24 News Update उदयपुर। राष्ट्रवाद के मिशन को लेकर राजनीति के मैदान में झंडा बुलंद करने वाली भाजपा के कमल की पंखुड़िया में आजकल कीचड़ में सनी नजर आ रही है। कभी किसी पार्षद के दुष्कर्म में फंसने की खबर आती है तो कभी किसी नेता को खुद दुष्कर्म का मामला दर्ज करवाना पड़ जाता है। बड़े नेताओं के जमीन घोटालों में शामिल होने की बात जनता के सामने आ जाती है। कभी पता चलता है कि नेता रिसोर्ट में पार्टनर बन गया है तो कभी अन्य मामलों की कानाफूसी शुरू हो जाती है। इससे ना सिर्फ पार्टी की छवि को बट्टा लग रहा है बल्कि साख तक दांव पर लगी हुई है।सबसे बड़ा मामला यह है कि ना तो नैतिकता के नाम पर इस्तीफे हो रहे हैं ना ही पार्टी स्तर पर आरोपों को लेकर ठोस कार्रवाई हो रही है। जबकि एक जमाना था कि आरोप लगते ही नेता खुद पद छोड़ देते थे मगर आजकल हाईकोर्ट तक का सफर तय करके जमानतों के इंतजाम हो रहे हैं। यही नहीं, इस दौरान आरोपियों का उठना बैठना ही पदाधिकारियों के साथ सार्वजनिक रूप से हो रहा है। याने अब पुलिस केस होना, किसी मामले में आरोप लगाना राजनीतिक शुचिता के दायरे में ही नहीं आ रहा है।सच तो ये है कि राजनीति में सबसे ख़तरनाक क्षण वह नहीं होता जब विपक्ष हमला करता है, बल्कि वह होता है जब अपने ही खुद आईना बनकर सामने आ जाते हैं। चेहरा ऐसा हो जाता है कि पहचान में नहीं आते हैं। भारतीय जनता पार्टी की उदयपुर इकाई आज ठीक उसी आईने के सामने खड़ी है जहाँ पर कमल की पंखुड़ियों पर आरोपों की धूल जम गई है। भाषण ऊँचे हैं, बातें बड़ी बडी हैं मगर वादे खोखले दिख रहे हैं। साफ है कि नैतिकता के स्तर पर ज़मीन नीचे से खिसक रही है।सवाल उन्हीं से पूछे जाते हैं जिनसे उम्मीदें होती हैं जनता की। और जो जनता का प्रिय है, उसे हर हाल में जवाब देना ही पड़ता है फिर चाहे कोई भी पार्टी हो या नेता, जवाबदेही से बच नहीं सकता। जिम्मेदारी तब और बढ़ जाती है जब आप सत्ता में होते हैं। जब आप सबके चहेतेे और लाडले हैं। आपको लेकर देश और संस्कृति के भविष्य के सपने देखे जा रहे हों। उम्मीदें इतनी ज्यादा हो कि लोग आंख मीच कर खुद से ज्यादा भरोसा आप पर कर रहे हों।यह पैटर्न उचित नहींकोई एक घटना, एक चेहरा या एक एफआईआर का सवाल नहीं है। यह पैटर्न बनता जा रहा है। और यह पैटर्न राजनीति में संयोग नहीं होते हैं।दुष्कर्म जैसे संगीन आरोपों में पार्षदों के नाम उछलना, ज़मीनखोरी की फाइलों में नेताओं की मौजूदगी, और सत्ता-समीपता को ढाल बनाकर हर सवाल से बच निकलने की कला ने इन सबने मिलकर संगठन को विचारधारा से खींचकर प्रबंधन की चौखट पर ला खड़ा किया है। चारित्रिक लक्ष्मण रेखा तय होनी चाहिएभाजपा जिस राष्ट्रवाद की बात करती है, वह केवल सीमा-रेखाओं का संरक्षण नहीं है। वह चरित्र का अनुशासन है जो बरसों में पार्टी के नेताओं ने सींचा है, कार्यकर्ताओं ने जिया है। राष्ट्रवाद में चारित्रिक दृढ़ता, साधनों की पवित्रता, समता, नैतिक साहस और उत्तरदायित्व बाय डिफोल्ट शामिल हैं। पर उदयपुर में राजनीति का व्यवहार इससे उलटा दिखता है— यहाँ साधन पवित्र हों, यह शर्त गायब है और लक्ष्य पवित्र हो, यह बहस गौण हो चुकी है। नैतिकता कानूनी तकनीक में बदल जाए और कलाबाजियां होने लगें तब पार्टी अपने ही मानकों से दूर जाने लगती है। कानून अपना काम करेगा ही, यह सही है। पर राजनीति कानून से पहले आचरण की शुचिता मांगती