24 News Update उदयपुर। भारतीय रेलवे ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि समस्या ट्रेन में नहीं, सोच में है। उदयपुर–जयपुर और उदयपुर–आगरा वंदे भारत को चुपचाप पटरी से उतारकर अब उदयपुर–असारवा वंदे भारत थमा दी गई है। ऐसा जैसा कि यात्रियों को यह समझा दिया गया हो कि जो मिल रहा है, उसी में खुश रहो। सवाल मत पूछा, मजे की बात है कि इसे भी सांसद की ओर से सौगात बताया जा रहा है जैसे जनता निरी मूर्ख ही हो। सवाल सीधा है कि क्या रेलवे ने पिछली वंदे भारत की नाकामी से कुछ भी सीखा या फिर प्रयोग पर प्रयोग चल रहे हैं। अगर नहीं, तो यह नई ट्रेन भी वही हश्र देखेगी जो पहले दो ट्रेनों ने देखा। वंदे भारत कोई लोकल पैसेंजर नहीं, यह प्रीमियम हाईस्पीड ट्रेन है। और इसे सिर्फ असारवा तक सीमित करना रेलवे की रणनीतिक नाकामी का प्रमाण ही कहा जा रहा है। उदयपुर–अहमदाबाद की दूरी इतनी नहीं कि यात्री महंगा किराया देकर वंदे भारत को प्राथमिकता दें, जब पहले से सस्ती और सुविधाजनक ट्रेनें उपलब्ध हैं। अगर ज़रा-सी समझदारी दिखाई जाती और इस ट्रेन को सूरत तक बढ़ाया जाता, तो दक्षिण गुजरात का उद्योग कपड़ा और हीरा व्यापार
मुंबई कनेक्टिविटी सब अपने आप यात्रियों को खींच लाते। लेकिन नहीं, रेलवे को फिर आधी दूरी की आधी सोच से ही काम चलाना है।
आगरा वंदे भारत की क्यों निकाल दी अंतिम यात्रा
उदयपुर–आगरा वंदे भारत को बंद करना तो मानो यात्री सुविधा की ही अंतिम यात्रा निकाल देना है। जब पूरा उत्तर भारत जानता है कि असली यात्री दबाव दिल्ली एनसीआर के लिए है, तब आगरा पर गाड़ी रोक देना कौन-सी बुद्धिमत्ता है? अगर इस ट्रेन को निजामुद्दीन तक बढ़ा दिया जाता, तो यह ट्रेन खुद अपना किराया वसूल कर लेती। लेकिन रेलवे ने आसान रास्ता चुना है। यात्री नहीं मिल रहे? बंद कर दो। यही तो प्रशासनिक ढीठता है।
विकल्प थे, पर इच्छा नहीं
आगरा वंदे भारत की जगह— जनशताब्दी इंटरसिटी एक्सप्रेस या सीमित दिनों की सेवा कुछ भी चलाया जा सकता था। लेकिन नहीं, पूरी तरह बंद कर देना रेलवे का पसंदीदा शगल बन चुका है। यह न तो योजना है, न प्रबंधन—यह सीधा-सीधा यात्री विरोधी फैसला है। वंदे भारत का ब्रांड, रेलवे की सोच पैसेंजर वाली रेलवे एक तरफ वंदे भारत को भारत की शानबताता है और दूसरी तरफ उसे ऐसे रूट पर डाल देता है जहाँ ना दूरी है, ना डिमांड। फिर जब ट्रेन खाली जाती है तो यात्री नहीं मिले रहे हैं का रोना शुरू कर देते हैं। अरे भाई, गलत रूट पर दौड़ाओगे तो यात्री कहां से आएंगे? अब सवाल यात्रियों का नहीं, रेलवे की समझ का है
मेवाड़ पूछ रहा है कि क्या हर वंदे भारत पहले चलाओ, फिर बंद करो योजना के तहत आ रही है?
क्या उदयपुर सिर्फ प्रयोगशाला बनाने व सपने दिखाने के लिए ही है? लोग तंग आ चुके हैं दक्षिण मुंबई तक की रेलागड़ियों के जुमले वाले सपनों से। जन प्रतिनिधियों में वो दम ही नहीं बचा है कि इस बारे में सशक्त मंच पर इकट्ठा होकर बात कर सकें। इनको तो अपनी अपनी पार्टियों के कार्यक्रमों और उपरी स्तर पर जी हुजूरी से ही फुर्सत नहीं है। अगर रेलवे को सच में आंखें खोलनी हैं, तो उसे समझना होगा कि ट्रेनें घोषणाओं से नहीं, सही रूट से चलती हैं। वरना उदयपुर–असारवा वंदे भारत से भी स्वर उठेगा— यात्रीगण कृपया ध्यान न दें। आपको दी गई गई सौगात बंद की जा रही है।

