जा सकता है ना उसे प्रमोट किया जा सकता हैं। ऐसा करने पर बकायदा सर्विस रूल के अनुसार कार्रवाई का प्रावधान है। कई मामलों में तो नौकरी पर भी आंच आ सकती है, यदि आरोप गंभीर हैं तो। कुछ सालों पहले राजनीतक दलों में यह सब बंद में चलता था। अर्थात जिस सरकारी अधिकारी को टिकट पाना है वह विभिन्न माध्यमों से चुपचाप प्रचार शुरू कर देता था, खुद सामने नहीं आता था। उसके नाम पर जमकर कैम्पेनिंग चुनाव से पहले हवा बनाने के लिए हो जाती थी लेकिन वह सामने तभी आता था जब नौकरी से या तो त्यागपत्र देता या फिर वीआरएस मिल जाती। अब राजनीति के मौजूदा दौर में यह पर्देदारी भी नहीं रही। अब सारा खेल ही खुल्ला खेल फर्रूखाबादी है। सभी दलों में यह हाल है कि पार्टियों के प्रचार में खुद सरकारी कर्मचारी आंकठ डूबे नजर आते हैं। कई बार तो वे इतने ज्यादा लॉयल नजर आते हैं कि यह फर्क करना तक मुश्किल हो जाता है कि कौन पार्टी का पदाधिकारी है और कौन सरकारी पद पर बैठा कर्मचारी। बहरहाल इस मामले में देवेंद्र झांझड़िया ने तो अपने ट्विटर के परिचय में ‘मैं भी मोदी का परिवार’ भी जोड़ कर नया आयाम स्थापित किया है। एक और दिचलस्प बात यह सामने आती है कि जब-जब चुनाव आते हैं तो वीआरएस के लिए सैकड़ों आवेदन आ जाते हैं। इनमें अधिक संख्या डाक्टरों की होती है जो वीआरएस चाहते हैं मगर सरकार उनके आवेदन यह कह कर स्वीकार नहीं करती है कि डाक्टरों की संख्या तो पहले से कम है। ऐसे में डाक्टरों को पद से विदा करने पर स्वास्थ्य सेवाओं पर असर होगा। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation भाजपा ने दिया मूल मंत्र-गांव-गांव तैयार करो आईटी यौद्धा पल-पल की खबरों पर रखो नजर कल रोड़वेज-जेसीटीएसएल बसों में महिलाएं कर सकेगी निःशुल्क यात्रा