24 News Update Udaipur. कोटड़ा की खाई में गिरी जीप और 3 लोगोें की मौत सिर्फ एक सड़क हादसा नहीं, सत्ता और सिस्टम के चरित्र का टूटी हड्डी वाला एक्स-रे है। यह हादसा इसलिए और ज्यादा शर्मनाक है क्योंकि जिस इलाके का सांसद कभी खुद परिवहन विभाग में अफसर रह चुका हो, जहां के मंत्री खुद आदिवासी अंचल से ताल्लुक रखते हों और मंचों से विकास के बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हों, वहीं अगर लोग आज भी ओवरलोड जीपों में ठूंसकर मरने को मजबूर हों, तो इसे विफलता नहीं, सुनियोजित उपेक्षा ही कहा जाना चाहिए। नेता और जन प्रतिनिधि इस पाप से आजीवन मुक्त नहीं हो सकेंगे। एक जीप में 27 सवारियों का होना इस बात का सुबूत है कि पूरा सिस्टम फेल हो चुका है। जिनके जिम्मे निगरानी हैं वे हमको धोखा देकर हमारे ही टेक्स के पैसों से तनख्वाह और मानधन लेकर मजे कर रहे हैं। अफसरों और नेताओं के गठजोड़ ने पूरे सिस्टम का ही बेड़ा गर्क करके रख दिया है। उनकी नजर पहाड़ों में विला—यती बबूल उगाने और रिसोर्ट से अपनी पीढ़ियों के लिए मनी रिसोर्सेज् पैदा करने में ज्यादा है, जमीनी स्तर के काम करने में कम।
यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। ऐसे हादसे बरसों से हो रहे हैं और अगर हालात नहीं बदले, तो बरसों बरस तक होते रहेंगे। ना सरकारें बदलने से रूकेंगे ना अफसर बदलने से। बड़े अफसरों को नेता की गुलामी करनी है। नेता और जन प्रतिनिधि को अपनी पार्टी की आला कमान की बनाई पाठशाला में अनुशासित सिपाही बनकर हुक्म बजाना है। उसके पास रोड सेफटी जैसी फालतू और गैर जरूरी बातों के लिए समय ही कहां होता है।
कहने को स्मार्ट सिटी बन चुके उदयपुर से हर शाम को गांवों की ओर जाने वाली बसों, जीपों और अन्य सवारी वाहनों की हालत किसी से छुपी नहीं है। इसे देखने के लिए किसी दूरबीन की जरूरत नहीं है। सच नंगी आंखों से दिखता है। नेताओं को, अफसरों को, पुलिस को भी ये सच दिखता है कि एकदम ठसाठस बसें—जीपें सरपट भागें जा रही हैं। एक जीप में बस से ज्यादा सवारियां ठूंसी हुई है मगर फिर भी रास्ते में रूकते रूकते और सवारियां बिठाई जा रही है। लहराती हुई जीती जागती मौत समान झूमती बसों और जीपों को कोई रोकने वाला नहीं है। सच तो ये है कि रोक के कर क्या लेगा?? उल्टे बेचारे आदिवासी रस्ते में रात रह जाएंगे!!! ये मजबूरी के वाहन हैं जिनमें सफर करना अनिवार्य मजबूरी बन चुका है। ऐसे में सबसे जरूरी बात ये है कि अंग्रेजी वाले सफर शब्द में सफर करने वालों को कम सफर करना पड़े इसके बंदोबस्त करने चाहिएं, तुरंत, बिना किसी शोर—शराबे और फोटो सेशन की लंपटगिरी के। लेकिन काम कोई नहीं करना चाहता। क्योंकि काम करने से फोटो नहीं बनती, सुर्खियां नहीं मिलतीं और आलाकमान की नजरों में नंबर नहीं बढ़ते।
