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10 मिनट में डिलीवरी की रफ्तार पर ब्रेक: सरकार के दखल के बाद स्विगी—जोमेटो ने हटाई समय सीमा

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24 News Update नई दिल्ली। क्विक कॉमर्स सेक्टर में बीते कुछ वर्षों से ग्राहकों को लुभाने का सबसे बड़ा हथियार रहा “10 मिनट में डिलीवरी” अब इतिहास बनने की ओर है। डिलीवरी पार्टनर्स की लगातार बढ़ती शिकायतों, हड़ताल और सड़क सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवालों के बीच सरकार के हस्तक्षेप के बाद ब्लिंकिट, स्विगी इंस्टामार्ट, जोमैटो और जेप्टो जैसी कंपनियों ने अपने विज्ञापनों से समय-सीमा का यह दावा हटाने पर सहमति जता दी है।
यह बदलाव केवल मार्केटिंग तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे क्विक कॉमर्स मॉडल में एक बड़े नीतिगत मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

सरकार का स्पष्ट संदेश: कारोबार जान जोखिम में डालकर नहीं
हाल ही में केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया की अध्यक्षता में हुई अहम बैठक में सरकार ने कंपनियों को साफ संदेश दिया कि कारोबार का विस्तार गिग वर्कर्स की जान जोखिम में डालकर स्वीकार्य नहीं है। बैठक में यह माना गया कि 10–15 मिनट की डिलीवरी समय-सीमा राइडर्स को तेज रफ्तार, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी और जोखिम भरे हालात में काम करने के लिए मजबूर करती है, जिससे आम नागरिकों की सुरक्षा भी प्रभावित होती है।
सरकार ने संकेत दिए हैं कि अब गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा, बीमा, पेंशन और सुरक्षित कार्य परिस्थितियों को लेकर एक व्यापक नीति को सख्ती से लागू किया जाएगा।

ब्रांडिंग बदलेगी, दबाव घटेगा
कंपनियों ने सरकार को भरोसा दिलाया है कि वे आगे चलकर ग्राहकों से “मिनटों में डिलीवरी” जैसा कोई वादा नहीं करेंगी। हालांकि, उनका दावा है कि आंतरिक स्तर पर ऑपरेशनल एफिशिएंसी बनी रहेगी। उद्देश्य यह है कि राइडर्स पर समय का सीधा दबाव न बने और डिलीवरी को सुरक्षित तरीके से पूरा किया जा सके।
अब तक जिस “स्पीड” को ब्रांड पहचान बनाया गया था, उसकी जगह “वैरायटी”, “क्वालिटी” और “भरोसे” जैसे शब्द लेने लगे हैं। कुछ कंपनियां अब 10 मिनट के बजाय अपने प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हजारों उत्पादों और बेहतर कस्टमर एक्सपीरियंस को प्रचारित कर रही हैं।

सोशल मीडिया से संसद तक उठा मुद्दा
पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया, सड़क सुरक्षा संगठनों और श्रमिक मंचों पर क्विक डिलीवरी मॉडल की तीखी आलोचना हो रही थी। संसद में भी गिग वर्कर्स की “पीड़ा और बदहाली” को लेकर सवाल उठे। खराब मौसम, लंबी शिफ्ट और समय-सीमा के दबाव में काम करने से जुड़े जोखिमों को लेकर सरकार पर हस्तक्षेप का दबाव बढ़ता गया।
राइडर्स की कमाई पर नई चुनौती
हालांकि, इस फैसले का दूसरा पहलू भी है। डिलीवरी पार्टनर्स की आय अब तक प्रति ऑर्डर आधारित रही है। समय-सीमा हटने के बाद एक घंटे में पूरे होने वाले ऑर्डर्स की संख्या घट सकती है, जिससे दैनिक कमाई पर असर पड़ने की आशंका है। सरकार और कंपनियों के सामने अब चुनौती यह है कि सुरक्षा बढ़ाने के साथ-साथ आय में स्थिरता कैसे सुनिश्चित की जाए।

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