24 News Upate उदयपुर। महाशिवरात्रि की पूर्व संध्या पर शहर की धड़कनें कुछ तेज थीं, सांसों में भक्ति और कदमों में उत्साह था। कारण साफ था—शिव दल मेवाड़ की ओर से निकाली गई 46वीं विशाल शिव यात्रा, जिसने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि यह आयोजन केवल एक जुलूस नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक अनुशासन का जीवंत उत्सव है। टाउन हॉल से उठी महाआरती की लौ जब शहर की सड़कों पर फैली, तो हर गली ‘हर-हर महादेव’ के घोष से गूंज उठी।
परंपरा जो समय से बड़ी है
छियालिस वर्षों से अनवरत चल रही यह शिव यात्रा अब शहर की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन चुकी है। आयोजन से पहले विधिवत महाआरती और फिर अनुशासित ढंग से आगे बढ़ती यात्रा—यह संकेत था कि भक्ति के साथ व्यवस्था भी साथ चल रही है। सुरक्षा और श्रद्धा का यह संतुलन इस वर्ष यात्रा की विशेष पहचान बना।
ज्योतिर्लिंगों का सजीव दर्शन
यात्रा का केंद्र बिंदु रहीं सुसज्जित वाहनों पर विराजमान 12 ज्योतिर्लिंगों की भव्य झांकियां। कतारबद्ध दर्शन करते शहरवासी, भजनों की ताल पर झूमते शिवभक्त और भगवान शिव के विविध स्वरूपों को दर्शाती झांकियां—यह सब मिलकर शहर को एक चलती-फिरती शिव-गाथा में बदल रहा था।
भक्ति के साथ देशभक्ति का घोष
351 फीट लंबे तिरंगे ने यात्रा में एक अलग ही ऊंचाई जोड़ दी। युवा जब गर्व के साथ तिरंगा थामे आगे बढ़े, तो संदेश स्पष्ट था—आस्था और राष्ट्रभाव एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। वहीं अखाड़ों के कलाकारों ने पारंपरिक शस्त्रों के प्रदर्शन से शौर्य और अनुशासन की मिसाल पेश की, जिसे देखने के लिए सड़कों के दोनों ओर जनसैलाब उमड़ पड़ा।
एकता का केसरिया रंग
हजार से अधिक कार्यकर्ता केसरिया पगड़ियों में एक अनुशासित पंक्ति की तरह आगे बढ़ते दिखे। साधु-संतों की उपस्थिति ने वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बना दिया। पुराने शहर से नए विस्तार तक, हर चौराहे पर पुष्पवर्षा और स्वागत—मानो पूरा शहर स्वयं इस यात्रा का मेजबान बन गया हो।
दुर्लभ ज्योतिषीय संयोग ने बढ़ाया महत्व
इस वर्ष महाशिवरात्रि केवल आयोजन नहीं, दुर्लभ ज्योतिषीय संयोग भी लेकर आई है। सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ चतुर्ग्रही योग—जब सूर्य, शुक्र, बुध और राहु कुंभ राशि में स्थित हैं—पर्व को विशेष फलदायी बना रहे हैं। उत्तराषाढ़ा और श्रवण नक्षत्र का संयोग इस रात्रि की आध्यात्मिक शक्ति को और प्रबल करता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, शिवपुराण में वर्णित यह रात्रि भगवान शिव की परम प्रिय है। रुद्राभिषेक, शिवार्चन, बेलपत्र अर्पण, मंत्र जाप और रात्रि के चारों प्रहर की पूजा—इनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना संभव मानी गई है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी स्वयं महादेव हैं, इसलिए इस दिन की गई आराधना का फल भी विशेष होता है।
आस्था, शौर्य और ज्योतिष का संगम: शिव यात्रा में हर—हर महादेव की गूंज

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