24 News Update जयपुर। राजस्थान में अस्पतालों में खाओ खिलाओ संस्कृति जड़ें जमा चुकी है। किसी भी अस्पताल का नाम लीजिए, जो पकड़ा गया वो कानून की नजरों में भ्रष्ट मगर जो नहीं पकड़ा गया और सालों से सेटिंग करते हुए खा भी रहा है और खिला भी रहा है, उसका क्या?बहरहाल, यह दस्तूर बरसों से चला आ रहा है व आगे भी नेताओं व अफसरों की कृपा से चलता रहेगा। यह रावण है जो दशहरे पर भी नहीं मरने वाला है।राजस्थान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सवाई मानसिंह (एसएमएस) में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं, पर हर लोकल परचेज पर 5 से 10 प्रतिशत कमीशन का सिस्टम अब खुले तौर पर सामने आ गया है। यह सिस्टम इतना संगठित हो चुका है कि अस्पताल की खरीद प्रक्रिया से लेकर बिल पास करने तक हर स्तर पर कट तय है।एसीबी द्वारा न्यूरो विभाग के हेड डॉ. मनीष अग्रवाल की गिरफ्तारी ने इस पूरे रैकेट का सिरा खोल दिया है। जांच में सामने आया है कि अस्पताल में दवाओं, सर्जिकल उपकरणों, सफाई, सुरक्षा और तकनीकी सेवाओं की फाइलें तब तक आगे नहीं बढ़तीं, जब तक तय प्रतिशत की ‘एप्रूवल फीस’ यानी कमीशन न दे दिया जाए। फाइल आगे बढ़ाने से पहले तय होता है कमीशन रेटएसएमएस के विभिन्न विभागों में सप्लाई देने वाली कंपनियों के प्रतिनिधि बताते हैं कि बिल पास करवाने से पहले विभागीय अधिकारी सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कमीशन तय कर लेते हैं।दवाओं और उपकरणों की खरीद में यह दर 5 से 10 प्रतिशत के बीच तय मानी जाती है। कुछ महंगे उपकरणों और तत्काल खरीद वाले ऑर्डर में यह दर और भी अधिक होती है।“यदि कमीशन न दिया जाए, तो स्टोर से लेकर अकाउंट्स तक कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती। कई बार तो बिल महीनों तक लटका दिया जाता है।” डॉक्टर की गिरफ्तारी ने खोला सिस्टम का जालन्यूरो सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. मनीष अग्रवाल को एसीबी ने हाल ही में एक लाख रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा था। वह एक कंपनी के 12.50 लाख रुपए के बिल पास करने के बदले घूस मांग रहा था। पूछताछ में सामने आया कि डॉक्टर ने कंपनी से कहा थाकृ “मेरी पर्सनैलिटी के हिसाब से वैल्यू लगाओ।” यह वही प्रक्रिया थी, जो अस्पताल में वर्षों से एक “रिवाज” की तरह चल रही है। संगठित तरीके से चलता है ‘कट-कल्चर’अस्पताल प्रशासन से जुड़े सूत्र बताते हैं कि लोकल परचेज कमेटी में बैठे अधिकारी और विभागीय हेड इस सिस्टम का हिस्सा हैं।स्टोर विभाग से बिल निकलने के बाद संबंधित डॉक्टर या प्रभारी के सिग्नेचर जरूरी होते हैं। उसी स्तर पर कमीशन का ‘कट’ तय होता है।बिल आगे बढ़ाने के बाद अकाउंट्स सेक्शन में अंतिम सिग्नेचर से पहले भी कुछ हिस्सा बंटता है। गुणवत्ता पर असर, मरीजों पर बोझकमीशन व्यवस्था का सीधा असर अस्पताल की खरीद की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। कई बार घटिया स्तर के उपकरण या दवाएं केवल इसलिए खरीदी जाती हैं कि कंपनी अधिक कमीशन देने को तैयार होती है। परिणामस्वरूप, मरीजों को इलाज में नुकसान झेलना पड़ता है। एसीबी अब पूरे नेटवर्क की जांच में जुटीएसीबी सूत्रों के अनुसार, यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि अस्पताल के अंदर वर्षों से चला आ रहा सिस्टमेटिक करप्शन नेटवर्क है।अब जांच इस दिशा में बढ़ाई जा रही है कि किन-किन विभागों में यह कमीशन सिस्टम सक्रिय है और इसमें कौन-कौन अधिकारी शामिल हैं। कट कल्चर का कमालएसएमएस अस्पताल में डॉक्टर की गिरफ्तारी भले एक बड़ी कार्रवाई हो, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इससे “कट कल्चर” का वह तंत्र उजागर हुआ है जो सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की विश्वसनीयता को भीतर से खोखला कर रहा है। जब तक यह कमीशन चक्र समाप्त नहीं होगा, तब तक मरीजों की सेवा से पहले रकम की रसीद चलती रहेगी। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation राजस्थान भर्ती परीक्षाओं में बड़ा सुधार: एडमिट-कार्ड पर परीक्षा-केंद्र की गूगल लोकेशन व मुख्य द्वार की फोटो; समय सुबह 11 बजे जयपुर से हरियाणा महिला ASI का शव लेकर लौट रहे थे परिजन; फ्लाईओवर पर खड़े ट्रक में घुसी कार, तीन की मौत