24 News Update उदयपुर। पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया ने आज कुछ पत्रकारों को बुला कर चर्चा के बहाने आज उदयपुर में भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉक्टर विजय प्रकाश विप्लवी के चिट्ठी बम का जवाब दिया। विप्लवी ने यह पत्र राष्ट्रपति के नाम लिखा था व इसकी प्रतिलिपी पीएम, गृह मंत्री व राज्यपाल राजस्थान को भी भेजी थी।
कटारिया ने पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी पर भी पोलिटिकल सवालों की मिसाइलें दागीं। कटारिया ने कहा कि मूल बीमारी तो वे लोग ही (विप्लवी और जोशी का नाम नहीं लेते हुए कहा) बता सकते हैं, जो कह रहे हैं। जैसा भी कह रहे हैं, विद्वान लोग हैं।
उनका वर्षों का ज्ञान है, तो वे कह रहे होंगे। मेरा या उनका मूल्यांकन अगर कोई करेगा, तो जनता ही करेगी। मैं विद्वान लोगों से कहना चाहता हूं कि वे अपने जीवन के एक साल के काम का चार्ट निकाल दें कि उन्होंने क्या काम किया। एक बार चुनाव लड़ने के बाद विधानसभा को छोड़कर क्यों आ गए। टिकट देने को तैयार थे, मगर उनको लगा कि पता नहीं उनका क्या होगा। उन्होंने कहा कि टारगेट नहीं है, दर्द कहीं और है, बता कहीं और रहे हैं। मेरा फर्ज था कि जिस पार्टी ने देलवाड़ा से उठाकर यहां तक भेजा है, उसकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है। समय ही अच्छे-अच्छों का इलाज कर देता है। हिम्मत ही नहीं करना, मैदान छोड़ देना कहां तक शोभा देता है….।
विप्लवी ने कहा—हक़ीक़त को छुपाने से हक़ीक़त छुपती नहीं
कटारिया के बयानों पर भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व पार्षद विजय प्रकाश विप्लवी ने 24 न्यूज अपडेट से कहा कि मेरे द्वारा जारी पत्र के सम्बन्ध में महामहिम गुलाबचंद कटारिया जी के कुछ वीडियो क्लिप्स मित्रों ने मुझे प्रेषित किये। इन वीडियो में मेरे द्वारा उठाए गए उपनियमों एवं मूल विषयों पर कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया गया है। उन बिंदुओं पर मौन रहना उन्होनें क्यों आवश्यक समझा, यह तो वे स्वयं ही स्पष्ट कर सकते हैं। तथापि, कुछ अप्रासंगिक बातों के माध्यम से अपने पक्ष को प्रस्तुत करने का प्रयास अवश्य किया है।
मैं राजनीति में स्वयं को उनका कनिष्ठ मानता हूँ, किंतु यह स्मरण दिलाना प्रासंगिक होगा कि हार के डर से उदयपुर से बडीसादडी एवं बड़ी सादड़ी से उदयपुर के मध्य सीट परिवर्तन के निर्णय भी उनके ही रहे हैं। इसके विपरीत, धर्मनारायण जोशी जी का उदाहरण संगठननिष्ठा की दृष्टि से उल्लेखनीय है। उन्होंने चुनाव से पूर्व ही प्रदेश एवं केंद्रीय नेतृत्व को यह निवेदन किया था कि उन्हें मावली से दो बार अवसर मिल चुका है, अतः इस बार वहां स्थानीय कार्यकर्ता को प्राथमिकता दी जाए और यदि संभव हो तो उन्हें उदयपुर शहर से प्रत्याशी बनाया जाए।
गोविंदाचार्यजी ने साफ कहा था—किसी की सीट नहीं बदलेगी
विप्लवी ने साफ कहा कि 1998 में तब राजस्थान भाजपा के प्रभारी केएन गोविंदाचार्य थे तब शेखावत सरकार में कई मंत्री अपनी सीटें बदलना चाहते थे। तब उन्होंने कहा था कि मैं प्रभारी हूं। जिन्होंने जहां काम किया है वहीं काम करेंगे। मुख्यमंत्री सहित किसी की भी सीट नहीं बदलेगी। तब बड़ी सादड़ी से कटारियाजी डेढ़ हजार वोट से जीते थे। मगर उसके बाद 2003 में फिर कटारिया बड़ी सादड़ी से वापस उदयपुर आ गए। सवाल यह उठता है कि यहां जीत सकते थे तो वहां क्यों गए व वहां जीत सकते थे तो यहां क्यों आए?? हार जीत के डर सीट तो कटारियाजी ने बदली है।
