24 न्यूज अपडेट, उदयपुर। विधानसभा में कल उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन ने यूआईटी से निगम को हस्तांतरित किए गए 272 भूखंडों का मामला उठा कर एक बार फिर इस भूले बिसरे मामले को तरोताजा कर दिया। भाजपा-कांग्रेस के नेताओं की सरपरस्ती, भूमि दलालों की खेल और महाभ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत का यह ऐसा क्लासिक एग्जाम्पल है जो खोखले होते तंत्र की बरसों से गवाही दे रहा है। बरसों से मामला चल रहा है, ना जाने कितनी बार किस-किस एजेंसी की दहलीज पर यह मामला न्याय के लिए नाक रगड़ कर हार गया मगर किसी का भी दिल नहीं पसीजा। बड़े हाथियों ने बार-बार जांच फाइलों की फुटबॉल खेल कर जांच के हर रास्ते को कुचल कर रख दिया। मजे की बात ये है कि सरकार किसी की भी हो इस कांड में लिप्त प्रभावशाली लोगां के कोई फर्क नहीं पड़ता। फोन कांग्रेस की सरकार में भी उपर से ही आ जाते हैं और भाजपा सरकार में भी। वरना क्या मजाल कि केवल 300 भूखंडों की जांच में बरसों बरस लग जाए। इस बारे में जब हमने मामले के व्हिसल ब्लोअर समाजसेवी व पूर्व पार्षद अजय पोरवाल से बात की तो उन्होंने भी साफ कह दिया कि कांग्रेस कार्यकाल में जांच एसओजी को दी गई, एफआईआर दर्ज हुई लेकिन उसके बाद ऊपरी दबाव में जांच अंजाम तक ही नहीं पहुंच पाई। दूसरी तरफ बरसों से निगम में काबिज भाजपा बोर्ड ने भी इसमें खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। कुछ भूखंडों पर बोर्ड लग गए मगर बाकी सबका क्या हुआ। निगम के अफसरों पर नेताओं ने नकेल क्यों नहीं कसी, उनको बाध्य क्यों नहीं किया कि वे पूरा चिट्ठा सामने लाएं ताकि बोर्ड बैठक में जनता के सामने रखते हुए पूरे मामले के हर पहलू को सार्वजनिक किया जा सके। वे कौनसे जमीन माफिया हैं जो मिलीभगत करके, फर्जी तरीके से कागज तैयार कर लेते हैं, जमीन पर मकान तक बना लेते हैं, जमीनें बेचे देते हैं मगर फिर भी जेल नहीं जाते हैं, जांच में नहीं फंसते हैं। निगम की बैठकों में यह मांग हमारे चुने हुए जन प्रतिनिधि आखिर क्यों नहीं करते कि सारे काम छोड़ दो सबसे पहले ये बताओ कि 272 प्लॉट के मामले में क्या हुआ, जांच आगे बढ़े तो हम बैठक को आगे बढ़ने दे। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। साल-छह महीने में इस मसले पर महापौर से लेकर पार्षद तक बचते-बचाते हुए हां-हूं करके मुद्दे को टालने की कोशिश करते है। शहरवासियों को तो याद ही नहीं है कि महापौर का इस मसले पर आखिर बार कब कोई मजबूत बयान आया था। इच्छाशक्ति की कमी या फिर उपरी दबाव की वजह से यह सब नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में कांग्रेस के ही नेता अजय पोरवाल की शिकायत को नजरअंदाज कर दिया गया, जांच ऐसे चलाई मानों बीरबल की खिचड़ी पक रही हो। धीमी-धीमी आंच पर। जयपुर में अफसर खेल खेल रहे थे। कभी फाइल यहां गई, कभी वहां गई। जब जांच लोकल बस जैसी सवारी करके उदयपुर आई तो यहां भी दबाव के चलते जांच अंजाम तक नहीं पहुंच पाई। इससे एसओजी की भी कलाई खुलकर सामने आ गई कि कहीं वह सत्ता प्रतिष्ठान के दबाव में तो काम नहीं करती। उपर से इशारा होते ही सक्रियता बढा देती है और इशारा होते ही उसके जांच के सारे तंत्र अचानक मंदाग्नि के शिकार हो जाते हैं। विधायक ताराचंद जैन ने जो सवाल उठाया उससे उत्साह की व न्याय मिलने की नई लहर तो पैदा हुई है मगर सवाल यह भी उठ रहा है कि सत्ता बदलने के 9 महीने बाद भी एसओजी आखिर कर क्या रही है। उसके पास तो जांच लंबे समय से है, अब तो केवल निष्कर्ष और मामले के निबंध का उपसंहार लिखकर सबमिट करना है। उसमें कौनसा दबाव आड़े आ रहा है। देखना यह भी होगा कि अब कितने समय में जांच रिपोर्ट सामने आती है।इस बारे में हमने बात की पूर्व पार्षद व समाजसेवी अजयजी पोरवाल से। उन्होंने कहा कि – यूआईटी से नगर निगम में जो कॉलानियां हस्तांतरित हुई थी तब पूरी कॉलोनी के साथ ही कुछ प्रीमियम प्लॉट थे जिनका ऑक्शन नहीं हुआ था। जिन प्लॉटों की बिक्री हो गई थी उनके कागज नगर निगम का यूआईटी ने दे दिए थे। जो प्लॉट खाली थे उनके कोई कागज नहीं आए। नगर निगम में कुछ भू माफिया व अधिकारियों-कर्मचारियों ने मिल कर इन प्लाटों के फर्जी कागजात बना लिए। इनको बाजार में बेच दिए। हमने 385 प्लॉट की सूची सरकार को दी है जिसकी कीमत लगभग 1200 करोड़ है। मैं पिछले दस साल से इस मामले में लगातार कार्रवाई की मांग कर रहा हूं। 