24 News Update उदयपुर। यूनाइटेड फेडरेशन ऑफ मिनरल प्रोड्यूसर्स द्वारा अरावली हिल्स एवं रेंज से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों, संतुलित विकास, पर्यावरण संरक्षण तथा वैज्ञानिक एवं वैधानिक खनन को बढ़ावा देने के सन्दर्भ में कहा कि आज भी अरावली का बहुत बड़ा हिस्सा सुरक्षित है। अरावली के मात्र 1 प्रतिशत हिस्से पर ही खनन हो रहा है और वह हिस्सा भी देश की प्रगति,जीडीपी ग्रोथ,रोजगार में सहायक बना हुआ है। उसके बावजूद खनन को देशभर में टारगेट किया जा रहा है।यूनाइटेड फेडरेशन ऑफ मिनरल प्रोड्यूसर्स के जुड़े खनन उद्यमियों एवं पदाधिकारियों संरक्षक अरविंद सिंघल, मुख्य सलाहकार जे.पी. अग्रवाल, हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड, के पूर्व सीईओ अखिलेश जोशी,अध्यक्ष गुरप्रीतसिंह सोनी, सचिव डाॅ. हितांशु कौशल, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट केजर अली कुराबड़वाला ने आज आयोजित एक प्रेस वार्ता में कहा कि संगठन का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि देश में अवैध खनन गतिवधियंा, पहाड़ियों को चीर कर बनाये गये अवैध रिसोर्ट,अवैध होटल निर्माण की गतिविधियंा बंद होनी चाहिये। अवैध खनन की आड़ मंें वैध खनन को टारगेट किया जा रहा है। संगठन का मुख्य उद्देश्य कानून सम्मत, वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय रूप से उत्तरदायी खनन को बढ़ावा देना है ताकि वैध खनन गतिविधियां जारी रह सकें और साथ ही पर्यावरण संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन एवं आर्थिक हितों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।अध्यक्ष गुरप्रीतसिंह सोनी ने सर्वोच्च न्यायालय के 20 नवंबर 2025 के निर्णय का उल्लेख किया, जिसमें कानून के अनुरूप वर्तमान खनन गतिविधियों को जारी रखने की अनुमति दी गई थी, परंतु 29 दिसंबर 2025 के आदेश द्वारा उक्त निर्णय को स्थगित किए जाने से खनन क्षेत्र में पुनः अनिश्चितता उत्पन्न हो गई है। 21 जनवरी 2026 की सुनवाई के बाद भी पट्टों के नवीनीकरण एवं विस्तार को लेकर स्पष्टता का अभाव उद्योग, रोजगार एवं राज्य राजस्व के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।सोनी ने बताया कि राजस्थान भारत के सर्वाधिक खनिज संपन्न राज्यों में से एक है, जहां 58 प्रकार को खनिजों का उत्पादन होता है, जबकि राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का मात्र 0.68ः क्षेत्र ही खनन के अंतर्गत है। राजस्थान सीसा, जिंक, वोलास्टोनाइट, सेलेनाइट, कैल्साइट, सोप्स्टोन, डोलमाइट, मार्बल, ग्रैनाइट एवं जिप्सम जैसे खनिजों का प्रमुख उत्पादक है तथा तांबा, चांदी, लिग्नाइट, चूना पत्थर एवं आयरन ओर का प्रमुख उत्पादक भी है। इसके अतिरिक्त सोना, पोटाश, रेयर अर्थ एलिमेंट्स, टंगस्टन एवं लिथियम जैसे रणनीतिक एवं महत्वपूर्ण खनिजों की भी व्यापक संभावनाएं हैं, जो भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।संगठन ने कहा कि अरावली क्षेत्र के संदर्भ में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 20 जिलों का कुल क्षेत्रफल 1,29,766 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें खनन गतिविधियां मात्र 1306.18 वर्ग किलोमीटर, अर्थात लगभग 1.007 प्रतिशत क्षेत्र तक सीमित हैं, जबकि लगभग 99 प्रतिशत क्षेत्र खनन से अप्रभावित है। इसके बावजूद आर्थिक योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्ष 2024-25 में कुल 9,228.21 करोड़ रूपयें का राजस्व (जिसमें रॉयल्टी,डीएमएफटी विभिन्न कर एवं अन्य राजस्व शामिल हैं) प्राप्त हुआ, जिसमें से 6,494.68 करोड़ रूपयें (70.38 प्रतिशत) अरावली क्षेत्र से आये। इसी प्रकार वर्ष 2025-26 में दिसंबर तक कुल 6,857.01 करोड़ का राजस्व (रॉयल्टी,डीएमएफटी एवं अन्य कर सहित) प्राप्त हुआ, जिसमें से 4,809.50 करोड़ रूपयें (70.14 प्रतिशत) अरावली क्षेत्र से प्राप्त हुआ। खनन क्षेत्र ने वर्ष 2023-24 में राजस्थान की जीडीपी में लगभग 3.4 प्रतिशत योगदान दिया तथा वर्तमान में लगभग 35 लाख लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान कर रहा है, जो भविष्य में और बढ़ने की संभावना है।संगठन ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक उद्देश्य हैं। वैज्ञानिक खनन, पुनर्वनीकरण, खदान पुनर्वास, आधुनिक तकनीक एवं नियामकीय अनुपालन के माध्यम से पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हुए सतत विकास संभव है। संगठन ने सुझाव दिया कि वर्तमान 1.007 प्रतिशत खनन क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए अरावली क्षेत्र में अधिकतम 4 प्रतिशत क्षेत्र तक सीमित, नियंत्रित एवं वैज्ञानिक खनन की अनुमति दी जाए ताकि रोजगार, राज्य राजस्व, औद्योगिक उत्पादन और एमएसएमई इकाइयों की निरंतरता बनी रहे, साथ ही पर्यावरणीय संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके।संगठन ने स्पष्ट किया कि राजस्थान के समग्र विकास, औद्योगिक प्रगति, रोजगार सृजन एवं राष्ट्रीय खनिज सुरक्षा के लिए संतुलित एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण अत्यंत आवश्यक है। संगठन ने कहा कि अरावली क्षेत्र में तथ्यपरक, डेटा-आधारित और संतुलित नीति बनाकर पर्यावरण संरक्षण और सतत खनन विकास दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है, जिससे राज्य और राष्ट्र दोनों को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।प्रेस कॉन्फ्रेंस का संचालन सचिव डॉ. हितांशु कौशल द्वारा किया गया। वक्ताओं ने कहा कि खनन उद्योग राजस्थान की आर्थिक रीढ़ है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि राजस्थान में ऐसे कई खनिज हैं जो विश्व स्तर पर अत्यंत दुर्लभ हैं तथा खनिज भूगोल आधारित संसाधन हैं, जिन्हें किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। इसलिए नीतियां वैज्ञानिक तथ्यों, भूवैज्ञानिक वास्तविकताओं तथा क्षेत्र-विशिष्ट आकलन के आधार पर बननी चाहिए, क्योंकि खनिज केवल खनिजीकृत क्षेत्रों तक सीमित होते हैं और एक समान मापदंड सभी क्षेत्रों पर लागू नहीं किया जा सकता। इस अवसर पर महेश मंत्री, हरीश अरोड़ा, सौरभ महेश मंत्री, गौरव राठौड़, श्याम सिंह, अर्जुन जैन, राम उपाध्याय, सुरेन्द्र सिंह राजपुरोहित, नानालाल सारदुल सहित विभिन्न जिलों एवं अलग-अलग खनन एवं औद्योगिक संगठनों के सदस्य मौजूद थे। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend 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