24 न्यूज अपडेट. नेशनल डेस्क। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के अल्पसंख्यक दर्जे से संबंधित मामले में, सर्वोच्च न्यायालय की 7 न्यायाधीशों की पीठ ने (4ः3 बहुमत से) एस. अज़ीज़ बाशा बनाम भारत संघ के 1967 के फैसले को खारिज कर दिया , जिसमें कहा गया था कि किसी क़ानून द्वारा शामिल की गई संस्था अल्पसंख्यक संस्था होने का दावा नहीं कर सकती। अब यह मुद्दा कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक अल्पसंख्यक संस्थान है या नहीं, बहुमत के इस दृष्टिकोण के आधार पर एक नियमित पीठ द्वारा तय किया जाएगा। अज़ीज़ बाशा मामले में न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि एएमयू अल्पसंख्यक दर्जे का दावा नहीं कर सकता क्योंकि इसकी स्थापना एक क़ानून द्वारा की गई थी। आज, भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व में बहुमत ने अज़ीज़ बाशा मामले को खारिज कर दिया और कहा कि कोई संस्थान सिर्फ़ इसलिए अपना अल्पसंख्यक दर्जा नहीं खो देगा क्योंकि उसे क़ानून द्वारा बनाया गया था। बहुमत ने कहा कि न्यायालय को यह जांच करनी चाहिए कि विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की और इसके पीछे “दिमाग“ किसका था। अगर वह जांच अल्पसंख्यक समुदाय की ओर इशारा करती है, तो संस्थान अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यक दर्जे का दावा कर सकता है। इस तथ्यात्मक निर्धारण के लिए, संविधान पीठ ने मामले को एक नियमित पीठ को सौंप दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने अंतिम कार्य दिवस पर बहुमत (जिसमें स्वयं न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा शामिल थे) की ओर से निर्णय सुनाया। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, सूर्यकांत, जेबी पारदीवाला, दीपांकर दत्ता, मनोज मिश्रा और एससी शर्मा की संविधान पीठ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2006 के फैसले से उत्पन्न संदर्भ पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कहा गया था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है। पीठ ने 1 फरवरी को इसे सुरक्षित रखने से पहले 8 दिन तक मामले की सुनवाई की।विचार-विमर्श के लिए संदर्भ का मुख्य मुद्दा यह थाः “किसी शैक्षणिक संस्थान को अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान मानने के क्या संकेत हैं? क्या किसी संस्थान को अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान इसलिए माना जाएगा क्योंकि वह किसी धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक वर्ग के व्यक्ति द्वारा स्थापित किया गया है या उसका प्रशासन किसी धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक वर्ग के व्यक्ति द्वारा किया जा रहा है?“पीठ के समक्ष विचारणीय 4 मुख्य पहलू थेः (1) क्या एक विश्वविद्यालय, जो एक क़ानून (एएमयू अधिनियम 1920) द्वारा स्थापित और शासित है, अल्पसंख्यक का दर्जा दावा कर सकता है; (2) एस अज़ीज़ बाशा बनाम भारत संघ (5 न्यायाधीशों की पीठ) में सुप्रीम कोर्ट के 1967 के फैसले की शुद्धता, जिसने एएमयू की अल्पसंख्यक स्थिति को खारिज कर दिया; (3) एएमयू अधिनियम में 1981 के संशोधन की प्रकृति और शुद्धता, जिसने बाशा में निर्णय के बाद विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया; (4) क्या 2006 में एएमयू बनाम मलय शुक्ला में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा बाशा निर्णय पर भरोसा करना सही था, यह निष्कर्ष निकालने में कि एएमयू एक गैर-अल्पसंख्यक संस्थान होने के नाते मेडिकल पीजी पाठ्यक्रमों में मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अल्पसंख्यक दर्जे पर अब 3 जजों की रेगुलर बेंच फैसला करेगी। बेंच इस फैक्ट की जांच करेगी कि क्या एएमयू को अल्पसंख्यकों ने स्थापित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने अजीज बाशा केस में कहा था कि एएमयू सेंट्रल यूनिवर्सिटी है। इसकी स्थापना ना तो अल्पसंख्यकों ने की थी और ना ही उसका संचालन किया था। सुप्रीम कोर्ट के ही 3 जजों की बेंच अब इसी पर फैसला सुनाएगी।उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में मुस्लिम यूनिवर्सिटी 1920 में बनी1817 में दिल्ली के सादात (सैयद) खानदान में सर सैयद अहमद खान का जन्म हुआ। 24 साल की उम्र में सैयद अहमद मैनपुरी में उप-न्यायाधीश बन गए। इस समय ही उन्हें मुस्लिम समुदाय के लिए अलग से शिक्षण संस्थान की जरूरत महसूस हुई। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी शुरू करने से पहले सर सैयद अहमद खान ने मई 1872 में मुहम्मदन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज फंड कमेटी बनाया। इस कमेटी ने 1877 में मुहम्मदन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की शुरुआत की। इस बीच अलीगढ़ में एक मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मांग तेज हो गई। जिसके बाद मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन की स्थापना हुई। 1920 में ब्रिटिश सरकार की मदद से कमेटी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट बनाकर इस यूनिवर्सिटी की स्थापना की। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाए जाने के बाद पहले से बनी सभी कमेटी को भंग कर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के नाम से एक नई कमेटी बनी। इसी कमेटी को सभी अधिकार और संपत्ति सौंपी गई। अभाविप और दूसरे दक्षिण पंथी संगठनों का कहना है कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने इस यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए 1929 में 3.04 एकड़ जमीन दान दी थी। ऐसे में इस यूनिवर्सिटी के संस्थापक सिर्फ सर अहमद खान को नहीं बल्कि हिंदू राजा महेंद्र प्रताप सिंह भी हैं। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा : विधानसभा में मारपीट, भाजपा के 3 विधायक घायल, धारा 370 बहाली के प्रस्ताव पा महासंग्राम सलमान को 15 दिन में चौथी बार धमकी, कहा- राइटर भी अब लिख नहीं पाएगा गाना