कृषि संकट और तनाव पर पांच दिवसीय कार्यशाला शुरू, 12 राज्यों के अधिकारी ले रहे भाग 24 News Update उदयपुर। दूरस्थ गांवों और कस्बों तक कृषि संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचाने के उद्देश्य से ‘कृषि में संकट और तनाव’ विषय पर पांच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला गुरुवार को प्रसार शिक्षा निदेशालय सभागार में आरंभ हुई, जिसमें बारह राज्यों से 30 आकाशवाणी और दूरदर्शन के अधिकारी भाग ले रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर), कृषि तकनीकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी) जोन द्वितीय, जोधपुर और राष्ट्रीय प्रसारण एवं मल्टीमीडिया प्रसार भारती (एनएबीएम), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में इस कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसकी मेजबानी प्रसार शिक्षा निदेशालय, एमपीयूएटी द्वारा की जा रही है। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि कुलपति डॉ. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है और यह राष्ट्रीय आय एवं रोजगार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि 1950 में भारत का खाद्यान्न उत्पादन मात्र 50 मिलियन टन था, जो 2023-24 में बढ़कर 137.8 मिलियन टन चावल और 113.3 मिलियन टन गेहूं तक पहुंच गया। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों की सीमित उपलब्धता के कारण कृषि क्षेत्र के सतत विकास को बनाए रखना आवश्यक है। डॉ. कर्नाटक ने कहा कि बीते दशकों में विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों के विकास के साथ कृषि क्षेत्र का योगदान घटा है। भारत में कृषि संकट लंबे समय से किसानों को प्रभावित कर रहा है। जलवायु परिवर्तन, बाजार में अस्थिरता और मूल्य उतार-चढ़ाव जैसी समस्याओं के कारण कई किसानों को आत्महत्या तक करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। उन्होंने कहा कि किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण और कल्याण के लिए ठोस नीतियों की आवश्यकता है। उन्होंने कृषि बुनियादी ढांचे जैसे कि बाजार, कोल्ड स्टोरेज, गोदाम और कृषि प्रसंस्करण सुविधाओं के विकास पर जोर दिया। इसके अलावा, डिजिटल कृषि मिशन, सतत कृषि मिशन, प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन और बीज एवं रोपण सामग्री पर उप-मिशन की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसी प्रसारण सेवाओं को किसानों की जरूरतों को समझकर कार्यक्रम तैयार करने चाहिए, ताकि वे सही जानकारी प्राप्त कर सकें। प्रसार भारती की अतिरिक्त महानिदेशक अनुराधा अग्रवाल ने कहा कि प्रचार-प्रसार की कमी के कारण किसान सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते। उन्होंने बताया कि प्रसार भारती से जुड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे इन योजनाओं की जानकारी किसानों तक पहुंचाएं। कृषि प्रसारण से युवाओं और महिलाओं को भी लाभ मिलेगा और वे कृषि क्षेत्र से अधिक जुड़ पाएंगे। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम तैयार करने की जरूरत है, जिससे किसानों को वास्तविक लाभ मिल सके। अटारी जोधपुर के निदेशक डॉ. जे.पी. मिश्रा ने कहा कि वर्तमान में देश में 731 कृषि विज्ञान केंद्र कार्यरत हैं और रेडियो-दूरदर्शन पर कई कृषक हितैषी कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं, लेकिन किसानों की वास्तविक समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। उन्होंने कहा कि छोटे और सीमांत किसानों को उत्पादन, कीमतों, आय और रोजगार की चुनौतियों से उबरने में मदद करनी होगी। एनएबीएम, नई दिल्ली के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. उमाशंकर सिंह ने कहा कि आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों को तार्किक और शोधपरक बनाया जाना चाहिए, ताकि किसानों को सही जानकारी मिले। उन्होंने कृषि विभाग के जिला स्तरीय अधिकारियों को नवीनतम तकनीकों से अवगत कराने की आवश्यकता पर बल दिया। इस कार्यशाला में वरिष्ठ अधिकारी परिषद के सदस्य डॉ. अरविंद वर्मा, डॉ. आर.बी. दुबे, डॉ. सुनील जोशी, डॉ. वी. नेपालिया, डॉ. एस.के. इन्टोदिया और डॉ. राजीव बैराठी उपस्थित रहे। कार्यशाला के आरंभ में निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. आर.