24 News Update वाराणसी। धार्मिक-सामाजिक विमर्श के बीच सोमवार को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ‘चतुरंगिणी सेना’ के गठन का ऐलान कर नई बहस छेड़ दी। प्रस्तावित ढांचे के मुताबिक इस संगठन में 2 लाख 18 हजार 700 स्वयंसेवक शामिल किए जाएंगे, जो देशभर से भर्ती होंगे।
शंकराचार्य ने बताया कि इस सेना का दायरा गोरक्षा, धर्म रक्षा, शास्त्र संरक्षण और मंदिरों की सुरक्षा तक रहेगा। सदस्यों के लिए पीले रंग की वर्दी निर्धारित की गई है, जबकि हाथ में परशु (फरसा) रखने की बात भी कही गई है।
इस पहल को संस्थागत रूप देने के लिए ‘श्रीशंकराचार्य चतुरंगिणी सभा’ का गठन किया गया है, जिसमें 27 सदस्य होंगे और इसकी अध्यक्षता स्वयं शंकराचार्य करेंगे।
कार्यप्रणाली: “पहले टोको, फिर रोको, अंत में ठोको”
सेना की कार्यशैली स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी विवाद की स्थिति में पहले समझाइश दी जाएगी। “पहले टोको—गलत को बताओ, फिर रोको—रोकने का प्रयास करो, और यदि बात न बने तो ‘ठोको’—जिसका अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि कानूनी कार्रवाई, शिकायत और पंचायत जैसे संवैधानिक उपाय हैं,” उन्होंने स्पष्ट किया।
संगठन का गणित: हर जिले में टीमें
घोषित ढांचे के अनुसार एक ‘पत्ती’ (टीम) में 10 सदस्य होंगे। इस तरह 21,870 टीमें बनाकर लक्ष्य संख्या हासिल करने की योजना है। देश के करीब 800 जिलों में यदि प्रत्येक जिले से 27 टीमें (270 लोग) तैयार होते हैं, तो कुल संख्या दो लाख से अधिक हो जाएगी।
धार्मिक स्थलों पर प्रवेश को लेकर बयान
धार्मिक परिसरों में अन्य धर्मों के प्रवेश पर उन्होंने कहा कि जैसे मक्का-मदीना में बाहरी लोगों पर प्रतिबंध है, वैसे ही अन्य धर्मस्थलों की पवित्रता बनाए रखने का अधिकार भी संबंधित समुदायों को होना चाहिए।
पृष्ठभूमि: अखाड़ों से दूरी और नई पहल
चतुरंगिणी सेना की घोषणा को हालिया घटनाक्रमों से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रयागराज के माघ मेले में संगम स्नान के दौरान हुए विवाद और उसके बाद अखाड़ों के समर्थन के अभाव ने शंकराचार्य और पारंपरिक संत संगठनों के बीच दूरी को उजागर किया था।
इतिहास के संदर्भ में उन्होंने आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा अखाड़ों की स्थापना का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौर में भी धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए साधु-संतों को संगठित किया गया था। हालांकि, 1954 में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के गठन के बाद इन संस्थाओं की कमान परिषद के हाथ में केंद्रित हो गई।
हाल के महीनों में ‘गो-प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध’ यात्रा और साधु समाज में कथित मतभेदों के बीच यह नई घोषणा सामने आई है, जिसे धार्मिक नेतृत्व के भीतर बदलते समीकरणों के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।