ताराचंदजी का सबसे पहले स्वागत धर्मनारायणजी ने किया
डॉक्टर विप्लवी ने कहा कि यह भी सर्वविदित है कि जब प्रथम सूची में ताराचंद जी जैन का नाम घोषित हुआ, तो धर्मनारायण जी जोशी ने उनका स्वागत किया और किसी प्रकार की नाराज़गी या असंतोष प्रकट नहीं किया। यह व्यवहार संगठन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। एक ओर जहाँ 11 ग्यारह बार चुनाव लड़ने के बाद भी खिन्न मन से राजभवन जाने की स्थिति बनी, वहीं दूसरी ओर धर्मनारायण जी ने तीसरा चुनाव लड़ने से स्वयं ही विरत होकर एक आदर्श प्रस्तुत किया। आज धर्मनारायण पर दोषारोपण करने वाले कटारिया साहब ने वर्ष 2018 में मावली एवं फतहनगर की सभाओं में धर्मनारायण जी की प्रशंसा की वो सत्य थी या उनकी राजनीतिक मजबूरी। वे ही बता सकते है।
“हक़ीक़त को छुपाने से हक़ीक़त छुपती नहीं,
ज़माना गवाह होता है, बातें बदलती नहीं।”
चिट्ठी बम में ये बातें लिखीं थीं डॉ़. विप्लवी ने
डॉ. विजय विप्लवी द्वारा उठाए गए प्रमुख सवाल/आपत्तियां संक्षेप में बिंदुवार इस प्रकार हैं—
लगातार उदयपुर प्रवास पर सवाल
पंजाब के राज्यपाल बनने के बाद भी गुलाबचंद कटारिया का हर माह एक सप्ताह या उससे अधिक समय उदयपुर में रहना—क्या यह प्रशासनिक रूप से उचित है और इससे स्थानीय प्रशासन पर क्या असर पड़ रहा है?
जनसुनवाई और निर्देश देने की वैधता
उदयपुर सर्किट हाउस में जनसुनवाई करना और स्थानीय प्रशासन व पुलिस को निर्देश देना—जबकि यह उनका कार्यक्षेत्र नहीं है—क्या यह विधिक और संवैधानिक रूप से सही है?
प्रोटोकॉल से प्रशासनिक कामकाज प्रभावित
उनके दौरों के दौरान प्रोटोकॉल में प्रशासनिक अमला व्यस्त रहता है, जिससे आम प्रशासनिक कार्य और जनता के काम प्रभावित होते हैं—इस पर प्रश्न।
यातायात और आमजन को असुविधा
निजी/सामाजिक कार्यक्रमों में अधिक उपस्थिति के कारण बार-बार ट्रैफिक रोकना—क्या यह आम जनता के हितों के विपरीत नहीं है?
छोटे कार्यों के लोकार्पण पर आपत्ति
मामूली कार्यों (जैसे एक लाख रुपये के टेम्पो स्टैंड शेड के जीर्णोद्धार) का राज्यपाल के रूप में लोकार्पण—क्या यह पद की गरिमा के अनुरूप है?
दीक्षांत समारोह में उपस्थिति का औचित्य
जब राजस्थान के राज्यपाल कुलाधिपति के रूप में मौजूद हों, तब पंजाब के राज्यपाल का मंच पर उपस्थित रहना—क्या यह प्रोटोकॉल के अनुरूप है?
चुनावी समय में बिना प्रोटोकॉल गतिविधि
विधानसभा चुनाव के दौरान बिना सूचना, बिना सुरक्षा और बिना प्रोटोकॉल जनसमूह में जाना—क्या यह आचरण संवैधानिक पद की गरिमा के अनुरूप है?
वक्तव्यों में मर्यादा का प्रश्न
महाराणा प्रताप पर कथित विवादित टिप्पणियां और बाद में माफी—क्या यह राज्यपाल पद की गरिमा के अनुकूल है?
भूमि व निर्माण विवादों से जुड़ी आशंकाएं
निकटस्थ लोगों के नाम भूमि विवादों और अवैध निर्माण से जुड़े होने के आरोप—क्या यह पद की निष्पक्षता और मर्यादा पर प्रश्न नहीं उठाता?
स्थानांतरण की मांग
यदि उदयपुर में उपस्थिति आवश्यक है, तो उन्हें गुजरात का राज्यपाल बनाकर नजदीकी से आवागमन की व्यवस्था करने का सुझाव—क्या यह समाधान हो सकता है?

