24 News Update दिल्ली। भारतीय जातीय संस्कृति और भक्ति परंपरा के पुनर्पाठ का महत्वपूर्ण उपक्रम ‘भक्ति अगाध अनंत’ जैसे ग्रंथों के माध्यम से संभव हो रहा है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने कहा कि यह कृति हज़ार वर्षों की भारतीय कविता को एक साथ देखने का दुर्लभ अवसर प्रदान करती है और हमारी सांस्कृतिक स्मृति का पुनर्वास करती है। वे विश्व पुस्तक मेले में राजपाल एंड सन्स द्वारा आयोजित परिचर्चा में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे।अशोक वाजपेयी ने कहा कि भारतीय भक्ति कविता इस बात का सशक्त प्रमाण है कि हमारे जनमानस में कविता के प्रति कितना गहरा, अनुरागपूर्ण और आत्मीय भाव रहा है। उन्होंने रज़ा न्यास के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि न्यास इस बात के लिए आभारी है कि ग्रंथ के संपादक माधव हाड़ा ने निर्धारित समयसीमा में अत्यंत मनोयोग, अनुशासन और वैचारिक स्पष्टता के साथ इस संचयन को पूर्ण किया।परिचर्चा के आरंभ में इतिहास की अध्येता डॉ. तृप्ति श्रीवास्तव ने भक्ति कविता के अखिल भारतीय स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भक्ति अगाध अनंत केवल एक संकलन नहीं, बल्कि ऐसा सांस्कृतिक दस्तावेज़ है जिसमें विभिन्न भाषाओं, प्रदेशों और परंपराओं की भक्ति कविताएँ एक साझा धरातल पर उपस्थित हैं। उन्होंने इसे भारतीय साहित्यिक परंपरा की बहुलता और संवादशीलता का प्रमाण बताया।हिंदू कॉलेज के प्रोफेसर रामेश्वर राय ने पुस्तक के वैचारिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय भक्ति साहित्य की व्याख्या लंबे समय तक औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रभावित रही है। इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि इसमें उत्तर और दक्षिण भारत—दोनों की भक्ति परंपराओं को सम्यक और संतुलित रूप से स्थान दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों का विस्तार करते हुए भारतीय समाज की आध्यात्मिक चेतना को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।युवा आलोचक पल्लव ने पुस्तक की रचना प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए कहा कि भक्ति अगाध अनंत जैसे संचयन भारत जैसे विशाल और विविध सांस्कृतिक समाज में अत्यंत आवश्यक हैं। ऐसे प्रयासों से ही हम अपने साहित्य को समग्रता और अंतर्संबंधों के साथ देख और समझ सकते हैं। ग्रंथ के संपादक माधव हाड़ा ने रज़ा न्यास और राजपाल एंड सन्स के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय भक्ति चेतना प्राग्वैदिक काल से निरंतर प्रवाहित रही है और उसमें किसी प्रकार का ऐतिहासिक विच्छेद नहीं मिलता। उन्होंने स्पष्ट किया कि भक्ति किसी परलोक-व्यग्र चेतना की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि वह मनुष्य के पार्थिव सरोकारों, सामाजिक चिंताओं और मानवीय संवेदनाओं की कविता है।कार्यक्रम का संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने किया। सत्र के समापन पर राजपाल एंड सन्स की प्रबंध निदेशक मीरा जौहरी ने सभी वक्ताओं, श्रोताओं और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation नन्हे क्रिकेटरों के सपनों को मंच: धानवी कप अंडर-16 सीजन–2 की ट्रॉफी का अनावरण मकर संक्रांति पर वृक्षम अमृतम द्वारा गौ पूजन कार्यक्रम, तिल के लड्डू, गुड़ – रोटी, हरा चारा खिला कर की गौ सेवा