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राजस्थान फायरमैन भर्ती-2021 में सामने आए फर्जीवाड़े ने न केवल अभ्यर्थियों की नीयत पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सिस्टम की नाकामी और मिलीभगत को भी उजागर कर दिया है। चित्तौड़गढ़ की मेवाड़ यूनिवर्सिटी जैसे कई संस्थानों से जारी फर्जी डिप्लोमा और डिग्री ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ये संस्थान शिक्षा के नाम पर केवल ‘सर्टिफिकेट दुकान’ बन चुके हैं?
1. सर्टिफिकेट की दुकानों में बदली यूनिवर्सिटियाँ
जांच में पाया गया कि जिन अभ्यर्थियों के दस्तावेज फर्जी निकले, उनमें से अधिकांश ने निम्न यूनिवर्सिटियों से डिग्री ली थी:
- चित्तौड़गढ़ की मेवाड़ यूनिवर्सिटी
- झुंझुनूं की सिंघानिया और श्रीधर यूनिवर्सिटी
- अलवर की सनराइज यूनिवर्सिटी
- जयपुर की महाराजा विनायक ग्लोबल यूनिवर्सिटी
- सिरोही की माधव यूनिवर्सिटी
- इनमें से कई संस्थानों के पास फायरमैन डिप्लोमा कोर्स चलाने की मान्यता ही नहीं थी, जबकि कुछ इंस्टीट्यूट तो मौके पर बंद पाए गए। कुछ खुले मिले, लेकिन उनके पास छात्रों की उपस्थिति या डिग्री जारी करने का कोई रिकॉर्ड नहीं था।
2. डॉक्युमेंट वेरिफिकेशन में हुआ खेल: सवाल कौन पूछेगा?
51 अभ्यर्थियों ने अपने आवेदन में डिप्लोमा/डिग्री से संबंधित जरूरी कॉलम खाली छोड़ा, बावजूद इसके उनके फॉर्म रिजेक्ट नहीं किए गए।
नियम के अनुसार, यदि आवेदन अधूरा है तो उसे स्वीकृत नहीं किया जा सकता। फिर ये सभी एग्जाम में कैसे बैठे? सिलेक्शन कैसे हुआ? और डॉक्युमेंट वेरिफिकेशन कैसे पास किया?
क्या यह सब बिना अंदरूनी सेटिंग के संभव था?
3. हाइट में गड़बड़ी: माप तो हुआ, लेकिन गड़बड़ी भी छिपाई गई
प्रियांशु गुलपाडिया, जिसकी हाइट नियम अनुसार 165 सेमी होनी चाहिए थी, सिर्फ 161 सेमी के साथ पास हो गया। बाद में जांच में पता चला कि फिजिकल में जानबूझकर हाइट बढ़ाकर दर्ज की गई।
क्या ये गलती मात्र थी, या जानबूझकर की गई सेटिंग?
4. एक्स-सर्विसमैन के नाम पर फर्जी डिप्लोमा
74 पद भूतपूर्व सैनिकों के लिए आरक्षित थे, जिनमें से 150 से ज्यादा अभ्यर्थियों ने सेवा के दौरान फायरमैन डिप्लोमा दिखाया।
- सेना में छह महीने का कोर्स करने की अनुमति नहीं होती, फिर ये डिप्लोमा कैसे बने?
- सभी के पास “कोर्स परमिशन” का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
क्या ये यूनिवर्सिटियाँ सेवा में रहते हुए भी कोर्स “घर बैठे” करवा देती थीं?
5. खेल कोटे में भी गड़बड़ी
भर्ती में दो प्रतिशत खेल कोटा था। जांच में खुलासा हुआ कि कई अभ्यर्थियों ने फर्जी खेल प्रमाण पत्र लगा कर “उत्कृष्ट खिलाड़ी” के रूप में भर्ती पाई।
- अधिकांश प्रमाण पत्र वुशू, ताइक्वांडो जैसे खेलों के थे, जिनकी एसोसिएशन को मान्यता तक नहीं थी।
- कई टूर्नामेंट ही नकली थे, जिनके कोई रिकॉर्ड नहीं मिले।
6. जॉइनिंग में मिलीभगत: पिता बना ‘भर्ती अधिकारी’
एक केस में फायर ऑफिसर पिता ने अपनी बेटी की भर्ती में मदद की। आरोप है कि फिजिकल में अयोग्य होने के बावजूद उसे पास कराया गया।
यह दर्शाता है कि भर्ती के अंदरूनी अधिकारियों की पारिवारिक मिलीभगत तक इस घोटाले में शामिल है।
7. डीएलबी की दोबारा जांच: लेकिन क्या देर हो चुकी है?
अब स्वायत्त शासन विभाग (D.L.B.) द्वारा फिर से जांच की जा रही है।
- 18 पॉइंट्स के आधार पर संस्थानों से जानकारी मांगी गई है।
- जिनके संस्थान अवैध या बंद हैं, उनके डिग्री धारकों की नियुक्ति रद्द हो सकती है।
- खाली पदों को भरने के लिए दोगुनी संख्या में अभ्यर्थियों को शॉर्टलिस्ट किया जाएगा।
8. सिस्टम की असली नाकामी: कोई जवाबदेह नहीं
अब तक 156 अभ्यर्थियों की भर्ती रद्द की जा चुकी है, जबकि 450 अभी भी रडार पर हैं। लेकिन इस पूरे फर्जीवाड़े के नियंत्रक और ज़िम्मेदार अधिकारी अब तक बचते नजर आ रहे हैं।
न यूनिवर्सिटी के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही,
न वेरिफिकेशन अधिकारियों की जवाबदेही तय,
न चयन बोर्ड की जवाबदेही।
फिर कैसे रुकेंगे ऐसे घोटाले?
भर्ती का नहीं, भरोसे का संकट है यह
फायरमैन जैसे जन सुरक्षा से जुड़े पदों पर यदि फर्जी अभ्यर्थी पहुंच जाएंगे तो आम जनता की सुरक्षा के लिए यह अलार्मिंग सिचुएशन है। यह सिर्फ एक भर्ती नहीं, पूरे सरकारी भर्ती सिस्टम की सड़ांध है। अब सवाल केवल यही नहीं है कि किसकी मिलीभगत थी, बल्कि यह भी है कि अब तक उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

