24 News Update उदयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने डिस्कॉम चेयरमैन आरती डोगरा (आईएएस) के खिलाफ भ्रष्टाचार की आशंका को गंभीर मानते हुए एसीबी जांच के आदेश दिए हैं। जस्टिस रवि चिरानिया की एकलपीठ ने यह आदेश याचिकाकर्ता आर.के. मीणा की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किए। अदालत ने स्पष्ट कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि चेयरमैन ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया और जानबूझकर निर्णय लंबित रखा, जिससे भ्रष्टाचार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) को तीन माह में जांच पूरी कर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच पूरी होने के बावजूद महीनों तक अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। जबकि डिस्कॉम में डीपीसी चेयरमैन और अनुशासनात्मक प्राधिकारी दोनों की भूमिका स्वयं सीएमडी निभाती हैं। ऐसे में निर्णय लंबित रखना न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि इससे याचिकाकर्ता के प्रमोशन अधिकार भी प्रभावित हुए।
याचिकाकर्ता का आरोप
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अजातशत्रु मीणा व मोविल जीनवाल ने कोर्ट को बताया कि वर्ष 2022-23 की डीपीसी में रोस्टर नियमों की अनदेखी की गई। इसी के खिलाफ दिसंबर 2023 में रिट याचिका दायर की गई थी। आरोप है कि याचिका दाखिल करने के बाद प्रताड़ना स्वरूप याचिकाकर्ता को अलग-अलग आधारों पर तीन चार्जशीट थमा दी गईं, जिससे उन्हें एक्सईएन से सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर पद पर पदोन्नति से वंचित रखा गया।
चार्जशीट और प्रमोशन विवाद
कोर्ट ने पाया कि डीपीसी से करीब 20 दिन पहले चार्जशीट जारी की गई, जिससे प्रमोशन प्रक्रिया प्रभावित हुई। इसके बाद जांच पूरी होने के बावजूद अंतिम आदेश नहीं दिया गया, जिससे याचिकाकर्ता आगामी डीपीसी में भी प्रमोशन नहीं पा सके। अदालत ने इसे संदिग्ध मानते हुए कहा कि यह स्थिति भ्रष्टाचार की ओर संकेत करती है।
रोस्टर पर भी उठे सवाल
मामले में रोस्टर संधारण को लेकर भी अदालत ने नाराजगी जताई। कोर्ट ने सीएमडी को शपथपत्र के साथ रोस्टर रजिस्टर पेश करने के निर्देश दिए थे, लेकिन सुनवाई के दौरान केवल सारणीबद्ध डेटा प्रस्तुत किया गया। इस पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सीएमडी अपने दायित्वों के निर्वहन में विफल रही हैं।
अब आगे क्या
कोर्ट के आदेश के बाद अब एसीबी पूरे मामले की जांच करेगी—जिसमें चार्जशीट जारी करने, जांच लंबित रखने और डीपीसी प्रक्रिया में संभावित अनियमितताओं की जांच शामिल होगी। तीन माह के भीतर रिपोर्ट अदालत में पेश की जाएगी, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।

