24 News Update Udaipur. पिछले कुछ समय में कुछ दीक्षांत समरोह को प्रत्यक्ष देखने का अनुभव प्राप्त हुआ। दीक्षांत समारोह ज्ञान-साधना की पूर्णता और शैक्षणिक अनुशासन की सार्वजनिक स्वीकृति का सबसे गरिमामय अवसर कहा जाता है। वो क्षण जब महाविद्यालय अपने विद्यार्थियों को समाज के सुपुर्द करता है। डिग्री, पदक और आत्मविश्वास की पूंजी के साथ। परन्तु विडंबना है कि यह ऐतिहासिक और भावनात्मक अवसर एक ऐसी प्रवृत्ति का शिकार हो गया है, जिसने इसकी मूल आत्मा को ही लगभग हाशिये पर धकेल दिया हैं। नष्ट सा कर दिया है। मंचासीन माननीयों के अनियंत्रित, अनावश्यक और आत्मकेंद्रित लंबे भाषण,उनकी पॉलिटिकल जुगली, वाट्सएप फॉरवर्ड और फेसबुक की पोस्ट तक से गुजरने ले हैं। दीक्षांत समारोह का यह वाक्-विलास का प्रदर्शन वहां उपस्थित लोगों पर भारी पड़ता नजर आता है। हद तो ये है कि बड़े बड़े पदों पर बैठे लोग दीक्षात समरोह के भाषणों में सुपरबॉस को खुश करने या पॉलिटिकल आकाओं की मिजाज पुर्सी करने का प्रयास करने की निर्लज्जता के साथ कोशिश करते नजर आ रहे हैं। माननीय अतिथि जिनसे दिशा, दृष्टि और प्रेरणा की अपेक्षा की जाती है, मंच को आत्मप्रचार का विस्तार मान लेते हैं। भाषणों की लंबाई कई बार इतनी ज्यादा बढ़ा देते हैंं कि विषय से भटकते हुए पता नहीं कहां चले जाते हैं। और अंततः समारोह की स्पिरिट ही खत्म हो जाती है। विद्यार्थी—दीक्षार्थी, फेकल्टी, व अन्य अतिथि प्रतीक्षा, थकान और ऊब कर हैरान—परेशान हो जाते हैं व अतिथि को ही कोसने लगते है। ज्ञानियों के बीच ज्ञान पिलाने व बोलवचन करने वालों को कई तरह सकी उपमाएं भी मिल जाती है। यह न केवल समय का दुरुपयोग है, बल्कि उस सम्मान का भी हनन है, जिसके लिए यह आयोजन किया जाता है।

मंच पर बना दी डिग्रियों की रेल
स्थिति यह हो गई है कि डिग्री और स्वर्ण पदक वितरण, जो समारोह का प्रमुख ध्येय होना चाहिए, उसे समयाभाव के नाम पर औपचारिकता में समेट दिया जाता है। मंच से उतरते हुए विद्यार्थियों के चेहरे पर गर्व से ज्यादा तो जल्दबाजी में दिखाई देती है। धूप, अनुशासन और मौन सहते हुए बैठे छात्र-छात्राएँ यह सोचने को विवश हो जाते हैं कि क्या उनका वर्षों का परिश्रम भाषणों की भीड़ से कम महत्त्वपूर्ण था। यह प्रश्न व्यवस्था के प्रति गंभीर असंतोष को जन्म देता है। मंच पर हमने हालात यह देखे कि खुद बड़े अतिथि आवक जावक के संकेत दे रहे हैं। दौड़ कर डिग्री लेकर स्कॉलर आ रहा है जिसको धकियाते हुए अतिथियों के बीच पहुंचाया जा रहा है और एक सेकण्ड के भी बहुत कम वे हिस्से में तुरंत रेल बनाते हुए नीचे उतरने को कहा जा रहा है। ऐसे में जो खुशी स्कॉलर्स की, स्वर्ण पदक विजेताओं की और खास तरह के सम्मान पाने वालों की झलकनी चाहिए वो दिखाई ही नहीं देती। दीक्षार्थी बेचारा आपकी दी गई गाइड लाइन में बंध कर सुबह से कतार में लगा है। उसको आप इतना भी हक नहीं देते कि दो पल खुशी खुशी उसको एप्रिशिएट कर सकें, उसके साथ शान से फोटो खिंचवा सकें। बदले में दो शब्द प्रोत्साहन के कह सकें। मगर यह तब होगा जब माननीय अतिथि बेलगाम बोलने की प्रवृत्ति पर स्व अंकुश लगा पाएंगे।

शिष्टाचार का उल्लंघन, अकामिक मूल्यों की अवहेलना
अति माननीय अतिथियों को यह स्वीकार करना होगा कि शब्दों की गरिमा उनकी संख्या और लंबाई नहीं, बल्कि उनके औचित्य और समयबद्धता से तय होती है। इतिहास साक्षी है कि संक्षिप्त वक्तव्यों ने समाज की दिशा बदली है, जबकि लंबे भाषण प्रायः स्मृति में बोझ बनकर ही रह जाते हैं। इसके बावजूद दीक्षांत मंच पर आत्म संयम का अभाव चिंताजनक है। यह प्रवृत्ति केवल शिष्टाचार का उल्लंघन नहीं, बल्कि अकादमिक मूल्यों की अवहेलना भी है। पद अगर बड़ा है तो वचनों से कद भी उतना ही बड़ा रखना होगा।
इस स्थिति के लिए केवल वक्ताओं को ही दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। शैक्षणिक संस्थान भी उतने ही उत्तरदायी हैं, जो समय-सीमा निर्धारित करने में संकोच दिखाते हैं और गरिमा के नाम पर अनुशासनहीनता को मौन स्वीकृति दे देते हैं। दीक्षांत समारोह किसी पद या प्रभाव के प्रदर्शन का मंच नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के सम्मान का उत्सव है—और उत्सव में केंद्र वही होना चाहिए, जिनके लिए वह आयोजित है।
अब समय आ गया है कि दीक्षांत समारोहों की परंपरा पर पुनर्विचार किया जाए। भाषणों की अधिकतम समय-सीमा तय हो, विषयानुकूलता सुनिश्चित हो और डिग्री व पदक वितरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। जब तक मंच पर बैठे माननीय शब्दों पर संयम और समय पर सम्मान नहीं दिखाएँगे, तब तक यह पर्व अपनी गरिमा खोता रहेगा।


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By desk 24newsupdate

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