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प्रयागराज : माघ मेला में शंकराचार्य विवाद ने लिया नया मोड़: शिविर के बाहर चस्पा हुआ नोटिस, साबित करें ​आप शंकराचार्य कैसे??

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24 News Update प्रयागराज। प्रयागराज माघ मेले में सोमवार को उपजा विवाद अब प्रशासनिक कार्रवाई और संवैधानिक सवालों के केंद्र में आ गया है। रथ (पालकी) रोके जाने के विरोध में धरने पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को माघ मेला प्रशासन ने औपचारिक नोटिस जारी कर दिया है। नोटिस में उनसे 24 घंटे के भीतर यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि वे स्वयं को किस आधार पर “शंकराचार्य” घोषित कर रहे हैं।

आधी रात की कार्रवाई, सुबह चस्पा हुआ नोटिस
सोमवार देर रात करीब 12 बजे माघ मेला क्षेत्र में कानूनगो अनिल कुमार शंकराचार्य के शिविर पहुंचे। उन्होंने शिष्यों से नोटिस रिसीव कराने को कहा, लेकिन शिष्यों ने यह कहकर नोटिस लेने से इनकार कर दिया कि रात में कोई अधिकृत व्यक्ति मौजूद नहीं है। मंगलवार सुबह कानूनगो दोबारा शिविर पहुंचे और मुख्य द्वार पर नोटिस चस्पा कर दिया गया। यह नोटिस प्रयागराज मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की ओर से जारी किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला
नोटिस में सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का उल्लेख किया गया है। प्रशासन के अनुसार, जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिष्पीठ से जुड़े विवाद में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि अंतिम फैसले तक किसी भी व्यक्ति को शंकराचार्य घोषित नहीं किया जा सकता और न ही किसी प्रकार का पट्टाभिषेक किया जा सकता है।
प्रशासन का कहना है कि यह मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और अब तक कोई संशोधित या नया आदेश पारित नहीं हुआ है। ऐसे में माघ मेले के दौरान शिविर में लगे बोर्ड पर स्वयं को “ज्योतिष्पीठ का शंकराचार्य” लिखना, अदालत के आदेश की अवहेलना की श्रेणी में आता है।

अविमुक्तेश्वरानंद का तेवर सख्त
इधर, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने रुख पर अड़े हुए हैं। उन्होंने साफ कहा है कि जब तक मेला प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगता, वे आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे। सोमवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने यह भी ऐलान किया कि वे हर माघ मेले में प्रयागराज आएंगे, लेकिन शिविर में नहीं—बल्कि फुटपाथ पर रहकर साधना करेंगे।
धरने के दौरान उन्होंने वहीं पूजा-पाठ भी किया, जिसे उनके समर्थकों ने “धार्मिक अधिकारों पर हस्तक्षेप के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध” बताया।

सियासी रंग भी चढ़ा
मामले ने राजनीतिक तूल भी पकड़ लिया है। सोमवार शाम समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने फोन पर शंकराचार्य से बातचीत की और समर्थन का भरोसा दिया। उन्होंने जल्द मुलाकात की बात भी कही, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि यह विवाद अब केवल प्रशासन और संत समाज तक सीमित नहीं रहा।

मौनी अमावस्या से शुरू हुआ टकराव
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ मौनी अमावस्या का दिन है, जब शंकराचार्य की पालकी को पुलिस ने संगम की ओर जाने से रोक दिया था। पुलिस का तर्क था कि भीड़ नियंत्रण के चलते पैदल जाना होगा, लेकिन शिष्य नहीं माने और पालकी आगे बढ़ाने का प्रयास किया। इसी दौरान पुलिस और शिष्यों के बीच धक्का-मुक्की हुई, कई शिष्यों को हिरासत में लिया गया।
इससे नाराज होकर शंकराचार्य धरने पर बैठ गए और शिष्यों की रिहाई की मांग करने लगे। हालात करीब दो घंटे तक तनावपूर्ण बने रहे। बाद में पुलिस ने और समर्थकों को हिरासत में लिया तथा पालकी को संगम से लगभग एक किलोमीटर दूर खींचकर ले जाया गया। इस दौरान पालकी का एक हिस्सा टूट गया और शंकराचार्य स्नान भी नहीं कर पाए।

अब सवाल कई
माघ मेला प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन की बात कर रहा है, वहीं शंकराचार्य इसे धार्मिक स्वतंत्रता और सम्मान से जोड़ रहे हैं।
अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि 24 घंटे की समयसीमा में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद क्या जवाब देते हैं और क्या यह मामला एक बार फिर अदालत की चौखट तक पहुंचेगा—या फिर सुलह की कोई राह निकलेगी।

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