24 News Updaet उदयपुर। आज दो टूक बात करेंगे उदयपुर शहर जिला कांग्रेस की। कल हमने देहात जिला कांग्रेस की बात की जिसे काफी सराहा गया। कई कमेंट व सुझाव आए। जिन पक्षों के हिस्से में आलोचना के स्वर आए उनसे नराजगी के स्वर भी आए, उन सबका तहे दिल से साधुवाद। राजनीतिक के महासमर में आज बात करेंगे उदयपुर कांग्रेस के ‘हिम—युग’की। शहर कांग्रेस में हलचल तो बहुत हैं मगर लगता है कि सब कुछ ठंड में थम सा गया है। कोई आग बची तो हैं मगर पता नहीं चल रहा है कि वो सुलग कर कब राजनीतिक दावानल बनेगी। बन पाएगी भी या नहीं, या फिर बरसों बरस तक दीये ही टिमटिमाते रहेंगे किसी पवन के झोंके के आशीर्वाद से। फतह होकर भी फतह नहीं हो पाने के हालात। बिखरवा के बावजूद एकजुट दिखने की आस। भितरघात और खेमेबंदी के बीच वर्चस्व की आस। उम्मीदें बहुत हैं मगर ग्राउंड लेवल पर कोशिशें मुट्ठी भर भी नहीं। कार्यकर्ता के उत्साह से लेकर पदाधिकारियों के हौसलों तक पर बिछी बर्फ की चादर वाले इस ठहराव भरे मौसम के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है?? अपने घर के चिराग रोशन करके पार्टी को ठंडे बस्ते में डालने वाले या फिर पड़ोसी के चूल्हे से आग लेकर खुद रोटियां सेकने वाले??? आइये समझने का प्रयास करते हैं— खानाबदोशी ऐसी कि पिछले 50 साल में एक अदद आशियाना मयस्सर न हो सका उदयपुर शहर कांग्रेस को।उस पर अलग अलग गुटों की आपसी खींचतान और संगठन सृजन की जटिलताओं के बीच स्व सृजन की चाहतों की भेंट चढ़ती विचारधारा उदयपुर शहर कांग्रेस को लगातार चुनौती दे रही हैं।बात शुरू करते हैं दूसरी बार जिलाध्यक्ष पद को सुशोभित करने वाले फतहसिंह राठौड़ साहब से। राठौड़ ने अपने पहले पहला कार्यकाल में संगठनिक गतिविधियों को आगे बढ़ाया व उत्साह जगाने की कोशिश की लेकिन कोशिशें रंग नहीं लाई क्योंकि ना तो कार्यकर्ता गेल्वेनाइज हो पाया ना ही खेमाबरदारों को यह समझ आ पाया कि उनके खेम से हटकर भी कोई कांग्रेस का अस्तित्व संभव है। संगठन सृजन याने कि फिर से अध्यक्ष चुने जाने की प्रक्रिया के दौरान फतहसिंह राठौड़ ने जिस तरीके से बाजी मारी उसके खासे चर्चे रहे। दिनेश खोडनिया का समर्थन तो था ही मगर अन्य नामों को पार पाने की जो चुनौती थी वे भी कम नहीं थी। संगठन सृजन के दौरान पंकज शर्मा या फिर दिनेशजी के रूप में निर्णायक रूप में राय सामने आ गई थी। बदलाव सब चाह रहे थे मगर अचानक पवन खेडा की सक्रिय भूमिका ने पूरे समीकरण को बदल कर रख दिया। पवन खेडा, जो उदयपुर से PCC और CWC सदस्य हैं, बताया जा रहा है कि उन्होंने जिलाध्यक्ष के चयन में फतहसिंह राठौड़ के पक्ष में अहम भूमिका निभाई। संदेश यह साफ साफ गया कि बिसात पवन खेड़ा की हैं जो उदयपुर से चुनाव लड़ने की दबी हुई इच्छा को इस बहाने चर्चा—च—आम करना चाहते हैं। अध्यक्ष उनके खेमे का ताकि बिसात उनके नाम की बिछे, नाम निचले कैडर से आए और उपर से मुहर लगाने में दिक्कत ना आए। इस अच्छी सी जाल बुनाई की खबर खबर आते ही “बाहरी को स्वीकार नहीं किया जाएगा,” के नारे गूंजने लगे और यह संदेश शहर कांग्रेस के अंदर व्यापक स्तर पर फैल गया क्योंकि गौरव वल्लभ के रूप में एक धोखा कांग्रेस पहले ही खा चुकी है। कार्यकर्ता कहने लगे—एक धोखा खा चुके हैं, और खा सकते नहीं, आपनी हस्ती मिटा सकते नहीं। बहरहाल, ताजपोशी फतहसिंहजी की दुबारा हुई। पदभार ग्रहण समारोह के दौरान पवन खेडा की ओर से कांग्रेस भवन के लिए 5 लाख की घोषणा ने संकेत दिया कि उनकी निकाली बात अब दूर तलक जाएगी।