24 News Update डूंगरपुर। डूंगरपुर एक बार फिर आदिवासी अस्मिता की लड़ाई का केंद्र बन गया है। बुधवार को कलेक्ट्रेट परिसर उस समय नारों, रोष और संविधान की प्रतिध्वनियों से गूंज उठा जब भील प्रदेश विद्यार्थी मोर्चा ने शिक्षक भंवरलाल परमार के निलंबन के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। मोर्चा का आरोप है—सरकार ने एक शिक्षक को नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आत्मा को निलंबित किया है। कुछ दिन पूर्व शिक्षा विभाग ने शिक्षक भंवरलाल परमार को निलंबित कर दिया था। आरोप गंभीर बताए गए— सरकार विरोधी गतिविधियों में संलिप्तता सोशल मीडिया व सार्वजनिक मंचों पर बयानबाजी एक राजनीतिक दल के पोस्टर-बैनर पर फोटो। लेकिन मोर्चा के नेता तुषार परमार का दावा इससे बिलकुल उलट है। उनका कहना है कि भंवरलाल परमार न किसी दल के आदमी हैं न किसी विरोध का चेहरा—वे एक समाज सुधारक हैं, जिनकी सामाजिक सक्रियता को राजनीतिक खतरा मानकर उन्हें निशाना बनाया गया है। मोर्चा खुले शब्दों में कह रहा है कि यह कार्रवाई सरकार की दमनकारी नीति का हिस्सा है। उनका तर्क है— “इतिहास पढ़ाना, संस्कृति समझाना और वैज्ञानिक सोच विकसित करना कोई अपराध नहीं। जब सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है कि आदिवासी इतिहास-संस्कृति पर बोलना गैरकानूनी नहीं, तो भंवरलाल परमार का निलंबन किस कानून के अंतर्गत उचित है? यह कार्रवाई सिर्फ एक शिक्षक पर नहीं, बल्कि पूरी आदिवासी अस्मिता पर हमला है।
धरना-प्रदर्शन के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर में युवाओं का जोश स्पष्ट दिखा।
नारे थे— “शिक्षक नहीं, आदिवासी आवाज़ निलंबित की गई है!” “हम इतिहास नहीं दबने देंगे!”
युवाओं के हाथों में संविधान की प्रतियां और मोर्चा के बैनर थे, और मंच से बार-बार यह सवाल उठ रहा था कि “क्या अब आदिवासी समाज के सुधारक भी सत्ता के लिए खतरा बन गए हैं?” प्रदर्शन के बाद मोर्चा ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आदि के नाम सौंपा। यह ज्ञापन सीधे भेजा गया।
डूंगरपुर में शिक्षक निलंबन पर आदिवासी युवा सड़क पर, शासन पर राजनीतिक साज़िश के आरोप

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