24 न्यूज अपडेट, नेशनल डेस्क। कलकत्ता हाईकोर्ट ने हाल ही में एक मामले में फैसला सुनाया कि नशे की हालत में नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट छूने की कोशिश करना POCSO एक्ट के तहत रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता, बल्कि इसे गंभीर यौन उत्पीड़न (धारा 10, POCSO एक्ट) की श्रेणी में रखा जा सकता है। कोर्ट ने इस आधार पर आरोपी को जमानत दे दी। यह फैसला ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय के खिलाफ अपील पर आया, जिसमें आरोपी को POCSO एक्ट की धारा 10 और IPC की धाराओं 448, 376(2)(c), 511 के तहत 12 साल की सजा और 50,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी मामले का विवरण: ट्रायल कोर्ट का फैसला: ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए 12 साल की सजा सुनाई थी। पीड़िता ने बयान दिया था कि आरोपी ने नशे में उसके ब्रेस्ट छूने की कोशिश की थी। मेडिकल जांच में पेनिट्रेशन के सबूत नहीं मिले। आरोपी की अपील: आरोपी ने हाईकोर्ट में जमानत की मांग की, यह दावा करते हुए कि वह दो साल से जेल में है और पेनिट्रेशन का कोई सबूत नहीं है। वकील ने तर्क दिया कि यह मामला IPC की धारा 376 (रेप) के बजाय POCSO की धारा 10 (गंभीर यौन उत्पीड़न) के तहत आता है, जिसकी सजा 5-7 साल है, और आरोपी ने इसका बड़ा हिस्सा काट लिया है। हाईकोर्ट का तर्क: जस्टिस अरिजीत बनर्जी और जस्टिस बिस्वरूप चौधरी की बेंच ने माना कि पीड़िता के बयान और मेडिकल सबूतों में पेनिट्रेशन का कोई संकेत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ब्रेस्ट छूने की कोशिश को रेप की कोशिश के बजाय गंभीर यौन उत्पीड़न माना जा सकता है, और इस आधार पर जमानत दी। सुप्रीम कोर्ट की हिदायत और इलाहाबाद हाईकोर्ट का मामला: यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक समान मामले में दिए गए फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 मार्च 2025 को कहा था कि नाबालिग के ब्रेस्ट पकड़ना, पायजामे का नाड़ा तोड़ना, या उसे घसीटने की कोशिश रेप की कोशिश नहीं, बल्कि यौन उत्पीड़न है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे “असंवेदनशील” बताते हुए फैसले पर रोक लगा दी और कहा कि इस तरह के मामलों में संवेदनशीलता की जरूरत है। कानूनी दृष्टिकोण: POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न में वे मामले आते हैं, जिनमें यौन इरादे से बच्चे के निजी अंगों (वेजाइना, पेनिस, एनस, या ब्रेस्ट) को छूना शामिल है, लेकिन पेनिट्रेशन नहीं होता। धारा 7 और 10 के तहत सजा 5-7 साल तक हो सकती है। वहीं, रेप या रेप की कोशिश (IPC 376 या POCSO धारा 18) के लिए पेनिट्रेशन या उसकी कोशिश का सबूत जरूरी है। विवाद: कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी के विपरीत प्रतीत होता है, जहां ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेने की बात कही गई थी। इससे न्यायिक संवेदनशीलता और POCSO एक्ट के तहत अपराधों की परिभाषा पर बहस छिड़ सकती है। निष्कर्ष: कलकत्ता हाईकोर्ट ने तकनीकी रूप से कानूनी परिभाषाओं (पेनिट्रेशन की अनुपस्थिति) के आधार पर फैसला दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की हालिया हिदायत को देखते हुए, यह फैसला विवादास्पद हो सकता है। ऐसे मामलों में पीड़ित की गरिमा और सामाजिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखना जरूरी है। अगर आपको इस मामले में और गहराई से जानकारी चाहिए, जैसे कि विशिष्ट कानूनी धाराओं की व्याख्या या सुप्रीम कोर्ट के फैसले का प्रभाव, तो बता सकते हैं। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation पहलगाम आतंकी हमले पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वाला युवक गिरफ्तार: सोशल मीडिया पर महिला पर लगाया गंभीर आरोप, जबलपुर पुलिस की त्वरित कार्रवाई मंदसौर में दर्दनाक हादसा: वैन कुएं में गिरी, 12 लोगों की मौत; बचाव में उतरे ग्रामीण की भी जहरीली गैस से जान गई