है। यह शुचिता अब पार्टी कैडर में जरूरी तौर पर महसूस की जा रही है। खांटी कार्यकर्ताओं की घुटन को कौन देखेगासबसे चिंताजनक तस्वीर वह है जो बंद कमरों में महसूस होती है। पार्टी के पुराने, खांटी और वैचारिक कार्यकर्ता—जिन्होंने झंडा उठाया, पोस्टर चिपकाए, और बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के संगठन को सींचा वे आज भीतर ही भीतर ऐसी बातें सुन कर टूट रहे हैं। अपनी बात कहें तो किससे, उम्मीद करें तो किससे, कहते हैं कि हम मिशन लेकर चले थे, रास्ते में मिशन गुम हो गया। सब कुछ मशीनी हो गया, संवेदनाएं मर सी गईं। हम रिवाइवल चाहते हैं। हम शुद्धिकरण चाहते हैं, हम सफाई नहीं सफाया चाहते हैं ऐसे लोगों का। कहते हें कि कुछ गंदी मछलियाँ पूरे तालाब को गंदा कर रही हैं। मगर उनकी चुप्पी संगठन की सबसे महंगी कीमत वसूल कर रही है—विश्वसनीयता। कैसे होगा शुद्धिकरण कौन करेगा पहलेउदयपुर भाजपा को अब शुद्धिकरण चाहिए। वाशिंग मशीन में चुन चुन कर धुलाई होनी चाहिए। आधे-अधूरे बयान, प्रतीकात्मक कार्रवाइयाँ और समय-टालू रणनीतियाँ अब काम नहीं करने वाली है। ज़रूरत है एक स्पष्ट, सार्वजनिक और कठोर शुद्धिकरण अभियान की। आप चाहें तो अग्नि परीक्षा भी कह सकते हैं इसे। ऐसे में यह किया जा सकता है कि आरोप गंभीर हों तो तत्काल संगठनात्मक दूरी बनाई जा सकती है, जाँच में सहयोग को अनिवार्य शर्त रखी जा सकती है। पार्टी की आंतरिक जांच हो सकती है। टिकट से पहले चरित्र-सत्यापन किया जा सकता हैं और सबसे अहम—गलत को गलत कहने का नैतिक साहस अगर बचा हो तो जुटाया जा सकता है। यह कदम किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, संगठन को बचाने के लिए जरूरी दिखाई दे रहा हैं क्योंकि पार्टी का नाम किसी व्यक्ति समूहों अथवा किसी ग्रुप की ढाल नहीं हो सकता। राष्ट्रवाद बनाम रियल एस्टेट पॉलिटिक्सउदयपुर में राजनीति का मौजूदा स्वर राष्ट्रवाद से अधिक रियल एस्टेट की भाषा और व्याकरण बोलता प्रतीत होता है। विकास का मतलब प्लॉट और संगठन का मतलब नेटवर्क बनता जा रहा है। सबको पता है कि कहां कौन माल बना रहा है। किस पार्टी का कौनसा नेता जमीनखोर है यह सब जानते हैं फिर चाहे भाजपा हो या कांग्रेस कोई अंतर नहीं है। मगर यहां बात भाजपा की शुचिता की हो रही है तो यही वह मोड़ है जहाँ पार्टी को तय करना होगा कि वह विचारधारा की राजनीति करेगी या सुविधा की क्योंकि जिस नर्सरी में पोषण पाकर ये फूल खिले हैं वहां की आचार संहिता में यह सब आज भी अवगुणों में शुमार है। उदयपुर की जनता सब देख रही है, अंधी तो शायद नहीं है। उसकी स्मृति भले छोटी हो, पर अपमान का सिलसिल लंबा होता है। आज अगर पार्टी ने अपने घर की सफ़ाई नहीं की, तो कल वही बातें ईवीएम मशीन के सामने बटन दबाते समय सवाल बनकर खड़ा न हो जाए। ऐसे में आख़िरी घंटी बज चुकी है यह ध्यान रहे। अवसर—अपने मूल्यों पर लौटने का अब भी है। साधन शुद्ध होंगे तो साध्य भी शुद्ध होगा यह असंभव तो नहीं है। क्या उदयपुर भाजपा इस वाक्य को दीवार पर टाँगकर रखेगी या संगठन में उतारने का साहस करेगी? क्योंकि कमल को सबसे बड़ा ख़तरा विपक्ष से नहीं—अपनी ही पंखुड़ियों के कीचड़ से है। जरा मंथन करें कि अगर सब यही मंत्र जपेंगे कि मेरे पा गाड़ी है, बंगाला है कार है….तो फिर मां किसके पास रहेगी??? 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