24 न्यूज अपडेट, उदयपुर । राजस्थान पत्रिका प्राइवेट लिमिटेड द्वारा मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशें लागू करने की मांग करने वाले पत्रकार विजय कुमार शर्मा को नौकरी से निकालना प्रबंधन को भारी पड़ गया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने इस बर्खास्तगी को गैरकानूनी करार देते हुए पत्रकार की सेवा बहाल करने, बकाया वेतन चुकाने और सभी सेवा लाभों सहित पुनर्नियुक्ति का आदेश सुनाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पत्रिका प्रबंधन ने जिस सोशल मीडिया पोस्ट को आधार बनाकर अनुशासनात्मक कार्रवाई की, उसके समर्थन में कोई सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया।पत्रकार को बिना लेबर कोर्ट की पूर्व स्वीकृति के बर्खास्त किया गया था, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 33(2)(इ) का स्पष्ट उल्लंघन है। कोर्ट ने इस बिंदु पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि जब तक लेबर कोर्ट से मंजूरी न मिले, तब तक बर्खास्तगी आदेश अधूरा और कानूनी रूप से अमान्य माना जाएगा। यही नहीं, कोर्ट ने यह भी माना कि प्रबंधन ने यह कार्रवाई मजीठिया वेतनमान की मांग उठाने के बाद प्रतिशोधवश की, जिससे कर्मचारी के मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन हुआ।दरअसल, विजय कुमार शर्मा वर्ष 2002 से पत्रिका में कार्यरत थे और 2011 में उन्हें सब-एडिटर पद पर पदोन्नत किया गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2014 में मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशें लागू करने का निर्देश दिए जाने के बाद उन्होंने और उनके साथियों ने इसके पालन की मांग की। इसी के बाद उनका स्थानांतरण पहले बेंगलुरु, फिर भोपाल और फिर जगदलपुर कर दिया गया, जिसका उन्होंने विरोध करते हुए लेबर कोर्ट में मामला दायर कर दिया।प्रबंधन ने इसी अवधि में सोशल मीडिया पर कथित पोस्ट के बहाने चार्जशीट जारी की और जून 2016 में सेवा समाप्ति का आदेश जारी कर दिया। जांच में न तो वह पोस्ट प्रस्तुत की गई, न ही कोई तकनीकी प्रमाण, और न ही कर्मचारी को पर्याप्त अवसर मिला। इसके बावजूद उन्हें दोषी ठहराकर निकाल दिया गया।हाईकोर्ट ने पाया कि लेबर कोर्ट ने सेवा समाप्ति की अनुमति नहीं दी थी, बावजूद इसके कर्मचारी को हटा दिया गया। कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के “जयपुर ज़िला सहकारी भूमि विकास बैंक बनाम रामगोपाल शर्मा” मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब स्वीकृति नहीं दी गई हो, तो बर्खास्तगी स्वयमेव शून्य मानी जाती है और कर्मचारी को सेवा में माना जाता है।इस निर्णय को देशभर के पत्रकार संगठनों ने श्रमिक अधिकारों की बड़ी जीत बताया है। पत्रकार संगठनों ने मांग की है कि अब सरकारें यह सुनिश्चित करें कि मीडिया संस्थानों में मजीठिया वेतनमान की सिफारिशों को बिना देरी के लागू किया जाए और पत्रकारों को कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाए।कोर्ट के आदेश के अनुसार, विजय कुमार शर्मा की सेवा तत्काल प्रभाव से बहाल की जाएगी, उन्हें बकाया वेतन, सेवा निरंतरता, और अन्य सभी लाभ दिए जाएंगे। वहीं प्रबंधन की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। 📅 कब क्या हुआ? – पत्रकार विजय कुमार शर्मा बनाम पत्रिका मामला तारीख / वर्षघटना01 जुलाई 2002विजय कुमार शर्मा की नियुक्ति राजस्थान पत्रिका समूह में सहायक ईडीपी ऑपरेटर के रूप में हुई।2011पदोन्नति के बाद वे ‘सब-एडिटर’ के पद पर कार्यरत हो गए।11 नवंबर 2011केंद्र सरकार द्वारा मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशें अधिसूचित की गईं।