24 News Update नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सोमवार को उत्तर प्रदेश पुलिस की एफआईआर लेखन शैली पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि हाल के दिनों में दर्ज की जा रही कई एफआईआर “हकीकत से ज्यादा फिल्मी पटकथा” प्रतीत होती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून का दस्तावेज अगर “मूवी स्क्रिप्ट” जैसा लगे, तो यह आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने कहा, “इस कोर्ट ने बार-बार कहा है कि एफआईआर में इस्तेमाल की जा रही भाषा असलियत को नहीं दर्शाती, बल्कि सुनी-सुनाई, स्क्रिप्टेड और मनगढ़ंत लगती है। यह मूवी स्क्रिप्ट से काफी हद तक उधार ली गई प्रतीत होती है और बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है।”

मामला क्या है?
बेंच अकबर अली की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में भारतीय न्याय संहिता (BNS), आर्म्स एक्ट और उत्तर प्रदेश गो-वध निवारण कानून की धाराओं के तहत दर्ज हत्या के प्रयास की एफआईआर को चुनौती दी गई थी।
एफआईआर के अनुसार, पुलिस को एक “मुखबीर खास” से सूचना मिली कि गोवंश का वध कर मांस ठिकाने लगाने की तैयारी की जा रही है। कथित घटना का समय 22 जनवरी 2026 को सुबह 10:45 बजे बताया गया, जबकि एफआईआर उसी दिन दोपहर 2:24 बजे दर्ज की गई।

“उजाला होने वाला है” — 10:45 बजे सुबह?
कोर्ट को सबसे पहले समय-संबंधी विरोधाभास चौंकाने वाला लगा। दिन के उजाले में 10:45 बजे की घटना का उल्लेख करते हुए एफआईआर में लिखा गया कि मौके पर पहुंचने पर आवाज आई—“उजाला होने वाला है।”

बेंच ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी की:
“घटना 10:45 बजे की बताई जा रही है और स्पष्ट है कि उस समय दिन निकल चुका होता है। तो यह समझ से परे है कि 10:45 बजे भी सुबह कैसे नहीं हुई?”

फिल्मी संवादों की भरमार
एफआईआर में दर्ज संवादों पर भी कोर्ट ने गंभीर आपत्ति जताई। पुलिस के अनुसार उन्होंने चिल्लाकर कहा—“तुम लोग पुलिस से घिर चुके हो, आत्मसमर्पण कर दो।” जवाब में आरोपियों ने कथित तौर पर कहा—“ये पुलिस वाले हैं, इनको गोली मारो, बचकर नहीं जाना चाहिए।”
इसके बाद गोली चलने, एक आरोपी के “हाय गोली लग गई” चिल्लाने, तीन के पकड़े जाने और चौथे के फरार होने का विवरण दिया गया। कोर्ट ने कहा कि यह पूरा घटनाक्रम “सिनेमा की पटकथा” जैसा प्रतीत होता है।

“अब समय आ गया है कोर्ट हस्तक्षेप करे”
खंडपीठ ने सख्त शब्दों में कहा: “अब समय आ गया है कि कोर्ट अधिकारियों द्वारा दर्ज की जा रही मनगढ़ंत और बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई एफआईआर पर रोक लगाए। यह मामला उसका स्पष्ट उदाहरण है।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले State of Haryana v. Bhajan Lal का हवाला देते हुए कहा कि यदि एफआईआर के आरोप इतने बेतुके और स्वाभाविक रूप से असंभव हों कि कोई भी समझदार व्यक्ति उन्हें सत्य न माने, तो हाईकोर्ट आर्टिकल 226 के तहत आपराधिक कार्रवाई रद्द कर सकता है।

एसपी से मांगा व्यक्तिगत हलफनामा
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने बहराइच जिले के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे दो सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दायर कर इन स्पष्ट विसंगतियों पर स्पष्टीकरण दें। यदि हलफनामा दाखिल नहीं किया जाता है तो एसपी को अगली तारीख पर स्वयं रिकॉर्ड सहित उपस्थित होना होगा। मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च के लिए निर्धारित की गई है। तब तक याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर के आधार पर किसी भी प्रकार की ज़बरदस्ती कार्रवाई पर रोक लगा दी गई है।


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