24 न्यूज अपडेट, उदयपुर। सरकारी दफ्तरों में लगने वाले सीसीटीवी कैमरे पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही का प्रतीक माने जाते हैं, लेकिन जब जनता इन्हीं कैमरों की रिकॉर्डिंग मांगती है और जवाब में तकनीकी बहानों की आड़ लेकर सूचनाएं छिपाई जाती हैं, तो पूरा सिस्टम संदेह के घेरे में आ जाता है। सूचना के अधिकार (RTI) एक्टिविस्ट और पत्रकार जयंवत भैरविया द्वारा लगाई गई श्रृंखलाबद्ध आरटीआई आवेदनों के जवाब में जो तथ्य सामने आए हैं, वे न सिर्फ अफसरशाही की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि कैसे जनता के पैसे से खरीदी गई पारदर्शिता, अब खुद जनता से ही छुपाई जा रही है।
जबकि होना यह चाहिए कि सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग ऑनलाइन कर दी जाए ताकि जनता को रीयल टाइम पता चल सके कि सरकारी ऑफिसों में उनके पैसों से तनख्वाह पाने वाले कर्मचारी कितना काम कर रहे हैं।
अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) के वृत्त कार्यालय में कार्यरत XEN आई एम मंसूरी के कार्यालय में लगे कैमरों को लेकर मई 2024 से दिसंबर 2024 तक भैरविया ने सात आरटीआई लगाई, जिनमें रिकॉर्डिंग, कैमरे लगाने वाले ठेकेदार, मरम्मत की प्रक्रिया, तकनीकी रिपोर्ट, और जवाबदेही तय करने जैसी सूचनाएं मांगी गई थीं। लेकिन जवाबों में बार-बार यह कहा गया कि डेटा संधारित नहीं है, डिवाइस (POE) खराब है, हार्ड डिस्क में खराबी की आशंका है, तकनीकी जांच मोबाइल पर हुई है, नोटशीट नहीं चलाई गई — इन उत्तरों ने पारदर्शिता के पूरे विचार पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
15 मई 2024 को जब भैरविया ने 3 अक्टूबर से 31 अक्टूबर 2023 तक की CCTV रिकॉर्डिंग मांगी, तो जवाब मिला कि रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं है। 15 जुलाई को भैरविया ने वर्क ऑर्डर, भुगतान, फर्म का नाम और मेंटेनेंस से जुड़ी जानकारी मांगी तो सिर्फ इतना बताया गया कि नीलकमल इंफोटेक नामक फर्म को 97190 रुपये भुगतान किए गए हैं, लेकिन तकनीकी रिपोर्ट और मेंटेनेंस से जुड़ी बाकी जानकारी “उपलब्ध नहीं” बताई गई।
13 अगस्त को पूछे गए सवालों में यह जानना चाहा गया कि CCTV खराब होने पर किसे और कैसे बुलाया गया, तो बताया गया कि सिर्फ मोबाइल पर कॉल किया गया, कोई नोटशीट नहीं चली और सूचना संधारित नहीं है। इसके बाद 16 अक्टूबर, 15 नवंबर, 6 दिसंबर और 27 दिसंबर को की गई आरटीआई में जब रिकॉर्डिंग, मरम्मत की प्रक्रिया, जिम्मेदार अधिकारी और पत्राचार के बारे में पूछा गया, तो या तो बताया गया कि रिकॉर्डिंग संधारित नहीं है, या फिर डिवाइस खराब है, या अंततः यह कह दिया गया कि कैमरे तो खराब ही नहीं थे, वे कार्यरत थे, जबकि पहले उन्हें POE और हार्डडिस्क खराब बताकर डेटा न देने का कारण बताया जा चुका था।
जबकि होना यह चाहिए कि ऐसी स्थिति में न केवल रिकॉर्डिंग की नियमित बैकअप प्रणाली हो, बल्कि इसकी सुलभता ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से आम जनता के लिए होनी चाहिए। पारदर्शिता का यही सही अर्थ है।
भैरविया की आरटीआई में यह भी पूछा गया था कि कैमरे जानबूझकर बंद रखे गए हैं क्या, और अगर हां, तो जिम्मेदार अधिकारी कौन है और उस पर क्या कार्रवाई की गई — लेकिन जवाब में सिर्फ इतना बताया गया कि ऐसी कोई सूचना उपलब्ध नहीं है और कोई पत्राचार भी नहीं किया गया है।
यह सब उस स्थिति में हो रहा है जब राजस्थान सरकार खुद स्पष्ट निर्देश दे चुकी है कि CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग आरटीआई में उपलब्ध कराई जाए। 16 नवंबर 2023 को स्टेट क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो, जयपुर के महानिरीक्षक शरत कविराज द्वारा सभी जिला पुलिस अधीक्षकों को आदेश जारी किए गए कि आपराधिक मामलों, परिवादों और RTI आवेदनों पर CCTV फुटेज उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाए। राज्य सूचना आयोग ने भी आरुषि जैन बनाम एएसपी उदयपुर (18 सितंबर 2023), लक्ष्मी देवी बनाम एएसपी (18 नवंबर 2024), शारदा देवी बनाम एएसपी (6 सितंबर 2024) जैसे मामलों में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि CCTV कैमरे पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए होते हैं, न कि गोपनीयता बनाए रखने के लिए, और इन्हें RTI Act की धारा 8(1) में छूट देना विधिसम्मत नहीं है। खुद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक गोपाल स्वरूप मेवाड़ा ने भी RTI आवेदनों में CCTV फुटेज देने के आदेश दिए हैं।
जबकि होना यह चाहिए कि आरटीआई डालने की भी ज़रूरत न पड़े — CCTV रिकॉर्डिंग हर कार्यालय के पोर्टल पर स्वतः ऑनलाइन उपलब्ध रहे। ऐसा न होना न सिर्फ पारदर्शिता की मूल भावना से खिलवाड़ है, बल्कि यह व्यवस्था के भीतर छिपे अंधेरे को उजागर करता है।
तो सवाल यह उठता है — जब कानून साफ है, आदेश स्पष्ट हैं, और उद्देश्य पारदर्शिता है, तो फिर एक XEN कार्यालय में बार-बार सूचनाएं देने से इनकार क्यों किया गया? और जब रिकॉर्डिंग ही हर बार गायब हो जाए, या डिवाइस बार-बार खराब निकले, तो क्या यह मान लिया जाए कि या तो पारदर्शिता की मंशा ही नहीं है, या फिर रिकॉर्ड जानबूझकर मिटाए जा रहे हैं?
जयंवत भैरविया की इन आरटीआई के जवाब ने एक बड़ी बात को उजागर किया है — कि जब सरकारी संस्थाएं, जनता के पैसों से खरीदी गई तकनीक से खुद जनता को ही नजरअंदाज करें, तो यह सिर्फ सूचना नहीं रोकना नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निगरानी प्रणाली पर भी ताला लगाना है।


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