सच पूछें तो राजनीति अब सेवा नहीं, सिर्फ सेल्फ प्रमोशन का जरिया बन चुकी है। कोई नेता दूसरी पार्टी के नेताओं के पीछे हाथ धोकर पड़ा है, कलेक्टरों के सामने जन प्रतिनिधि अप्रिय लगने वाले तरीकों से झगड़ रहे हैं। उसके बाद सोशल मीडिया पर बकबक करते नजर आ रहे हैं। तो कोई मंतरी—संतरी बन कर सरकारी सिस्टम का लाभ उठाते हुए अपना घर भरने में व्यस्त हो गया है। लेकिन क्या आपने कभी देखा है कि हमारे नेता—जन प्रतिनिधि और महान अफसर ग्रामीण परिवहन के मुद्दे पर कहीं झगड़ पड़े हों। कहीं कोई चर्चा भी की हो?? और तो और कोई ट्विट या फेसबुक पोस्ट भी की हो। ये नहीं करेंगे क्योंकि इनको पता है कि इस मसले पर जब काम करना पड़ेगा तो जूते घिसने गिसने पड़ जाएंगे। पंगे लेने पड़ जाएंगे। अलग से बजट लाकर पूरी नई व्यवस्था खड़ी करनी पड़ेगी। जो संभवत: इनके बूते की बात ही नहीं है।
ऐसे में आदिवासी इलाकों के परिवहन जैसे बुनियादी सवाल पर सब एकजुट हैं—खामोशी में। गरीबों की मौत पर वैसे भी इस देश में कोई बड़ा शोर नहीं होता। अगर कहीं आवाज उठ भी जाए, तो उसे “मैनेज” करना सिस्टम ने सीख लिया है। अब होगा क्या, दो चार आंसू जन प्रतिनिधि बहा आएंगे मृतकों के घर जाकर, अस्पताल में सांत्वना देकर।
सबसे खतरनाक सच यह है कि राजस्थान में परिवहन माफिया कोई बाहर की ताकत नहीं बल्कि हर दौर में वे ही चला रहे हैं, जिनके हाथ में सत्ता है या जिनके रिश्तेदार सत्ता के गलियारों में बैठे हैं। यही वजह है कि ओवरलोडिंग खुलेआम होती है, बिना परमिट वाहन दौड़ते हैं और नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाते हैं। चलान केवल टू व्हीलर पर हेलमेट नहीं पहनने वाले का बनता है। गरीब आदिवासी की मजबूरी को कोई नहीं देखने वाला, यहां अगर सस्ते परिवहन की व्यवस्था कर देंगे तो यही लोग पढ़ लिखकर जागरूक हो जाएंगे। और बुनियादी समस्याओं को सुलझाने के लिए सवाल करने लगेंगे। इसलिए पूरा सिस्टम यही मंत्र जप रहा है कि इनको छोटी मोटी समस्याओं में ही उलझाए रखो।
सरकार अगर सच में विकास की बात करती है, तो दूरस्थ गांवों तक बिना लाभ-हानि का हिसाब लगाए सुरक्षित और प्रमाणिक सरकारी परिवहन उपलब्ध कराना उसका दायित्व है। लेकिन जब सरकार पीछे हट जाती है, तो निजी जुगाड़ू प्लेयर आगे आ जाते हैं और फिर खाइयों में जीप नहीं, इंसाफ गिरता है।
यह मान लेना चाहिए कि ऐसे हादसों में अगर एक भी गरीब की मौत होती है, तो वह पूरे सिस्टम पर कलंक है। यह दुर्भाग्य नहीं, सामूहिक अपराध है। जिसका कलंक कोई भी नेता, जन प्रतिनिधि और अफसर किसी साबुन से नहीं धो सकेगा। सवाल यह नहीं कि ब्रेक क्यों फेल हुए, सवाल यह है कि आखिर व्यवस्था कब तक फेल होती रहेगी? आइये!! दूसरा हादसा होने तक हम भी खामोशी की चादर तान लेते हैं!!!
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