— रिपोर्ट जयवंत भैरविया

24 News Update उदयपुर।
सूचना का अधिकार अधिनियम लोकतंत्र का वह कानूनी हथियार है, जो प्रशासनिक फाइलों को जनता की निगरानी में लाने के लिए बनाया गया। कानून सत्ता के गलियारों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए चेक एंड बैलेंस का काम करता है। लेकिन उदयपुर पुलिस महकमे में यही कानून अब खुद कस्टोडियल इंटेरोगेशन से गुजरता दिखाई दे रहा है। हर RTI आवेदन को बहानों की रिमांड पर भेज दिया जाता है। उसके बाद उसका जो हाल होता है वह किसी से छिपा नहीं है। जमीनी हकीकत यह हो गई है कि उदयपुर पुलिस ने सूचना के अधिकार के लिए एक फिक्स्ड ऑपरेटिंग पैटर्न विकसित कर लिया है। इस पैटर्न में न तो समयसीमा का पालन है, न ही अधिनियम की भावना का सम्मान। 30 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर सूचना देना तो दूर, अधिकांश मामलों में आवेदक को साइलेंट ट्रीटमेंट दिया जाता है। तय समय बीतने के बाद जो जवाब जारी होते हैं, वे सूचना कम, टरकाने और आवेदक को ही हरैस करने के उपाय ज्यादा लगते हैं।

RTI को घेरने की तैयारशुदा चार्जशीट
पुलिस के बहाने हजार हैं आवेदक के दिल के टुकड़े करने के। कानून बताने, सुप्रीम कोर्ट की नजीरें देने और सूचना आयोग, राज्य पुलिस महकमे के आदेश बताने के बाद भी सूचना नहीं देने का एकदम झक्कास फुलप्रूफ सिस्टम है। आवेदकों को एक जैसी धाराओं का हवाला देते हुए टरकाया जाता है। कहते हैं कि सूचना संधारित नहीं है। सूचना शून्य है। सूचना प्रश्नात्मक है। लोकहित/जनहित स्पष्ट करें। सूचना गोपनीय है। रिकॉर्ड किसी प्रारूप में उपलब्ध नहीं। सूचना स्पेसिफिक नहीं है। धारा 8 के तहत अपवर्जित। घटना से अपना संबंध प्रमाणित करें। याने इतने रेडिमेड बहाने हैं कि पुलिस के पास कि हर प्रश्व आंसू बहाते हुए लाजवाब हो जाता है। कुल मिलाकर, फाइलों में RTI का प्रशासनिक एनकाउंटर होता दिखता है, जहां सूचना ज़िंदा नहीं बचती।

प्रथम अपील को भूल जाओ, सुनवाई ही नहीं होती
सूचना न मिलने या विधिविरुद्ध उत्तर के बाद जब आवेदक प्रथम अपील का सहारा लेता है, तो मामला और गंभीर हो जाता है। उदयपुर पुलिस में प्रथम अपीलीय अधिकारी के रूप में पदस्थ पुलिस अधीक्षक एवं नामित अधिकारी एसपी साहब के समक्ष अपीलें प्रायः लंबित फाइल बनकर रह जाती हैं। न सुनवाई, न आदेश—यानी अपीलीय प्रक्रिया भी डेड एंड पर आकर रूक जाती है।

सूचना आयोग के आदेश भी बेअसर
स्थिति यहीं नहीं रुकती। राज्य सूचना आयोग द्वारा पारित स्पष्ट आदेशों और स्थापित न्यायिक दृष्टांतों के बावजूद, उदयपुर पुलिस कई मामलों में सूचना देने से इनकार कर आयोगीय आदेशों की अवहेलना करती नजर आती है। यह रवैया सीधे तौर पर संवैधानिक संस्था की अवमानना की श्रेणी में आता है।

धारा 4 भी फाइलों में बंद
RTI अधिनियम की धारा 4—जो स्वप्रकाशन और पारदर्शिता की रीढ़ मानी जाती है—उदयपुर पुलिस के रिकॉर्ड में शायद ही दिखाई देती है। लोक दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से बचने का यह रवैया इस आशंका को और मजबूत करता है कि सूचना के उजागर होते ही कई प्रशासनिक गड़बड़ियां सामने आ सकती हैं।

CCTV फुटेज केवल दिखावे के, जनता का पैसा मगर पहरा पुलिस का
थानों में लगे CCTV कैमरों के फुटेज को लेकर सुप्रीम कोर्ट, राज्य सूचना आयोग और स्टेट क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के स्पष्ट दिशा-निर्देश मौजूद हैं। इसके बावजूद उदयपुर पुलिस फुटेज उपलब्ध कराने से बचने के लिए नए-नए तकनीकी और प्रक्रियात्मक हथकंडे ईजाद कर रही है। अब गोपनीयता का तर्क कम, और आवेदक से लोकहित, जनहित और घटना से संबंध पर निबंध लिखवाने की शर्त ज्यादा देखने को मिल रही है—ताकि अधिकार को प्रक्रिया के जाल में उलझाकर निष्प्रभावी किया जा सके। ठान रखा है कि सूचना नहीं देनी है तो नहीं देनी है। इसके लिए चाहे जितने कानून बताए जाएं। सूचना थाने की दहलीज तक नहीं लांघ पाती है बेचारी।

पूरा परिदृश्य कई असहज सवाल खड़े करता है
क्या सूचना का अधिकार अधिनियम का सम्मान कराने के लिए हर बार सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ेगा?
क्या सरकार और जनप्रतिनिधियों की इस प्रशासनिक उदासीनता पर कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? और सबसे बड़ा सवाल—उदयपुर पुलिस RTI की आत्मा को कब तक हिरासत में रखेगी?


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