2014सुप्रीम कोर्ट ने ABP Pvt. Ltd. बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को वैध ठहराया।जनवरी 2015विजय शर्मा ने मजीठिया वेतन लागू करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका में अन्य पत्रकारों के साथ पक्षकार बनकर हिस्सा लिया।15 जनवरी 2015उन्हें बेंगलुरु से भोपाल स्थानांतरित कर दिया गया।19 मई 2015उन्हें पुनः भोपाल से जगदलपुर स्थानांतरित किया गया।जुलाई 2015उन्होंने अपने स्थानांतरण के खिलाफ भोपाल लेबर कोर्ट में विवाद दायर किया।30 नवम्बर 2015उन्हें निलंबित कर चार्जशीट जारी की गई।30 अप्रैल 2016आंतरिक जांच पूरी हुई, और रिपोर्ट में उन्हें दोषी ठहराया गया।06 जून 2016सेवा समाप्ति (Termination) आदेश जारी किया गया। साथ में एक माह का वेतन (₹31,000) दिया गया और लेबर कोर्ट में धारा 33(2)(b) के तहत स्वीकृति के लिए आवेदन किया गया।16 सितम्बर 2021लेबर कोर्ट ने कर्मचारी को साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।29 फरवरी 2020लेबर कोर्ट ने जांच को वैध माना लेकिन कोई राहत नहीं दी।17 जनवरी 2024लेबर कोर्ट ने प्रबंधन द्वारा मांगी गई बर्खास्तगी की अनुमति (Approval) अस्वीकार कर दी।2024 (M.P. No.2594/2024)प्रबंधन ने लेबर कोर्ट के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी।2024 (W.P. No.13666/2024)विजय शर्मा ने पुनः नियुक्ति और वेतन लाभ के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।21 नवम्बर 2024मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पत्रिका प्रबंधन की याचिका खारिज की, और विजय शर्मा की याचिका स्वीकार करते हुए सेवा बहाली, वेतन, सेवा निरंतरता व सभी लाभ देने का आदेश सुनाया। 🧾 न्यायालय के आदेश का सारांश विजय कुमार शर्मा की सेवा बहाल की जाए सभी बकाया वेतन, लाभ और सेवा निरंतरता दी जाए चार्जशीट और आंतरिक जांच रिपोर्ट को अवैध और असंवैधानिक करार दिया पत्रिका की याचिका खारिज लेबर कोर्ट का आंशिक आदेश संशोधित ⚖️ हाईकोर्ट ने क्या कहा? हाईकोर्ट ने पाया कि: आंतरिक जांच प्रक्रिया दोषपूर्ण थी, कर्मचारी को पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। चार्जशीट में लगाए गए आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं थे, विशेष रूप से फेसबुक पोस्ट का कोई सबूत नहीं दिखाया गया। धारा 33(2)(b) के तहत आवश्यक स्वीकृति बिना लिए सेवा समाप्त करना अवैध है। प्रबंधन की कार्रवाई, विशेष रूप से वेतन संबंधी मांगों के बाद हुई, दबाव और बदले की भावना को दर्शाती है। न्यायालय ने कहा कि जब कोई कर्मचारी अपने वैधानिक अधिकारों की मांग करता है, तो संस्थान उसे दंडित नहीं कर सकता। यह श्रमिकों के अधिकारों के विरुद्ध और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। 📌 लेबर कोर्ट पर भी टिप्पणी हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि लेबर कोर्ट का आकलन एकतरफा था। एक ओर कोर्ट ने माना कि बर्खास्तगी आदेश अवैध था और स्वीकृति नहीं दी जा सकती, लेकिन दूसरी ओर पुनर्नियुक्ति का आदेश नहीं दिया, जो कि सुप्रीम कोर्ट के “Jaipur Zila Sahakari Bhoomi Vikas Bank Ltd. बनाम रामगोपाल शर्मा” फैसले की भावना के विपरीत था। 🗣️ प्रबंधन की मंशा पर सवाल कोर्ट ने माना कि पत्रिका प्रबंधन ने जानबूझकर मजीठिया वेतन की देनदारी से बचने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का सहारा लिया। यह न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर प्रहार है, बल्कि संस्थागत जवाबदेही को कमजोर करने की साजिश भी मानी जा सकती है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... 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