2012 में यह मामला मेरे संज्ञान में आया। उस समय तत्कालीन महापौर रजनी डांगीजी ने मेरी बात सुनी व 195 प्लॉट पर बोर्ड लगाए कि यह संपत्ति नगर निगम उदयपुर की है। उस सयम अधिकारियों को पता चल गया कि प्लॉट खाली हैं। उसके बाद ये गेम चालू हुआ। उसमें दोनों पार्टियों के भूमाफिया व जन प्रतिनिधि इसमें शामिल हैं। विशेष तौर पर भाजपा नेता दीपक बोल्या का साला राजेंद्र धाकड़ इसमें शामिल है। मैंने सीम, अशोक गहलोत को मामला दिया, उन्होंने तुरंत एसओजी को मामला दे दिया। मैं खुद एप्लीकेंट हूं। उसके बाद एसओजी में किसी राजनीतिक दबाव से उस जांच को धीरे कर दिया गया। मैं दस बार जयपुर हैड ऑफिस गया, उसके बाद जोधपुर बुलाया गया, सुबह से शाम तक बिठाए रखा, बयान लिए गए। उसके बाद जांच अधिकारी को तीसरी बार चेंज करके उदयपुर दिया गया व उदयपुर की जो जांच अधिकारी थी उसने धीमे धीमे कार्रवाई करते हुए जांच की मगर जांच का पूरा नहीं किया। अब शहर विधायक ताराचंदजी ने मामला उठाया है। उनका बहुत बहुत धन्यवाद। चार साल से मैं अकेला लड़ रहा हूं। अभी कुछ प्लॉट खाली पड़े हैं व कुछ पर मकान बना लिए गए हैं। कब्जे भू माफियाओं के हैं। पोरवाल ने कहा कि ये मेरी राजनीतिक लड़ाई नहीं है मैं अकेला चार साल से उदयपुर की भलाई के लिए लड़ रहा हूं। प्रवीणजी खंडेलवाल, अशोकजी सिंघवी, मैं, गिरीशजी भारती और 12 सहवृत्त पार्षद भी थे जिन्होंने यह सोचा कि नगर निगम ये प्लॉट बेचे, 1200 करोड़ उदयपुर शहर के विकास में काम में आए।आपको बता दें कि यूआईटी से निगम को हस्तांतरिक किए गए 272 भूखण्ड के मामले के साथ ही विधायक ताराचंद जैन ने चार दिन पूर्व ही करोड़ों रूपए मूल्य के 1 अन्य प्लॉट का पट्टा निरस्त करने का मामला उठाया। उन्होंने कहा कि विधायक जैन ने कहा कि 272 प्लॉट के मामले में निगम के भाजपा बोर्ड ने इस प्रकरण की जांच की, जिसमें 49 पट्टे रद्द किए और शेष का पता नहीं चल पा रहा है। मगर इस बीच तीन दिन पूर्व ही 12000 स्क्वायर फीट का एक पट्टा निरस्त किया गया है। निगम के तत्कालीन आयुक्त हिम्मत सिंह बारहठ ने कांग्रेस सरकार के कहने पर मात्र 40 रूपए प्रति वर्ग फीट में आवंटित कर दिया था। अब बडा सवाल उठ रहा है कि हिम्मतसिंह बारहठ ने जब एक मामले में इतना बडा घपला किया है तो बाकी मामलों की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए। बारहठ पर किनका वरद हस्त था जो इतने कम दाम पर जमीन माफिया को दे दी। इसके बदले में उनको क्या लाभ हुआ इसकी भी जांच होनी चाहिए। लाभार्थी कौन कौन थे इसकी भी जांच होनी चाहिए। इसके अलावा यह सवाल भी उठ रहा है कि जब बारहठ ने यह फैसला लिया तो क्या फाइल निगम महापौर तक नहीं गई थी, नही ंतो क्या नहीं, गई थी तो क्या कार्रवाई की गई या केवल आंख मूंद कर आगे बढ़ गई। इतनी कितनी फाइलें हैं इन सबकी जांच हो जाए तो किस-किस पर आंच आएगी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पूरे कुएं में ही भांग मिली हुई है। यदि एक जांच भी ढंग से हो जाए तो जमीन माफिया, नेताओं व अधिकारियों का नेक्ससर धड़ाम से जमीन पर आ गिरेगा। मगर बडा सवाल ये है कि पहल आखिर कौन करेगा। बिल्ली के गले में घंटी बांधने का साहस कौन जुटाएगा। विधानसभा में मामला उठने के बाद क्या 272 प्लॉट प्रकरण न्याय की दहलीज पर जाकर न्याय प्राप्त कर जाएगा, इसमें संदेह है क्योंकि इस पर ना तो जनता की अदालत में खुलकर चर्चा हो रही है ना ही नेता इस पर बोल रहे हैं। ना यह पिछले दो चुनावों में चुनावी मुद्दा बन पाया। और ना इसे आने वाले निकाय चुनावों में मुद्दा बनने दिया जाएगा। क्योंकि लाभार्थियों के संपर्क दोनें प्रमुख दलों के बड़े नेताओं की आस्तीनों तक फैले हुए हैं। और सत्ता परिवर्तन की आबोहवा से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता है। Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading... 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