24 News Update सागवाड़ा (जयदीप जोशी)। नगर के महिपाल विद्यालय खेल मैदान में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के तत्वावधान में चल रही सात दिवसीय भगवान शिव कथा के दूसरे दिन साध्वी भारती गरिमा भारती जी ने शिवमहापुराण की कोटिरुद्र संहिता के अंतर्गत महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कथा को विस्तारपूर्वक, सारगर्भित तथ्यों के साथ वर्णित किया।भगवान शिव ने जहां भक्तों के कल्याण के लिए अनेकानेक अवतार धारण किए, जैसे शार्दूलावतार, गृहपतिवतार, यक्षेवरावतार, पिप्पलादवतार, वैद्यनाथ अवतार, द्विजेश्वरावतार, अवधूतेश्वर अवतार, यतिनाथ इत्यादि, वहीं बारह ज्योतिर्लिंगों के रूप में प्रकट होकर भक्तों के कष्टों का निवारण किया। उज्जैन में स्थापित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्वरूप अपने भक्तों की रक्षा के कारण ही भगवान शिव ने धारण किया। आज यही महाकालेश्वर मंदिर व उज्जैन नगरी भक्तों के लिए पवित्र तीर्थ है।हमारे समस्त तीर्थ स्थल वास्तव में हमें हमारे घट में व्याप्त परम सत्ता अर्थात् शिवतत्त्व को जानने का संदेश देते हैं, क्योंकि हमारे समस्त धर्मग्रंथों में कहा गया है कि ईश्वर का निवास स्थल प्रत्येक मानव का अंतर्घट है। योगशिखोपनिषद् में कहा गया है— “देहं शिवालयं प्रोक्तं” अर्थात् यह शरीर ही शिवालय है। हमारे ऋषियों ने अपने अंतरघट में जो अनुभूतियां प्राप्त कीं, उन्हीं को बाहर इन तीर्थ स्थलों के रूप में इंगित किया।आज यदि हम सामाजिक परिवेश को देखें तो आवश्यकता है मानव को घट के भीतर के तीर्थ में स्नान कर पावन होने की, क्योंकि बाहर से अधिक मानव भीतर से मैला है। मन की कलुषता के कारण मानव अपवित्र है। एक मदिरा से भरे घड़े को यदि स्वच्छ करना चाहते हैं तो मात्र बाहर से ही नहीं, भीतर से भी उस कलश को स्वच्छ करना होगा, तभी मदिरा की गंध दूर होगी।आज मानव को एक ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के कृपाहस्त तले उस युक्ति को जानना होगा, जिस ज्ञान के माध्यम से वह घट में उस अमृत का पान कर शांत चित्त हो पाए। मात्र ईश्वर के नाम का अमृतपान ही विकारों की अग्नि को बुझाकर हमें शांति प्रदान कर सकता है। शांत चित्त मन से ही सकारात्मक विचारों और श्रेष्ठ भावनाओं का उदय हो सकता है।सर्वश्री आशुतोष महाराज जी कहते हैं कि जैसे नदी का उद्गम स्रोत पहाड़ की तलछटी में स्थित होता है, वैसे ही शांति का स्रोत बाहर नहीं, भीतर है। वह शांति कहीं बाहर से नहीं मिलेगी। उस ईश्वर को जानकर ही वास्तविक शांति को प्राप्त किया जा सकता है। उसी ईश्वर को जानकर ही मानव की स्वार्थी प्रवृत्ति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की सोच में परिणत हो सकती है।भगवान शिव के जो भारत के कोने-कोने में ज्योतिर्लिंग स्वरूप स्थापित हैं, वे भगवान शिव के निराकार ब्रह्म स्वरूप को दर्शाते हैं। प्रभु शिव ज्योतिर्लिंग रूप में हमारे भीतर विद्यमान हैं। भगवान शिव की अपने भक्तों के उद्धार हेतु की गई प्रत्येक लीला आध्यात्मिक ज्ञान की ओर हमें अग्रसर करती है। हमारे समस्त ग्रंथों में भगवान शिव के वास्तविक स्वरूप को निराकार ओंकार स्वरूप कहकर संबोधित किया गया है। ओंकार स्वरूप को जानकर ही हम अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं।भगवान शिव के हाथ का त्रिशूल शाश्वत नाम, डमरु अनहद संगीत तथा प्रभु का जटाजूट मुकुट, जिसमें चंद्रमा सुशोभित है, वह भगवान भोलेनाथ के वास्तविक स्वरूप प्रकाश की ओर इंगित करता है। उनके मस्तक पर सुशोभित गंगा अमृत स्वरूप है। भगवान शिव का अपने अंतःकरण में बृहदेश्वर मंदिर में साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए हमें अपने जीवन में एक आध्यात्मिक सद्गुरु की आवश्यकता है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... Related Discover more from 24 News Update Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe Post navigation सहस्त्र बड़ी औदिच्य दस गांव संस्थान का प्रतिभाओं का महासंगम, प्रतिभा सम्मान समारोह सम्पन्न 76 प्रतिभाओं को किया सम्मानित अयोध्या हनुमानगढ़ी महंत के सागवाड़ा आगमन पर किया भव्य स्वागत