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प्रदेश की राजनीति में सिकुड़ा उदयपुर का ‘गुलाबी—कमल’ महिला मोर्चा की सूची ने दिए संकेत

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24 News update उदयपुर। उदयपुर की राजनीति में कटारियाजी की राजनीति के बाद के छायां काल में अब भाजपा की प्रदेश की पालिटिक्स कमजोर पड़ती नजर आ रही है। जयपुर की सियासत उदयपुर को नजरअंदाज करने से पहले रत्ती भर संकोच महसूस नहीं कर रही है। इसे प्रभाव की कमी कहें या पहुंच की या फिर नई बिसात कहकर आत्मसात कर लें यह अपनी अपनी च्वाइस है और खेमेबंदी के अनुसार देखने का नजरिया है। सत्ता के गलियारों में मजबूत पकड़ वाले गुलाबचंद कटारिया के आभामंडल के कमजोर पड़ते ही उदयपुर फाइल्स और उसके बाद के कालखंड में प्रदेश में प्रभाव कम होता और धार खोता हुआ दिखाई दे रहा है। भाजपा महिला मोर्चा राजस्थान की नई कार्यकारिणी ने साफ संकेत दे दिया कि मेवाड़ की आवाज अब वजनदार नहीं रही। अब वजनी लोग आवाजों को तय करने लग गए हैं। प्रदेशाध्यक्ष राखी राठौड़ की टीम में 48 पदाधिकारियों की लंबी सूची को देखते हुए आज लोकल भाजपाइयों की आंखें पथरा गई। उदयपुर का नाम ढूंढते ढूंढते केवल एक नाम ही नजर आया। संभाग जिसे कभी संगठन की रीढ़ कहा जाता था, वहां से प्रतिनिधित्व भी जीरा साबित होता नजर आया। बड़े पदों—प्रदेश महामंत्री, उपाध्यक्ष और मंत्री— की सूची में तो उदयपुर का नाम ढूंढे नहीं मिला। सात जिलों वाले संभाग को तीन नामों का प्रतिनिधित्व मिला। यह आप में मजबूत राजनीतिक संदेश है कि आप हाशिये पर हैं।
उदयपुर की एडवोकेट सोनिका जैन को आईटी विभाग में सह-संयोजक का पद दिया गया है। यह पद कितना मजबूत है और कितना कॉस्मेटिक। यह चर्चा का विषय बन सकता है मगर सोनिका जैन की यहां उपस्थिति सशक्त रहने वाली है इसमें कोई संदेह नहीं है।
अब सवाल यह है कि क्या उदयपुर की राजनीति अब केवल “आईटी सह-संयोजक” तक सिमट कर रह जाने वाली है। जिस शहर ने कभी संगठन को रणनीतिक दिशा दी, वह अब डिजिटल डेस्क तक ही सीमित रहने वाली है?? वास्तव में पूरी कहानी पार्टी व सत्ता के भीतर बदलते शक्ति संतुलन की भी बानगी है। एक समय था जब कटारिया की मौजूदगी में उदयपुर से कई चेहरे एक साथ प्रदेश राजनीति में जगह बनाते थे। अब स्थिति यह है कि पिंकी मांडावत जैसे नाम जो प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुकी हैं, और इस बार महामंत्री या बड़े पद की दावेदार मानी जा रही थीं। उनका नाम सूची से गायब हो जाता है। नाम कटना राजनीतिक सिग्नल है कि अब पैरवी और पकड़ दोनों कमजोर पड़ चुके हैं। सूचियां वहां बन रही हैं जहां की पर राजनीतिक बिसात में उदयपुर प्रायोटी पर है ही नहीं। या दूसरे शब्दों में कहें तो जिनके जिम्मे प्रायो​टी तय करवाने की हैं वे खुद पदमोह में पड़कर टीमवर्क जैसी किसी प्रथा को कमजोर करने पर तुल गए हैं। नाम तो कई सारे चर्चा में थे लेकिन भीतरखाने जयपुर की लॉबिंग की राजनीति में उदयपुर के नेता अब उतने सक्रिय या प्रभावी नहीं रह गए हैं। राजनीति पहले जो संगठन के काम से चलती थी, अब नेटवर्क और नेरेटिव से संचालित होती दिख रही है। और नेरिटिव बिल्डिंग में उदयपुर पिछड़ता दिख रहा है।
अनुभव बनाम विवाद, युवा बनाम वरिष्ठ—इन समीकरणों के बीच संगठन खुद उलझा हुआ साफ साफ नजर आ रहा है उदयपुर शहर में। असल चिंता यह नहीं कि इस बार कितने पद मिले, बल्कि यह है कि उदयपुर की राजनीतिक जमीन पार्टी के भीतर ही क्यों खिसक रही है। कौनसी टेक्टोनिक प्लेट है जो सरकती ही जा रही है।
क्या नेतृत्व का संकट है? या फिर स्थानीय अंदरखाने की गुटबाजी का परिणाम? या फिर यह संकेत कि प्रदेश नेतृत्व अब नए भूगोल और नए चेहरों पर दांव लगा रहा है? साफ है, यह सिर्फ एक सूची नहीं, बल्कि आईना है—जिसमें उदयपुर की कमजोर पड़ती राजनीतिक पकड़ साफ नजर आती है। अगर समय रहते स्थानीय नेतृत्व ने आत्ममंथन नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं जब उदयपुर की राजनीति सिर्फ संभावनाओं और पुरानी यादों की जुगाली तक सिमट कर रह जाएगी। मेवाड़ी आवाज सशक्त होना जरूरी है और पार्टी के खांटी नेता यही कह रहे हैं कि गुलाबी कमल हर हाल में खिलना ही चाहिए।

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