डोटासरा, दिनेश श्रीमाली और सीपी जोशी का भंवरसंगठन सृजन के दौरान प्रदेशाध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा ने भी अध्यक्ष पद पर फतहसिंह राठौड़ का पक्ष लेना भी संयोग रहा। चर्चा रही कि दावेदार दिनेश श्रीमाली का झुकाव सीपी जोशी की ओर था। पायलट साहब के जन्मदिन पर सांवलियाजी में दिनेशजी की उपस्थिति भी खूब चर्चित रही। सीपी जोशी का श्रीमाली के नाम पर जोर नहीं लगाना भी चर्च में रहा और बात बनते—बनते रह गई। इसके अलावा दिल्ली में ओबीसी कोटा वाली बात के भी खूब चर्चे रहे। दावेदार पंकज शर्मा के लिए हमेशा कहा जाता है कि पार्टी से उन्हें वो सब कभी नहीं मिला जिसके वे हकदार थे, इस बार भी आखिर कैसे चूक गए। चर्चा तो उनकी भी जोरों पर थी। मगर बताया गया कि सब नावों की सवारी के चक्कर में उनकी नैया पार न हो सके। पंकज जी सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखते हैं का परसेप्शन उनके लिए ही घातक साबित हुआ। और कांग्रेस के हाथ में पंकज खिलने से रह गया।पवन खेड़ा की गणित में मोहरे और प्यादेसंगठन सृजन के बाद वोट चोर गद्दी छोड़ रैली में पवन खेडा की मौजूदगी ने बता दिया कि बाहरी पवन राजनीति के उदयपुर के क्लाइमेट पर दूरगामी असर डालने वाली है। अंदरखाने चर्चा रही कि अब राहुल गांधी के निर्देश बस आने ही वाले हैं कि वर्तमान जिलाध्यक्ष आगामी चुनाव में प्रत्याशी नहीं हो सकेंगे। यह निर्णय वार्ड और विधानसभा स्तर पर टिकट वितरण को भयंकर तरीके से प्रभावित करेगा। ऐसे में पवन जी को कोई अपना जरूर चाहिए था उदयपुर में जो बाद में उनके लिए चुनौती बनकर भविष्य में खड़ा न हो सकेगा। अंदरखाने फूट से बिखराव दिख रहाफतहसिंह राठौड़ मजबूती के साथ कदम बढ़ा रहे हैं। उनके पक्ष में धीरे धीरे कांग्रेस मजबूत भी हो रही है लेकिन हिम युग में मजबूती की खिचड़ी बहुत देर से पक रही है। सीट पर उनका सृजन तो दिख रहा है लेकिन संगठन में उनका सृजन अभी नहीं दिखाई दे रहा। वे अब भी कांग्रेस की एकल धुरी उदयपुर में नहीं हैं। बूथ स्तर पर हालत हद से ज्यादा कमजोर है। सामने भाजपा का मजबूत संगठन, बहु—आयामी सांगठनिक तेवर हैं, उनसे मुकाबले में शहर में कांग्रेस की कहीं मौजूदगी नहीं दिखाई दे रही है। कुछ मुद्दों पर प्रयास हुए हैं लेकिन लंबी लड़ाई और निर्णायक स्तर पर सड़क पर लड़ाई लड़ने वाले कांग्रेस में गिने चुने नाम ही दिखाई दे रहे हैं।दिनेश श्रीमाली के गुट का मूवमेंट लगातार कम हो रहा है क्योंकि सबको पता है कि आने वाले चुनावों में टिकट वितरण में राठौड़ की ही चलने वाली है। तो जो टिकट दिलाने की ताकत रखेगा, जलवा उसी के साथ होगा। ऐसे में श्रीमाली गुट भी खुद को धीरे धीरे हाशिये पर ही रखेगा। पंकज शर्मा का खेमा सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखता है मगर वहां भी यही परेशानी है कि जब टिकट बंट रहे होंगे तब क्या पंकज जी अपने चहेतों को भी टिकट दिलवा सकेंगे। निकाय चुनाव इसकी सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाले हैं। गिरिजा गुट (गोप जी) पिछली अवधि में कोई ठोस नाम या काम नहीं कमा पाया ऐसे में उनकी मौजूदगी अब नोटिस ही नहीं की जा रही है।संगठन की कमजोरियां और मौजूदा स्थितिशहर कांग्रेस में को बूथ स्तर पर संगठन को एकजुट करना चुनौतीपूर्ण काम रहेगा। सेवादल, यूथ कांग्रेस और अन्य प्रकोष्ठ इतने कमजोर हैं कि उनका रूतबा कहीं नहीं दिखाई देता। सच तो यह है उदयपुर शहर के अधिकांश कांग्रेसी नेता रील लाइफ में शानदार हैं, मगर रियल में उतरने में पूरी तरह से असफलता। जबकि वक्त की मांग जमीन पर पांवों में छाले पड़ जाने तक का अभ्यास करने व पसीना पसीना हो जाने की है।महासचिव स्तर पर जो खींचतान जारी है वो जग जाहिर है। फतहसिंह जी की कोर टीम में भी तालमेल की कमी संगठनिक स्थिरता के उचित नहीं कही जा रही है।चुनावी दृष्टिकोण और भविष्य की रणनीतिउदयपुर शहर कांग्रेस की स्थिति स्पष्ट है। बूथ और वार्ड स्तर पर कमजोर संगठन और कार्यकर्ताओं में मोटिवेशन की कमी ने पार्टी को पहले से कमजोर स्थिति में पोजीशन कर रखा है। आगामी निकायों से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अगर कोई शोलों सी आंच नहीं आई तो फिर विफलताओं के सिलसिले लंबे चलते रही रहेंगे। नए साल में जिलाध्यक्ष को सबको साथ लेकर चलना होगा, उनको भी जिनको वे पसंद नहीं करते हैं या वे भी जो उन्हें पसंद नहीं करते। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... 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