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डूंगरपुर जेल से कैदी का 800–1000 किमी दूर स्थानांतरण रद्द: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा—बिना ठोस कारण कैदी को दूर भेजना असंवैधानिक

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24 News Update डूंगरपुर। डूंगरपुर एक बार फिर न्यायिक बहस के केंद्र में रहा, जब राजस्थान हाईकोर्ट ने एक विचाराधीन बंदी को उसके गृह नगर से 800–1000 किलोमीटर दूर स्थित डूंगरपुर जेल भेजने के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि बिना सुरक्षा या प्रशासनिक आवश्यकता दर्शाए इस प्रकार का स्थानांतरण बंदी और उसके परिवार पर असंवैधानिक और अनुचित बोझ डालता है।

क्या था मामला?
याचिकाकर्ता पहले श्रीगंगानगर जेल में निरुद्ध था। बाद में प्रशासनिक आदेश से उसे डूंगरपुर जेल स्थानांतरित कर दिया गया—जो उसके निवास स्थान से लगभग 800 से 1000 किलोमीटर दूर है। रिकॉर्ड में यह उल्लेख नहीं था कि स्थानांतरण किसी सुरक्षा कारण, कानून-व्यवस्था की चुनौती या प्रशासनिक आपात स्थिति के चलते आवश्यक था। इसी आधार पर बंदी ने उच्च न्यायालय की शरण ली।

कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति फरजंद अली की एकल पीठ ने कहा कि यदि स्थानांतरण आवश्यक भी होता, तो भौगोलिक रूप से निकट और सुलभ विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए था। प्रशासन द्वारा ऐसे विकल्पों को नजरअंदाज करना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने अपने आदेश में कहा:
“याचिकाकर्ता का परिवार साधारण सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आता है और उसी शहर में निवास करता है। उनसे यह अपेक्षा करना कि वे केवल मुलाकात के लिए 800–1000 किलोमीटर की लंबी और कठिन यात्रा करें, एक असंगत और अनुचित कठिनाई थोपने के समान है। श्रीगंगानगर से डूंगरपुर तक की दूरी न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि अत्यधिक बोझिल भी है।”

परिवार पर पड़ा असमान भार
हाईकोर्ट ने माना कि इस स्थानांतरण से परिवार पर अत्यधिक आर्थिक और मानसिक दबाव पड़ा। लंबी दूरी की यात्रा, समय और खर्च—इन सभी पहलुओं को देखते हुए आदेश न्यायसंगत नहीं था। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक विवेकाधिकार असीमित नहीं है; उसे तर्कसंगत, पारदर्शी और मानवीय आधार पर प्रयोग किया जाना चाहिए। न्यायालय ने स्थानांतरण आदेश को निरस्त करते हुए स्पष्ट संकेत दिया कि बंदियों के अधिकार भी संवैधानिक सुरक्षा के दायरे में आते हैं। विचाराधीन कैदी को अनावश्यक रूप से दूरस्थ जेल में भेजना, जब तक कि उसके पीछे ठोस कारण न हों, न्यायसंगत नहीं माना जाएगा। इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि कारावास का अर्थ परिवार से पूर्ण विच्छेद नहीं है, और प्रशासन को अपने निर्णयों में मानवीय दृष्टिकोण बनाए रखना होगा।

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