निम्बाहेड़ा (कविता पारख)। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर श्री दयानंद सभागार, निम्बाहेड़ा में शनिवार को भारतीय साहित्य परिषद, निम्बाहेड़ा द्वारा आयोजित प्रबुद्ध जन एवं साहित्यकारों की संगोष्ठी में सभी वक्ताओं ने एक स्वर से मातृभाषा के महत्व को इंगित करते हुए कहा कि मातृभाषा व्यक्ति के साथ-साथ उसकी संस्कृति और परंपराओं की संवाहक होती है। शिक्षा के साथ-साथ समाज और व्यापार में भी मातृभाषा का उपयोग होते रहना चाहिए।
कार्यक्रम संयोजक रवीन्द्र कुमार उपाध्याय ने बताया कि वरिष्ठ नागरिक मंच अध्यक्ष भजन जिज्ञासु के आह्वान पर आयोजित मातृभाषा चिंतन विषयक संगोष्ठी में वक्ताओं ने अपनी मातृभाषा में गद्य-पद्य की प्रस्तुतियां देकर यह आवश्यकता प्रकट की कि हमें मातृभाषा का सम्मान ही नहीं, उसका उपयोग भी करना चाहिए। हमें मातृभाषा संरक्षण के साथ-साथ बहुभाषायी विविधता का भी सम्मान करना चाहिए। वक्ताओं ने सिंधी, पंजाबी, बंगाली, गुजराती तथा दक्षिण भारतीय समाज के लोगों द्वारा अपने परिवार और जाति-समाज में अपनी मातृभाषा के अत्यधिक उपयोग पर खुशी और गर्व प्रकट किया।
इस अवसर पर कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय के कुलाधिपति कैलाश मूंदड़ा ने मारवाड़ी भाषा में कल्ला जी के शौर्य और पराक्रम के साथ-साथ अपनी मातृभाषा के संस्मरण प्रकट किए, तो दूसरी ओर प्रोफेसर भगवान साहू ने उड़िया भाषा में जगन्नाथ संस्कृति का परिचय दिया। पूर्व प्रधानाचार्य नरेंद्र शर्मा ने मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिया, तो समाज सेविका वर्षा कृपलानी ने सिंधी भाषा की महत्ता प्रकट की। पूर्व प्रधानाचार्य प्रद्युम्न श्रीमाली ने देववाणी संस्कृत में उद्बोधन और काव्य प्रस्तुत किया।
मातृभाषा चिंतन संगोष्ठी का प्रारंभ रोजेदार एवं राष्ट्रवादी कवि वाजिद अली ने सरस्वती वंदना के साथ कर साहित्यकारों को भाव-विभोर कर दिया। अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा सदैव भारतीय भाषाओं के संवर्धन और प्रचार-प्रसार की वकालत की जाती रही है। इसी क्रम में शायर एजाज अहमद ने उर्दू की बात कही।
साहित्य परिषद निम्बाहेड़ा के अध्यक्ष एस.एन. जोशी ने मालवा भाषा में अपने विचार व्यक्त किए, तो साहित्य परिषद के पूर्व अध्यक्ष एवं लेखक बी.सी. पांडे ने भोजपुरी में विचाराभिव्यक्ति देकर राजस्थानी और भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने की वकालत की।
डॉ. सुरेश चंद्र कुमावत ने राजस्थानी कविता, प्रबुद्ध नागरिक यू.एस. शर्मा ने हाड़ौती में, शिक्षाविद जानकी लाल जोशी ने हिंदी में अपनी बात रखी। हिंदी के व्याख्याता रमेश लक्षकार और अशोक जायसवाल ने मातृभाषा के संस्मरण सुनाए। ब्लॉगर भजन जिज्ञासु ने मीठी वाणी सिंधी में मधुर गीत सुनाकर मातृभाषा की वकालत की। संयोजक रविंद्र उपाध्याय ने अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी के इतिहास को बताते हुए कहा कि यूनेस्को द्वारा बांग्लादेश में बांग्ला भाषा के समर्थन में किए गए आंदोलन की स्मृति में मातृभाषा और भाषाई विविधताओं के संरक्षण हेतु वर्ष 1999 में 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा की गई। वर्ष 2000 के बाद प्रतिवर्ष अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का आयोजन 21 फरवरी को किया जाता है।

