24 News Update उदयपुर। रिश्तों की डोर जहाँ टूट जाती है, वहाँ सेवा और संस्कार की नई इबारत मेवाड़ प्रताप दल सेवा संस्थान लिख रहा है। अशोक नगर स्थित सार्वजनिक गौशाला एवं श्मशान स्थल पर पिछले एक साल से अपनों की राह देख रही 158 अस्थियों को संस्थान के कार्यकर्ताओं ने अपना माना है। इन अस्थियों के विसर्जन हेतु गुरुवार को संस्थान का ‘प्रताप दल’ गाजे-बाजे और भगवा ध्वज के साथ हरिद्वार के लिए रवाना हुआ। संस्थान के कार्यकर्ता अब ‘परिवार’ बनकर गंगा की लहरों में इन आत्माओं की शांति के लिए तर्पण और अस्थि विसर्जन का शास्त्रोक्त विधान संपन्न करेंगे।
26 वर्षों से अनवरत जारी है संस्कारों का संरक्षण
संस्थान के जिला सचिव राकेश पालीवाल ने बताया कि यह सेवा कार्य पिछले 26 वर्षों से निरंतर जारी है। अशोक नगर गौशाला में एकत्रित इन अस्थियों के परिजनों से संपर्क करने के लिए समाचार पत्रों में सूचनाएं दी गई थीं और गौशाला परिसर में बैनर भी लगाए गए थे, लेकिन जब किसी ने सुध नहीं ली, तो संस्थान ने इस ‘पुण्य कार्य’ का उत्तरदायित्व संभाला। कार्यक्रम के दौरान शहर विधायक ताराचंद जैन और इंटक प्रदेश अध्यक्ष जगदीशराज श्रीमाली ने जत्थे को भगवा ध्वज दिखाकर रवाना किया।
अतिथियों ने सराहा: ‘हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण संस्कार’
मुख्य अतिथि ताराचंद जैन ने संस्थान के इस सेवाभावी कार्य की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि लावारिस अस्थियों को सम्मानजनक विसर्जन प्रदान करना मानवता की सबसे बड़ी सेवा है। वहीं, जगदीशराज श्रीमाली ने इसे हिंदू धर्म का एक अनिवार्य और महत्वपूर्ण संस्कार बताया। उन्होंने कहा कि 26 वर्षों का यह संकल्प समाज के लिए एक प्रेरणा है।
सेवा के इस सफर में शामिल रहे सहभागी
दो बसों में सवार होकर हरिद्वार के लिए प्रस्थान करने वाले 120 महिला-पुरुषों के इस जत्थे में समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी रही। संस्थान के पदाधिकारियों में संस्थापक लाला सालवी, जिला अध्यक्ष ओंकार जोशी, जिला सचिव राकेश पालीवाल, महिला अध्यक्ष मंजु गहलोत। मोहन सालवी, समाजसेवी गोपाल सालवी, धर्मोत्सव समिति अध्यक्ष दिनेश मकवाना। कार्यकर्ता एवं सदस्यों में शेरसिंह राठौड़, सुनील अहीर, बलवंत सालवी, नरेंद्र मनौती, खुशलेंद कुमावत, शैलेन्द्र घावरी और सुरेन्द्र सोनी सहित बड़ी संख्या में सेवाभावी नागरिक।
अपनों ने छोड़ा साथ, ‘प्रताप दल’ बना परिवार: 158 लोगों की अस्थियों को लेकर हरिद्वार रवाना हुआ जत्था

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