एल. सोनी ने सभी आगंतुकों का स्वागत किया। कार्यशाला का संचालन प्रो. लतिका व्यास ने किया। जलवायु परिवर्तन और बाजार की अनिश्चितता से प्रभावित किसानों के लिए मदद जरूरी: कर्नाटक बारह राज्यों के अधिकारी ले रहे भाग उदयपुर, 27 फरवरी। दूरस्थ गांवों और कस्बों तक कृषि संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचाने के उद्देश्य से ‘कृषि में संकट और तनाव’ विषय पर पांच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला गुरुवार को प्रसार शिक्षा निदेशालय सभागार में आरंभ हुई, जिसमें बारह राज्यों से 30 आकाशवाणी और दूरदर्शन के अधिकारी भाग ले रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर), कृषि तकनीकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी) जोन द्वितीय, जोधपुर और राष्ट्रीय प्रसारण एवं मल्टीमीडिया प्रसार भारती (एनएबीएम), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में इस कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसकी मेजबानी प्रसार शिक्षा निदेशालय, एमपीयूएटी द्वारा की जा रही है। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि कुलपति डॉ. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है और यह राष्ट्रीय आय एवं रोजगार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि 1950 में भारत का खाद्यान्न उत्पादन मात्र 50 मिलियन टन था, जो 2023-24 में बढ़कर 137.8 मिलियन टन चावल और 113.3 मिलियन टन गेहूं तक पहुंच गया। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों की सीमित उपलब्धता के कारण कृषि क्षेत्र के सतत विकास को बनाए रखना आवश्यक है। डॉ. कर्नाटक ने कहा कि बीते दशकों में विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों के विकास के साथ कृषि क्षेत्र का योगदान घटा है। भारत में कृषि संकट लंबे समय से किसानों को प्रभावित कर रहा है। जलवायु परिवर्तन, बाजार में अस्थिरता और मूल्य उतार-चढ़ाव जैसी समस्याओं के कारण कई किसानों को आत्महत्या तक करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। उन्होंने कहा कि किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण और कल्याण के लिए ठोस नीतियों की आवश्यकता है। उन्होंने कृषि बुनियादी ढांचे जैसे कि बाजार, कोल्ड स्टोरेज, गोदाम और कृषि प्रसंस्करण सुविधाओं के विकास पर जोर दिया। इसके अलावा, डिजिटल कृषि मिशन, सतत कृषि मिशन, प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन और बीज एवं रोपण सामग्री पर उप-मिशन की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसी प्रसारण सेवाओं को किसानों की जरूरतों को समझकर कार्यक्रम तैयार करने चाहिए, ताकि वे सही जानकारी प्राप्त कर सकें। प्रसार भारती की अतिरिक्त महानिदेशक अनुराधा अग्रवाल ने कहा कि प्रचार-प्रसार की कमी के कारण किसान सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते। उन्होंने बताया कि प्रसार भारती से जुड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे इन योजनाओं की जानकारी किसानों तक पहुंचाएं। कृषि प्रसारण से युवाओं और महिलाओं को भी लाभ मिलेगा और वे कृषि क्षेत्र से अधिक जुड़ पाएंगे। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम तैयार करने की जरूरत है, जिससे किसानों को वास्तविक लाभ मिल सके। अटारी जोधपुर के निदेशक डॉ. जे.पी. मिश्रा ने कहा कि वर्तमान में देश में 731 कृषि विज्ञान केंद्र कार्यरत हैं और रेडियो-दूरदर्शन पर कई कृषक हितैषी कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं, लेकिन किसानों की वास्तविक समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। उन्होंने कहा कि छोटे और सीमांत किसानों को उत्पादन, कीमतों, आय और रोजगार की चुनौतियों से उबरने में मदद करनी होगी। एनएबीएम, नई दिल्ली के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. उमाशंकर सिंह ने कहा कि आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों को तार्किक और शोधपरक बनाया जाना चाहिए, ताकि किसानों को सही जानकारी मिले। उन्होंने कृषि विभाग के जिला स्तरीय अधिकारियों को नवीनतम तकनीकों से अवगत कराने की आवश्यकता पर बल दिया। इस कार्यशाला में वरिष्ठ अधिकारी परिषद के सदस्य डॉ. अरविंद वर्मा, डॉ. आर.बी. दुबे, डॉ. सुनील जोशी, डॉ. वी. नेपालिया, डॉ. एस.के. इन्टोदिया और डॉ. राजीव बैराठी उपस्थित रहे। कार्यशाला के आरंभ में निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. आर.एल. सोनी ने सभी आगंतुकों का स्वागत किया। कार्यशाला का संचालन प्रो. लतिका व्यास ने किया। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new 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