24 News Upadte उदयपुर। लेकसिटी में लगता है नेताओं ने सब कुछ अफसरों के आगे छोड़ कर बस माल कमाने को ही अपना एकमात्र मकसद बना दिया है। अफसर जैसा चाह रहे वैसा शहर को हांक रहे हैं। ऐसे में अब परम्पराओं पर प्रहार होने लगा है। मनमाने फैसले जन आक्रोश का कारण बन रहे हैं। सबसे खास बात ये है कि अफसर जानते हैं कि पूरे प्रोसस में पनिशमेेंट कहीं नहीं है, गलत फैसले करो और उन नेताओं के पीछे छुप जाओ जो उनको लेकर आए हैं। या फिर जिनका वो आर्थिक हित की मलाई वाला हित साध रहे हैं। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। सावन के पवित्र सोमवार पर गुलाबबाग में वर्षों से लगने वाले ऐतिहासिक सखियां सोमवार मेले को रोकने की कोशिश कर नगर निगम खुद सवालों के घेरे में आ गया है। शहर की सांस्कृतिक विरासत और सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी पर प्रशासनिक फरमान चलाने की कोशिश आखिरकार जनआक्रोश के सामने टिक नहीं सकी। विरोध बढ़ते ही निगम को अपने कदम पीछे खींचने पड़े, लेकिन अब वही प्रशासन कचरा प्रबंधन और व्यवस्थाओं की दुहाई देकर पूरे घटनाक्रम को नया रंग देने में जुटा है।
हकीकत यह है कि सोमवार सुबह गुलाबबाग के मुख्य प्रवेश द्वार पर ताला लगाकर दुकानदारों के वाहनों की एंट्री रोक दी गई। बिना किसी पूर्व सूचना के उठाए कदम से व्यापारियों में नाराजगी फैल गई। शहरभर में संदेश पहुंच गया कि इस बार पारंपरिक मेला बंद कर दिया गया है। वर्षों पुरानी परंपरा पर संकट की खबर फैलते ही व्यापारी, शहरवासी और जनप्रतिनिधि सड़क पर उतर आए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि मेला बंद नहीं किया जा रहा था तो फिर गेट पर ताला लगाने की नौबत क्यों आई? उद्देश्य केवल व्यवस्था बनाना था तो व्यापारियों से संवाद क्यों नहीं किया गया? आखिर ऐसा कौन-सा प्रशासनिक विवेक था जिसने पहले टकराव पैदा किया और बाद में सफाई देने की नौबत आ गई?

कचरा प्रबंधन की आयड़ में सांस्कृतिक परम्परा पर प्रहार
निगम का तर्क है कि मेले के बाद गुलाबबाग में कचरा फैलता है और सफाई में दो दिन लग जाते हैं। लेकिन शहरवासियों का कहना है कि सफाई करना नगर निगम का संवैधानिक दायित्व है, परंपराओं पर रोक लगाना नहीं। यदि कचरा प्रबंधन चुनौती है तो उसका समाधान बेहतर सफाई व्यवस्था है, न कि शहर की सांस्कृतिक पहचान को बंद करने का प्रयास।
पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आलोचकों का कहना है कि एक अधिकारी के स्तर पर लिए गए फैसले ने शहरभर में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी। यदि जनप्रतिनिधि, व्यापारी और आमजन विरोध नहीं करते तो शायद वर्षों पुरानी यह परंपरा इस बार थम जाती। ऐसे में इस पूरे मामले की जवाबदेही तय होना भी जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई अधिकारी मनमाने निर्णय लेकर जनभावनाओं और सांस्कृतिक परंपराओं से खिलवाड़ न कर सके।

बहाना बनाया और नियमों का बोझ लादा
जनदबाव बढ़ने के बाद निगम ने नया बयान जारी कर दावा किया कि मेला पूर्व की तरह ही आयोजित होगा और केवल व्यवस्थाओं को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। स्टॉल संचालकों के लिए डस्टबिन रखना, निर्धारित स्थान पर दुकान लगाना और मेला समाप्त होने के बाद सफाई करना अनिवार्य किया गया है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि यदि शुरुआत से यही मंशा थी तो पहले टकराव और ताला लगाने जैसी कार्रवाई क्यों हुई?
फिलहाल जनआक्रोश के आगे प्रशासन को झुकना पड़ा है और सखियां सोमवार मेले का आयोजन फिर से सुनिश्चित हो गया है। मगर यह विवाद यह भी बता गया कि जनभावनाओं से जुड़े निर्णय बंद कमरों में नहीं लिए जा सकते। शहर की परंपराओं पर रोक लगाने की कोशिश करने वालों को आखिरकार जनता के सामने झुकना ही पड़ा।


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By desk 24newsupdate

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