24 News Update उदयपुर। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) जोधपुर बेंच ने सेवा कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सेंट्रल जीएसटी एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग उदयपुर के रिटायर्ड अधीक्षक श्याम सुंदर जैन के खिलाफ जारी आरोप पत्र को निरस्त कर दिया। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है।
खंडपीठ के जस्टिस रामेश्वर व्यास और डॉ. अमित सहाय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि केवल हिरासत के आधार पर किया गया निलंबन, विभागीय कार्रवाई की शुरुआत नहीं माना जा सकता, जब तक दोनों के बीच स्पष्ट संबंध न हो।
1984 में शुरू हुई सेवा, रिटायरमेंट से पहले गिरफ्तारी
मामले के अनुसार श्याम सुंदर जैन ने वर्ष 1984 में एलडीसी के पद से सेवा शुरू की और पदोन्नति पाकर सेंट्रल जीएसटी आयुक्तालय उदयपुर में अधीक्षक बने। मई 2020 में रिश्वत मांगने के आरोप में एसीबी ने उन्हें गिरफ्तार किया था और 25 मई 2020 को न्यायिक हिरासत में भेजा गया।
हिरासत के आधार पर हुआ था निलंबन
गिरफ्तारी के बाद जीएसटी आयुक्त ने 28 मई 2020 को आदेश जारी कर उन्हें 25 मई से ‘डीम्ड सस्पेंशन’ पर रखा। यह निलंबन केवल 48 घंटे से अधिक हिरासत में रहने के आधार पर किया गया था, न कि किसी प्रस्तावित विभागीय जांच के तहत। इसके बाद 30 नवंबर 2020 को जैन सेवानिवृत्त हो गए और उस समय तक उनके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं हुई थी।
ढाई साल बाद जारी हुई चार्जशीट
सेवानिवृत्ति के करीब दो साल बाद 29 दिसंबर 2022 को विभाग ने उनके खिलाफ चार्जशीट जारी कर दी। इसके खिलाफ जैन ने CAT जोधपुर में याचिका दायर कर कार्रवाई को चुनौती दी।
ट्रिब्यूनल ने खारिज किए विभाग के तर्क
आवेदक की ओर से अधिवक्ता सपना वैष्णव ने दलील दी कि सीसीएस (पेंशन) नियम 1972 के तहत रिटायरमेंट के बाद कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति की अनुमति जरूरी है। वहीं विभाग की ओर से अधिवक्ता के.एस. यादव ने तर्क दिया कि निलंबन के आधार पर कार्रवाई पहले से ही शुरू मानी जानी चाहिए। ट्रिब्यूनल ने विभाग का तर्क खारिज करते हुए कहा कि निलंबन और विभागीय जांच के बीच सीधा संबंध होना आवश्यक है, जो इस मामले में नहीं था।
आदेश में स्पष्ट टिप्पणी
ट्रिब्यूनल ने कहा कि “निलंबन की तारीख को विभागीय जांच की शुरुआत तभी माना जा सकता है, जब निलंबन और प्रस्तावित विभागीय कार्रवाई के बीच स्पष्ट संबंध हो।” इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने बिना राष्ट्रपति की स्वीकृति के जारी 29 दिसंबर 2022 के आरोप पत्र को नियमों के विरुद्ध मानते हुए पूरी तरह निरस्त कर दिया।

