उदयपुर। आप तो जानते ही होंगे कि आजकल के नेता, जन प्रतिनिधि ओर अफसर किस तरह से सिस्टम पर राज कर रहे हैं। जब तक उनका मतलब सधता है, तब तक वे ऐसा शो आफ करते हैं जैसे वे ही तारणहार हो, मगर मतलब के निकलते ही मुंह मोड़ लेते हैं। टरकाने लगते हैं और ज्यादा जोर डालो तो आंख तक दिखाने लग जाते हैं। इस मामले में भी अब सिस्टम फिरकी लेने लगा है, असली रंग दिखाने लगा है। यहां बात हो रही है देवराज हत्याकांड की। डेढ़ साल गुजर गए मगर अब तक उसके पिता को ना न्याय मिला है, ना 51 लाख का पूरा मुआवजा। गला फाड़ कर आक्रोश जताने वाले नेता, आग लगाने वाले नारों से जोश जगाने वाले नेता और धार्मिक राजनीतिक के दम पर अपना कद बढाने वाले नेता इस मामले से पूरी तरह से हाथ खींच चुके हैं। मुआवजा दिलाना तो दूर, अब कोई पूछने तक नहीं आ रहा है कि मामले में हुआ क्या??? अब तक देवराज के पिता को 31 लाख ही मिले हैं, बाकी के 20 लाख कौन देगा?? इसका जवाब ना विधायक के पास है, ना कलेक्टर के पास। अब दोनों मिलकर मामले को फुटबॉल बनाने में लगे हैं। देवराज के पिता कहते हैं कि लंबे समय से पैसा नहीं आया,आगे की उम्मीद भी अब धुंधली होती जा रही है।
आपको बता दें कि उस सुबह उदयपुर में 10वीं का छात्र देवराज स्कूल गया था लौटकर कभी घर नहीं आया। चाकू के वार, अस्पताल के बेड, बाहर प्रदर्शन, बहन की अधूरी राखी और फिर एक शहर का उबलता आक्रोश सबने देखा। उस दिन प्रशासन हरकत में था, नेता मंच पर थे और कैमरे चालू थे। आज—डेढ़ साल बादन कैमरे हैं, न मंच, न भाषण। बस एक पिता की आस अब भी अधूरी है, पप्पू मोची, जो अब भी 20 लाख रुपये के लिए कलेक्टर, नेताओं और दफ्तरों के चक्कर काट रहा है।
जब मामला हॉट था, तब सब साथ थे
देवराज की मौत के बाद उदयपुर में हालात बिगड़े। नाबालिग आरोपी का घर बुलडोजर से गिरा दिया गया। कई लोगों ने नारेबाजी करते हुए तालियां बजाईं, पथराव हुआ, आगजनी हुई, इंटरनेट बंद हुआ। शहर का तापमान इतना बढ़ाया गया कि इस मामले को कन्हैयालाल हत्याकांड के बाद सबसे बड़ा मामला बनाने में किसी ने कसर नहीं छोड़ी। नेता बारी बारी से झुंड में देवराज के घर पहुंचे। भाषण ऐसे दिए गए, जैसे न्याय अगले दिन तक मिल जाएगा। दिलासे ऐसे दिए कि न्याय का तूफान आने वाला है। पार्षदों ने संकल्प लिया कि एक महीने का वेतन देंगे। प्रशासन ने ऐलान किया—51 लाख मुआवजा, संविदा नौकरी। और फिर… मामला ठंडा पड़ गया। चुनावी कैलेंडर बदला। मुद्दा पुराना हुआ। राजनीतिक रोटियां कहीं और सिकने लगीं। नेताओं को लग गया कि अब इस मामले से वोट नहीं मिलने वाले हैं। आज सच यह है कि 2026 आ गया, लेकिन देवराज के पिता को पूरा मुआवजा अब तक नहीं मिला। 51 लाख के ऐलान में से सिर्फ 31 लाख आए। 20 लाख अब भी फाइलों में फंसे हैं।
मैं क्या करूं? यह मिला सिस्टम का जवाब
पप्पू मोची कहते हैं— कि विधायक ताराचंद जी से मिला तो कहते हैं—मैं क्या करूं। कलेक्टर से बात करने की बात कहते हैं। पांच-छह बार पहले भी गए, कुछ नहीं हुआ। एक-दो दिन में फिर कलेक्टर से मिलेंगे। दोनों मिलकर टरकाने पर तुले हुए हैं। मतलब साफ है कि जिस पिता ने बेटा खोया, उसे अब न्याय नहीं, अपॉइंटमेंट मिल रही है। वेतन देने वाले संकल्प हवा हो गए हैं। शहर के पार्षदों ने जो संकल्प लिया था, वह भी कागजों में ही रह गया। जब 24 न्यूज अपडेट ने बार-बार खुलासा किया, तब जाकर कुछ पार्षदों ने ही वेतन दिया। बाकी ने वही किया, जो अक्सर होता है— चुप्पी साध ली। क्योंकि अब उनमें से कइयों को पता है कि फिर से पार्षद बनने के कोई चांस नहीं है, ऐसे में क्यों गांठ से खर्चा करें।
दाल-रोटी चल रही है मगर इंसाफ नहीं
देवराज के पिता पप्पू मोची ने बताया कि की दुकान सीजन में चल जाती है। अभी बाजार ठंडा है। दाल-रोटी किसी तरह निकल रही है। लेकिन सच में सवाल रोटी का नहीं है। सवाल उस वादे का है, जो मंच से किया गया था।
टाइम-लाइन याद दिलाना जरूरी है
16 अगस्त 2024 — स्कूल में विवाद, चाकूबाजी
17-18 अगस्त — अस्पताल में संघर्ष
19 अगस्त 2024 — रक्षाबंधन के दिन मौत
फरवरी 2026 — डेढ़ साल बाद भी अधूरा मुआवजा
20 लाख के लिए अब किससे लगाएंगे गुहार
जब मामला गरम था, तब हर नेता आगे था। सीना ठोक कर खुद की मार्केटिंग कर रहा था। शो आफ कर रहा था। अब रंगे सियारों के रंग उड़ चुके हैं। नंगापन सामने आ गया है। अब जब मामला ठंडा है, तो पिता अकेला क्यों? देवराज के पिता पप्पू मोची को बकाया 20 लाख रुपये आखिर दिलाएगा कौन? कलेक्टर? विधायक? नेता? या फिर वही मीडिया, जो मुद्दा जिंदा रखे? बुलडोजर जल्दी चलता है, भाषण जल्दी मिलते हैं, लेकिन इंसाफ सबसे आखिर में आता है।

