24 News Update जयपुर 20 अप्रैल। अपराधी चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो और हुलिया बदलकर कहीं भी छिप जाए, कानून के हाथ उस तक पहुँच ही जाते हैं। अजमेर जिला पुलिस अधीक्षक श्री हर्षवर्धन अग्रवाला द्वारा लंबे समय से फरार चल रहे अपराधियों की धरपकड़ के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत पुलिस ने ‘ह्यूमन इंटेलिजेंस’ और ‘ट्रेडिशनल पुलिसिंग’ का लोहा मनवाते हुए एक बड़ी सफलता हासिल की है। 16 साल पहले पैरोल से फरार हुए आजीवन कारावास के दोषी करण सिंह उर्फ कन्ना सिंह रावत निवासी नाहरपुरा थाना जवाजा को पुलिस की विशेष टीम ने फिल्मी अंदाज में पीछा कर दबोच लिया।
दो कांस्टेबलों की ‘स्पेशल टीम’ और 16 साल पुरानी फोटो
एसपी हर्षवर्धन अग्रवाला ने इस पुराने और पेचीदा मामले को सुलझाने का टास्क पुलिस लाइन के दो जांबाज कांस्टेबल प्रकाश सिंह बिष्ट और अजय कुमार जाट को सौंपा और पूरे ऑपरेशन के दौरान स्वयं लगातार मॉनिटरिंग करते रहे। हर छोटे-बड़े अपडेट पर एसपी टीम को सीधे दिशा-निर्देश देते रहे।
कांस्टेबल प्रकाश और अजय के पास सुराग के नाम पर फाइल में लगी एक 16 साल पुरानी धुंधली फोटो थी, जिसमें आरोपी घनी दाढ़ी में नजर आ रहा था। बिना किसी तकनीकी सुराग के इन दोनों जवानों ने शून्य से अनुसंधान शुरू किया।
भेष बदलकर गांव-गांव की जासूसी
■ पहला पड़ाव (जवाजा): टीम सबसे पहले आरोपी के मूल गांव नोहरपुरा पहुंची, लेकिन वहां सन्नाटा मिला। किसी ने सालों से उसे नहीं देखा था।
■ दूसरा पड़ाव (कामलीघाट): जांच में पता चला कि आरोपी के दो भाई राजसमंद के कामलीघाट में रहते हैं। दोनों जवानों ने वहां 5-7 दिन तक डेरा डाला, भेष बदलकर जानकारी जुटाई, लेकिन भाइयों ने अनभिज्ञता जताई और ग्रामीणों ने इनके तीसरे भाई के होने से ही इनकार कर दिया।
■ तीसरा पड़ाव (खरावड़ी): हार न मानते हुए दोनों जवानों ने मुखबिर तंत्र को सक्रिय किया। पता चला कि आरोपी ने अपना हुलिया बदल लिया है, अब दाढ़ी-मूंछ कटवाकर वह गंजा हो गया है और ‘रामजी दया’ के फर्जी नाम से खरावड़ी गांव में मिस्त्री का काम कर रहा है।
पहली दबिश, फिर भी नहीं टूटी हिम्मत
4 अप्रैल को जब कांस्टेबल प्रकाश, अजय और स्थानीय दिवेर पुलिस ने खरावड़ी स्थित घर पर दबिश दी, तो शातिर आरोपी को पुलिस की सक्रियता की भनक लग गई और वह ऐन वक्त पर वहां से फरार हो गया। आरोपी ने अपना मोबाइल बंद कर लिया और पुलिस को चकमा देने के लिए गुजरात की तरफ भाग गया।
मंदिरों और शमशानों में छिपकर बिताया वक्त
आरोपी के भागने के बाद एसपी अग्रवाला ने टीम को हौंसला बनाए रखने और मुखबिर तंत्र को और मजबूत करने के निर्देश दिए। दोनों जवानों ने भी हिम्मत नहीं हारी और अपने मुखबिर तंत्र को पूरी तरह एक्टिव रखा। मुखबिरों से सूचना मिली कि आरोपी रात के समय चोरी-छिपे घर लौटता है, जबकि पकड़े जाने के डर से दिन भर वह शमशानों, पुराने मंदिरों और सुनसान खेतों में छिपा रहता है। दुर्गम और पहाड़ी इलाका होने के कारण वह पुलिस की नज़रों से बचने के लिए इन स्थानों का सहारा ले रहा था। जवानों ने भी ग्रामीण वेश धारण कर इन संभावित ठिकानों पर उसकी तलाश जारी रखी।
छापली गांव में अंततः चढ़ा पुलिस के हत्थे
लगातार पीछा करने के बाद टीम को सटीक सूचना मिली कि आरोपी छापली गांव में एक दुकान पर बैठा है। टीम ने बिना वक्त गंवाए घेराबंदी की और उसे दबोच लिया। पकड़े जाने पर भी उसने शातिरता दिखाई और अपना नाम ‘जीतू’ बताकर पुलिस को बहलाने की कोशिश की, लेकिन कड़ी पूछताछ के सामने उसकी पहचान टिक न सकी और उसने अपना असली नाम करण उर्फ कन्ना सिंह कबूल कर लिया। टीम उसे अजमेर लेकर आई, जहाँ उसे सिविल लाइन थाना पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया है। जिसे इस प्रकरण में गिरफ्तार कर लिया है।
इस पूरे ऑपरेशन की सबसे बड़ी खास बात यह रही कि कांस्टेबल प्रकाश सिंह बिष्ट (1801) और अजय कुमार (1546) ने उन इलाकों में कार्य किया जहाँ की भौगोलिक स्थिति से वे वाकिफ नहीं थे। इन्होंने मुलजिम के दूर के रिश्तेदारों और पुराने जानकारों के बीच अपने मुखबिर बैठाए। लंबी निगरानी और धैर्य के बाद टीम को मुलजिम के सटीक ठिकाने की जानकारी मिली। स्थानीय दिवेर थाना पुलिस के साथ बेहतरीन समन्वय और अपने स्वयं के मुखबिर तंत्र के दम पर उन्होंने इस नामुमकिन टास्क को मुमकिन कर दिखाया।

