24 News Update उदयपुर। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के संघटक राजस्थान कृषि महाविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग में “जैविक कृषि द्वारा कौशल विकास” विषय पर संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन आईपीएम थियेटर में किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में किसान, विद्यार्थी और प्राध्यापक उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने की। उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि के सतत विकास के लिए जैविक पद्धति को अपनाना समय की आवश्यकता है। इससे न केवल किसानों की आय में वृद्धि होती है, बल्कि समाज के स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा भी होती है।
मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित श्री परमानंद जी, चित्तौड़ प्रांत संगठन मंत्री, भारतीय किसान संघ ने कहा कि गौ आधारित कृषि भारत की पारंपरिक और टिकाऊ पद्धति है। भारतीय गाय के गोबर और मूत्र से बने उत्पाद मृदा की उर्वरता बढ़ाते हैं और फसल की गुणवत्ता सुधारते हैं। उन्होंने किसानों से भावी पीढ़ी के हित में जैविक खेती अपनाने का आह्वान किया।
डॉ. जे. पी. मिश्रा, निदेशक अटारी, ने बताया कि केंद्र सरकार जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएँ चला रही है। इन योजनाओं के माध्यम से कृषि विज्ञान केंद्र किसानों तक आधुनिक तकनीक और जैविक विधियाँ पहुँचा रहे हैं।
कार्यक्रम के समन्वयक एवं राजस्थान कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. मनोज कुमार महला ने विभिन्न फसलों में कीट नियंत्रण के जैविक उपायों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि फेरेमोन ट्रैप और वनस्पति आधारित कीटनाशक जैविक खेती का अहम हिस्सा हैं।
डेयरी एवं खाद्य प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. लोकेश गुप्ता ने जैविक कृषि में पशुधन के रखरखाव और जैविक आहार की महत्ता बताई। कार्यक्रम में 160 से अधिक किसानों, विद्यार्थियों और प्राध्यापकों ने भाग लिया। किसानों को जैविक कृषि से संबंधित कीट नियंत्रण किट भी वितरित की गई।
अंत में डॉ. जगदीश चौधरी, आचार्य एवं विभागाध्यक्ष, सस्य विज्ञान विभाग, ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया।

